अंतिम व्यक्ति

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 


चुनाव आने या भाषण देते समय ही नेता अंतिम व्यक्ति की चिंता करने लगता है। सब अंतिम व्यक्ति की तरफ पीठ करके अंतिम व्यक्ति की तरफ दौड़ते है। पूज्य महात्मा गांधी कह गये हैं कि प्रजातंत्र तभी सफल होगा जब हम अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेंगे पर न तो वे अंतिम व्यक्ति को परिभाषित करके गये और न यह बतला कर गये कि समाज का अंतिम व्यक्ति कहां मिलेगा ?
हर नेता का भाषण अंतिम व्यक्ति से प्रारंभ होता है और किसी विरोधी पार्टी के प्रथम व्यक्ति पर समाप्त होता है। उसे शैतान, चारा खोर, वृहत पिशाच इत्यादि अलंकारो से विभूषित किया जाता है। वह अलंकृत प्रथम पुरूष भी अपना भाषण अंतिम व्यक्ति से चालू करता है और सामने के प्रथम पुरूष को अलंकृत कर समाप्त हो जाता है। जब आप अंतिम पुरूष को देखते हैं तो लगता है कि देश में अंतिम पुरूषो की बाढ़ सी आ गई है। सरकारी आंकड़ो के हिसाब से हर कार वाला, बंगले वाला अति गरीब है। एक एक कार वाले के पांच पांच अति गरीबी के प्रमाण पत्र रखे हुये है। जब आप आश्चर्य चकित होकर उनमें अति गरीबी का कारण पूछते हैं तो वे कहते है कि अम्बानी, टाटा, बिड़ला, अजीम प्रेमजी के मुकाबले में तो वे अति गरीब ही हैं।
मंत्री जी का हर चमचा अति गरीब है। हरेक को राशन की दुकान दिलवाई गई है। दूसरे और जो सचमुच अति गरीब है उसे अति गरीबी के प्रमाण पत्र नहीं मिल रहें है। अंतिम व्यक्ति को शासन धीरे-धीरे एक व्यवस्थित तरीके से आत्महत्या करने की तरफ धकेल रहा है। पहले अंतिम व्यक्ति दाल रोटी में गुजारा करता था अब दाल उनसे छीन ली गई है। दाल तो मध्यम वर्गीय लोगो के लिये “बजट” से भी फिसलती जा रही है। आज से पचास साल पहले अंतिम व्यक्ति कितने भाग्यशाली थे जो दाल रोटी खाते थे और हरि के गुण गाते थे और आज तो अच्छे अच्छों की दाल भी नहीं गलती। जिन्हें दाल नहीं मिलती थी वे प्याज के गटे के साथ रोटी खा लेते थे। आज प्याज का भी रोटी से तलाक हो गया है। प्याज तो क्या अमीरों तक को दाल आटे के भाव मालूम पड़ गये समझ में नहीं आता कि आपस में गाली गलौच करने वाले ये नेता अंतिम व्यक्ति तक क्यों पहंुचना चाहतें है। उसे चैन से क्यों नहीं रहने नहीं देते। अरे नेताओं, तुम तो काला धन बटोरो और विदेशो को भेजो। यही तुम्हारा कर्तव्य है। उसे पूरा करो अंतिम व्यक्ति को खेतो में हाड़ तोड़ मेहनत करके जिंदा रहने दो। चुनाव आने पर अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना कह कर न पहंुचना एक रिवाज सा बन गया है।
जो अंतिम पुरूष चुनाव जीत कर प्रथम पुरूष बन जाते है वे भी अंतिम पुरूष और पुरूजानी को भूल जाते है। ऊपर के बहुत सारे प्रथम पुरूषों का हित सोचने लगता हैं। अंतिम पुरूष प्रति भांति की तरह फिर ठगा जाता है। अपना ही आदमी उसे ठगने लगता है। चुनाव के समय अंतिम पुरूष के चारो ओर भेड़िये, मेमने का मुखौटा लगा कर उसको चारो तरफ मंडराने लगते है। अंतिम पुरूषो के हाथो में मत पत्र होता है जो चाकू की नोंक पर उससे छीन लिया जाता हैं। एक बार
एक प्रथम पुरूष अंतिम व्यक्ति को पंक्ति में देख रहा था। उसने अंतिम व्यक्ति से कहा रे अंतिम व्यक्ति तू तो कल मध्य में था तेरे पीछे वाले कहां गये ? वह हाथ जोड़ कर बोला “हूजूर वे भूखे मर गये या करों और मंहगाई के कारण उन्होने आत्म हत्या कर ली।
प्रशासन बोला सरकार, यह परोक्ष रूप से शासन की आलोचना कर रहा है “ही इज किटिसाइजिंग द एडमिनिस्ट्रेशन” यह राष्ट्र द्रोही है। प्रथम पुरूष ने पूछा क्या प्रशासन और राष्ट्र एक ही होते है ? “जी सर फाइलमेन झुक कर बोला” प्रथम पुरूष ने पूछा “क्या जेलो में जगह बची है कि इसको भी ठंूसा जा सके ? “फाइल मेन” उसी तरह झुक कर बोला देखते हैं सर कि कोई मरता है तो इसको अंदर कर देंगे। अंतिम व्यक्ति बोला “सरकार सर जल्दी करें नहीं तो शासन के जूतो के बढ़ते वजन से ये बाहर ही मर जायेगा। प्रथम पुरूष को दया आ गई। बोला प्रशासन सर, जेल में इतने व्यक्तियों को मारा जाता है। एकाध को मानवीय आधार पर जल्दी मार दिया जाये जिससे कि इसे अंदर कर दें। बाहर एक और अंतिम व्यक्ति कम हो जायेगा।
उधर विरोधी प्रथम पुरूष भी अंतिम व्यक्ति को लुभा जनता को भाषण के अलावा कुछ नहीं देते थे। इन्होने भी भड़का दिया कि वे भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहंुचेंगे। उनकी सभा के अस्तित्व अंतिम व्यक्तियों ने चिल्ला कर पूछा ”आप हम तक कैसे पहुंचेगे ? वह बोला “रिश्वत लेकर। हम बड़े घरानों से रिश्वत लेकर तुम लोगो तक पहंुचेंगे। अंतिम व्यक्ति ने कहा “इससे तो आप उन तक पहुंचेंगे हम तक नहीं। “सही पकड़े हैं “वह बोला इससे मंहगाई बढ़ेगी। चीजे मंहगी हो जायेगी फिर तुम लोग घिघियाते हुये हमारे पास आओगे इस तरह तुम लोग हम तक पहुंचोगे।”

 

 

 

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