आदिवासी वंचना के सरोकार

 

 

सर्वप्रथम आदिवासी शब्द का उद्भव कब हुआ? इसकी क्या आवश्यकता रही? इसका विकास एवं इतिहास क्या है? और इस शब्द के पेच में फंसे हुये लोगों की दशा और दिशा क्या है? आदि ऐसे प्रश्न हैं जो जिज्ञासा पैदा करते हंै कि आदिवासी आखिर कौन है? वैसे तो आदिवासी शब्द को लेकर अनेक विषय विशेषज्ञों, विद्वानों, चिंतकों, लेखकों, अध्ययेताओं एवं शोधकर्Ÿााओं ने इसे विभिन्न प्रकार से परिभाषित करने का प्रयास किया है। परन्तु यदि इसे हम सामान्य अर्थ में भी लेते हंै तो इसका तात्पर्य है- मूल निवासी। अब यहाँ द्वन्द पैदा होता है मूल निवासी और गैर निवासी का, जो अभी तक विवाद और कौतूहल बना हुआ है। अब बात यदि आदिवासी अर्थात मूल निवासी के उद्भव की करते हैं तो माना जा सकता है कि जब हमारे देश में अन्यत्र स्थानों एवं देशों से लोग आए और उन्होंने हमारे ही देश में, हमारे ही लोगों के साथ अन्याय और कपटपूर्ण व्यवहार करना प्रारम्भ किया तब लोगों के दो वर्ग बने । इसकी आवश्यकता इस प्रकार मानी जा सकती है कि जब एक ही प्रकार की समस्या या नीति या धोखेबाजी से लोग पीड़ित होते हंै तो वे एक होकर चिंतन-मनन करते हंै और अन्याय व शोषण के विरूद्ध आवाज उठाते हंैें, तो शायद ऐसा ही आदिवासियों ने किया होगा, क्योंकि वे पीड़ित एवं शोषित रहे।

 


आदिवासियों का इतिहास मानव उत्पŸिा के साथ प्रारम्भ हुआ और सृष्टि के साथ गतिमान है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में आदिवासी परिदृश्य अच्छा नहीं है और विभिन्न देशों की परिस्थिति भिन्न होने के कारण उनकी समस्याएँ, आवश्यकताएँ एवं स्थिति भी भिन्न है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में आदिवासी वंचना के सरोकारों की बात करते हैं तो एक लम्बी कतारबद्ध सूची तैयार हो जाती है जिसमें ऐतिहासिक, समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक, प्रोद्योगिकीय, धार्मिक, प्रशासनिक आदि प्रमुख हंै।एक दृष्टि आदिवासियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की वंचना पर डालते हंै तो प्रतीत होता है कि आदिवासियों के इतिहास के साथ न केवल छेड़छाड़ एवं सौतेला व्यवहार किया गया बल्कि घोर पाप और अन्याय किया गया। आदिवासियों का इतिहास लिखने वाले लोग गैर-आदिवासी रहे हैं जो कि पूर्वाग्रह से ग्रसित एवं संकिर्ण मानसिकता वालों ने अपने अनुसार लिखा। ऐसे गैर-आदिवासी लेखकों ने यथार्थता से दूर अवैज्ञानिक इतिहास लिखा जिसमें वास्तविक तथ्य एवं सूचनाएँ आम लोगों से दूर रही। आदिवासियों के त्याग, साहस, बलिदान, परोपकार एवं कर्Ÿाव्यनिष्ठता की बात की जाये तो वे अदम्य साहसी, त्यागी, परोपकारी एवं कर्Ÿाव्य परायण रहे हंै। आदिवासियों की ऐतिहासिक वंचना का सर्वाधिक उपयुक्त उदाहरण मानगढ़ जनसंहार है, जहाँ एक सदी पूर्व मानगढ़ की पहाड़ी पर निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों पर महज 15-20 मिनट में भारी गोलीबारी एवं बम वर्षा कर पहाड़ी को खून से तरबतर कर शवों के ढेर लगा दिये थे। इस घटना में सरकारी आंकड़ों में मृतकों की संख्या 1503 दर्ज है लेकिन अनाधिकारिक दस्तावेजों एव पुराने अभिलेखों के अनुसार इस जघन्यतम जनसंहार में बीस हजार से अधिक लोग मारे गए परन्तु इसको इतिहास के पन्नों में स्थान नहीं मिला जबकि यह जलियावाला बाग हत्याकांड से कही गुना बड़ा था।

 


आदिवासियों का जीवन जल, जंगल और जमीन पर आधारित रहा है जो प्रकृति प्रदŸा हैं और इसलिए आदिवासी अनेक नामों से जाने जाते रहे हंै जिनमें वनवासी, गिरीजन, प्रकृतिप्रेमी, प्रकृति उपासक आदि। वैशिवक परिप्रेक्ष्य में बात की जाए अथवा भारतीय परिप्रेक्ष्य में बात करते हंै तो आज भी आदिवासी सामाजिक वंचना का शिकार है। प्रत्येक स्तर एवं पग-पग पर आदिवासी उपेक्षित, वंचित, शोषित एव सर्वहारा के रूप में रहा है। शासन प्रशासन की नीतियाँ हो, कानून हो, नियम-विनियम सभी में आदिवासी अपने आप को ठगा महसूस करता है। देश-प्रदेश या स्थानीय स्तर पर कोई भी सरकार बने उसमें आदिवासी निशाना बनाया जाता है। उनका सामाजिक स्तर, रहन-सहन, खान-पान आज भी अपौष्टिक एवं निम्नतम स्तर का होता है, इनके निवासित क्षेत्रों में न पानी, बिजली, स्वास्थय सेवाएं हैं, न ही आधारभूत संरचनाएँ विधमान् हंै। आदिवासियों के जीवन-स्तर को सुधारने के लिए सर्वाधिक आवश्यकता मानवीय विकास के पहलुओं को प्राथमिकता से उठाने की है तभी वे मुख्यधारा से जुड़कर आगे बढ़ सकेंगे। पर प्रश्न उठता है कि क्या सरकारें आदिवासियों का विकास करना चाहती हैं अथवा इनका इस्तेमाल कर अपना उल्लू सीधा करना चाहती हैं। वास्तविक स्थिति तो यही है कि न तो सत्ता में बैठे लोगों की मंशा है और न ही दूसरे वर्गों के लोग ऐसा चाहते हंै। आदिवासियों के रीति-रिवाज, परम्पराएँ, प्रथाएँ इतनी गहरी एवं महत्वपूर्ण है कि उनके वास्तविक मर्म को समझा जाए तो देश में एकता, सद्भावना एवं विकास की गंगा बहने लग सकती है। इतना ही नहीं इनके प्रकृति प्रेमी जीवन से सीखा जाए तो वैश्विक स्तर पर ‘‘ग्लोबल वार्मिग एवं जलवायु परिवर्तन’’ के मुद्दे पर हो रहे चिंतन का हल भी निकल सकता है। आदिवासियों में धार्मिक प्रगाढ़ता अनन्य देखने को मिलती है जिसमें ये पेड़-पौधों की पूजा, पशु-जानवरों की पूजा, पक्षी, जल, सूर्य, चन्द्रमा आदि की पूजा करते हैं परन्तु इनको उस रूप में मान्यता नहीं मिली है और वही कार्य दूसरे लोग आडम्बर एवं मूर्तिपूजा के रूप में करते हैं तो उसका बड़ा गुनगान किया जाता है। इसका एक उदाहरण मंदिरों में पूजा एवं आरती के लिए इलैक्टाॅªनिक पुजारी काम करते हुए देखे जा सकते हैं जो कि विधुत ऊर्जा के विनाश के साथ-साथ ध्वनि प्रदूषण का काम भी कर रहे हैं।

 


आदिवासियों की संस्कृति बहुत ही परिपूर्ण, रोचक एवं हटकर रही है जिसमें विविधता की अपार संभवनाएं विद्यमान् हंै। आदिवासियों की सांस्कृतिक धरोहर विश्व पटल पर पहचान बनाने में सक्षम है और संस्कृति में रस, प्रेम, स्नेह, एकता अपनापन झलकता है। लोकगीत हो, नृत्य हो या उत्सव, त्यौहार, मेले सभी में अपने अदम्य साहस और कला के सहारे मनमोहक सजीवता प्रदान करने की क्षमता है परन्तु इनको मान्यता देना जैसे सरकार पाप समझती है। आदिवासियों में घर-घर में लता मंगेशकर हैं परन्तु आवश्यकता उनको मान्यता देकर आगे बढ़ाने की है। आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं और आज इन्हीं को प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों से विमुख किया जा रहा है। जल, जंगल और जमीन से खदेड़ा जा रहा है और उसी का परिणाम है कि कई आदिवासी जातियाँ लुप्त होने के कगार पर है। इनके विस्थापन से पुरा जन जीवन त्रस्त है और अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिए बाट जोह रहा है। देश की सत्ता में भी आदिवासियों की स्थिति दयनीय रही है और सदैव सपने दिखाकर, झूठे वादे कर इन भोले-भाले आदिवासियों को छला जाता रहा है। आज तक देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति आदिवासी क्यों नहीं बन पाया? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उŸार देना आसान नहीं होगा।

 


वैसे तो आदिवासियों को आदिकाल से ही वंचित रखा गया है परन्तु तदोपरान्त भी कुछ प्रतिभाओं ने अपने दम पर वैश्विक पहचान बनाई है जो तथाकथित लोगों को रास नहीं आता और येनकेन प्रकारेण उभरती प्रतिभाओं की जड़ें ऐसे काट दी जाती हंै जैसे भ्रूण हत्या करते हंै। मैं उन लोगों से सवाल पूछता हूँ कि काले धन्धों में कौन लोग लिप्त हंै? भ्रष्टाचार कौन करेगा? जो लोग सत्ता और अधिकार दोनों से वंचित हंै वे कैसे भ्रष्टाचार कर सकते हंै? आज बड़े-बड़े घोटाले, भ्रष्टाचार के मामले, दुष्कर्म की घटनाऐं, मंदिरों के मठाधीशों के काले कामों के कारनामें सामने आ रहे हंै तो जरा दिल पर हाथ रखकर सोचिए ये कौन लोग कर रहे हैं? आदिवासियों के लिए बनी हुई नीतियाँ, योजनाएँ, कार्यक्रम कितने प्रतिशत क्रियान्वित किए जाते हैं?ये सब ऐसे प्रश्न हैं जिनका उŸार देना गले की फाँस लगता है। आदिवासियों को बांटने के पूरे प्रयास किये जा रहे है और फूट में लूट मचायी जा रही है।

 

 

 

Dr. Janak Singh Meena

 

 

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