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स्वातंत्र्योत्तर कविता

 

 

" हम सबके दामन पर दाग
हम सबकी आत्मा में झूठ
हम सबके माथे पर शर्म
हम सबके हाथों में टूटी तलवारों की मूठ ॥ "

 

 


ये पंक्तियाँ धर्मवीर भारती जी की हैं जो स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक हिन्दी कविता की प्रवृत्ति को दर्शाती है। अब कविता हो या कोई भी साहित्य विधा वास्तविकता को ही अपना साधन बना लिया है जो इन पंक्तियों से ज्ञात होता ही है। इस आधुनिक परिवेश में कुछ भी ठीक नहीं है। और सत्य को प्रकट करना ही साहित्य का परम लक्ष्य है। प्राचीन काल में लगभग सभी विद्वान कवि राजा-महाराजाओं के दरबारी कवि बन गये थे, जो अपने आश्रयदाताओं को खुश करने के लिए लिखते थे या काल्पनिक रुप से साहित्य का सृजन करते थे। इस काल की कविताओं का सृजन, अधिकांशतः दरबारियों, राजाओं और मनसबदारों की चाटुकारिता, स्तुति गायन और उन्हें प्रसन्न करने के लिए वीरता की झूठी प्रशंसा हेतु किया गया। परन्तु अब हालात बदल गये हैं स्थिति-गति के अनुसार साहित्य ने भी अपना रुख बदल लिया है। सच मानो तो साहित्य स्वान्त सुखाय होता है।

 


हिन्दी साहित्य के आदि काल से लेकर आज तक कविता की अजस्र धारा में प्रवाहित हुई है। भक्ति काल में भक्ति परक रचनायों की प्रधानता रही। साहित्य के आरंभिक काल से ही कविता का भी श्रीगणेशा मानते हैं। भक्ति काल के अन्तिम सिरे से हिन्दी कविता ऐहिकता की ओर मु.ड़ी.। आधुनिक युग में हिन्दी गद्य के विकास के साथ काव्य – भाषा का भी विकास हुआ। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के काल में देश – प्रेम, समाज-सुधार, व्यवस्था आदि भावों की रचनायें लिखी गईं।
कविता हमारे सर्वोत्तम क्षणों की वाणी है। कविता मन के बोल होते हैं। असल में जो सहता है वही खरा लिखता है। वास्तविकता को ध्यान में रखकर जो लिखता है वही खरा साहित्यकार बन के उभरता है। उत्कृष्ट और तीव्र भावावेग जब अनायास होते हैं तब कविता का जन्म होता है। एक साहित्यकार की सर्व प्रथम रचना कविता ही होती है, यानी किसी भी रचनाकार के प्रारंभिक भाव कविता के रुप में उमढ पडते हैं।

 


छायावादी कविताओं में वैयक्तिकता, देश-भक्ति, रहस्य-भावना, प्रकृति-प्रेम, सांस्कृतिक जागरण आदि की व्यंजना है। छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, साठोत्तरी कविता आदि से गुजरते हुए हिन्दी कविता अनेक काव्यरूपों में ढलती आ रही है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर समकालीन कविता तक की विकास यात्रा विभिन्न चरणों से गुज़री है। नवजागरण, छायावदी, छायावादोत्तर, प्रगतिशील, नयी कविता के दौर से गुज़रते हुए हिन्दी कविता ने परिपक्वता की कई मंज़िलें तय की है। कविताओं के माध्यम से नवजागरण यानी फिर से सजग होने की अवस्था या भाव की अभिव्यक्ति हुई। प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा का काल छायावादी काव्य का काल रहा जबकि राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा के प्रमुख कवि रामधारी सिंह दिनकर छायावादोत्तर काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। नागार्जुन, गजानन माधव मुक्तिबोध और सुदामा प्रसाद पाण्डेय ‘धुमिल’ तो हिन्दी कविता के प्रगतिशील काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय तथा श्रीकांत वर्मा का दौर नयी कविता का दौर रहा। अब तो गेय पद और छंद बद्ध कविताओं की कल्पना करना भी मुश्किल हो रहा है। कहते है कि " अगर भावना में कविता के प्राण बसते हैं तो उसकी लय में उसका शरीर। शब्दों को लय की वेणी से गुथा जाए तो उसके भाव संगीत की लहर पैदा कर आत्मा तक पहुँचते हैं । आत्मा कितनी पवित्र क्यूँ ना हो , शरीर के बिना उसका शिल्प अधूरा है।” नई कविता नाम आज़ादी के बाद लिखी गई उन कविताओं के लिए रूढ हो गया, जो अपनी वस्तु-छवि और रूप-छवि दोनों में प्रगतिवाद और प्रयोगवाद का विकास होकर भी विशिष्ट है। आधुनिक हिन्दी कविता में वर्तमान युग की समस्याएं, जटिलतायें, विसंगतियां उभर कर आईं हैं, साथ में जीवन के प्रति अटूट विश्वास और अखंडित जिजीविषा है। इसलिए इस आधुनिक जटिल परिस्थिति के बारे में हिन्दी के वरिष्ठ कवि श्री राजेश जोशी जी कहते हैं-

 

 

“ सबसे बडा अपराध है इस समय
निहत्ये और निरपराध होना
जो अपराधि नहीं होंगे
मारे जायेंगे॥ "

 

 


आज कविता ने अपना रुख मात्र नहीं बदला बल्कि अपना रुप एवं ढाँचा ही बदल लिया है। आज कविता रस-छंद-अलंकार के जंझिरों से मुक्त होकर नदी की रतह स्वछंद बह रही है। लेकिन कविता के पुराने आचार्यों और समीक्षकों व आलोचकों ने नई कविता का बड़ा भारी विरोध किया। यह विरोध छायावाद भी झेल चुका था और प्रयोगवाद भी। लेकिन नई कविता ने मूल्यबोध की जो समस्याएं उठाई, उसके सम्मुख पुरानी पीढ़ी को पस्त होना पड़ा। डॉ.लक्ष्मीकांत वर्मा ने पुराने आलोचकों को जवाब देने के लिए "नई कविता के प्रतिमान" पुस्तक लिखी है। जिसके द्वारा उन्होंने विश्वास दिलाने का प्रयास किया है कि नई कविता भी पुरानी कविता से कुछ कम नहीं है। परंतु स्वातंत्र्योत्तर कविता में ऐसे स्वर उभर आये हैं कि, कविता निडर बनकर स्वछंद बह रही है। इस समय कविता ने राजा से लेकर रंक को भी अपना साधन बना लिया है। चाहे वह शासक हो या पुलिस हो या गरीब भिक्षु हो सबको आज की कविता वास्तविक यथार्थ को चित्रित करती है। सो अभी-अभी श्री देवेंद्र कुमार मिश्रा जी की एक ताजी कविता प्रस्तुत है-

 


“ पुलिस आगे है , चोर पीछे है
हमने कहा - ये क्या है?
चोर बोला - हम लूटते थे तो हिस्सा देते थे
अब डायरेक्ट ये लूट रहे हैं
हिस्सा माँगा तो भाग रहे हैं॥ "

 


आज भी कबीर और रहीम के दोहों में हम सही दिशा खोज पाते हैं। आज भी दिनकर और सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाओं को पढते ही हमारा खून उबलता है। महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद की दर्द और गम को देख के आज भी हमारी आखें नम हो जाती है। मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा और बच्चन की मधुशाला का प्रतिबिम्ब आज भी हमारी यादों में विद्यमान है। तो आगे हमारा कर्तव्य बनत है कि छंदों, रसों और अलंकारों से सृजित होने वाली मर्मस्पर्शी हिन्दी कविता का सृजन हो। नहीं तो कविता आधुनिकता की दौर में असहाय नजर आने लगी है। इसके जिम्मेदार स्वातंत्र्योत्तर कवि, पाठक और श्रोता सबको मानना ही पडेगा। आधुनिक दौर में गद्य को पद्य और पद्य को गद्य बनाने की नई परंपरा शुरु हुई है। और यह चिंतनीय बात है कि स्वतंत्रता के बाद कविता के स्वर, रुप-रंग ही बदल गये हैं।

 


कविता मन की भावनाओं का दर्पन है। माना कि आज प्राचीन काल सा अलंकार युक्त छंदोबध्द कविता नहीं है। पर कहावत है कि, ’कुछ पाने के लिए कुच खोना भी पडता है।’ ऐसी ही स्थिति है आज स्वातंत्र्योत्तर कविता की है, आज अलंकार से शृंगरित छंदोबध्द कविता नहीं है, पर भाव प्रधान अलौकिक कविता हमारे बीच है। कविता ने पद्य रुप से गद्य रुप भी धारण कर लिया है। शायद ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल के साहित्यकारों में जो विद्वत्ता थी ओ आज नहीं बची। इसलिए यहाँ अंत में उन महान विद्वान साहित्यकारों को हम कभी नहीं भूल सकते, उन्हें हमारा शत-शत प्रणाम....

 


" अज्ञेय -प्रसाद -पंत -निराला
महादेवी वर्मा
सब चले गये आगे
महाप्राण
हम सबकुछ सीख पाते
उनके जमाने में
पर हम रह गये पीछे
अल्पप्राण॥ "

 

 

 

 

श्री सुनील कुमार परीट

 

 

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