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।। अनुवाद स्वतन्त्र विधा है।।--- डाँ.नन्दलाल भारती

 

 


अनुवाद किसी भाषा में कही अथवा लिखी बात का दूसरी भाषा में परिवर्तन अनुवाद होता है।वर्तमान में कम्प्यूटर एवं साफटवेयर के विकास के कारण मषनी अनुवाद होने लगा है परन्तु गुण्णवत्ता की दुष्टि से ये मषीनी अनुवाद सन्तोशप्रद नही कहे जा सकते।अनुवाद में आत्मसातीकरण की प्रक्रिया काम करती है परन्तु औपनिवेषिक अनुवाद ने भारतीय समाज,कानूनू,इतिहास,संस्कृति ,साहित्य परम्परा को भी आमसात् करने का प्रयत्न किया था। भारतीय नवजागरण की चेतना के निर्माण और प्रसार में विभिन्न जातियों के बीच संबन्धों के विकास और एक भारतीय दृष्टि से अनुवाद के योगदान का अभी ठीक से अध्ययन और मूल्यांकन होना बाकी है।महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जांन स्टुअर्ट की पुस्तक लिबर्टी का अनुवाद स्वाधीनता नाम से किया था जिसका पहल संस्करण 1907,दूसरा 1912 और तीसरा 1921 में प्रकाषित हुआ था। आचार्य रामचन्द्र षुक्ल ने जर्मन वैज्ञानिक अन्स्र्ट हैकल की पुस्तक रिडिल आफ यूनीवर्स का अनुवाद विष्व प्रपंच नाम से किया था।

 

अनुवाद सम्बन्धी सिद्धान्तों पर ग्रन्थों का लेखन बीसवीं शताब्दी से प्रारम्भ हुआ है। बीसवीं शताब्दी के दौरान साहित्यिक और भाषा वैज्ञानिक लेख पत्रिकाओं में छपने प्रारम्भ हो गये। इन्ही साहित्यिक और भाषा वैज्ञानिक पत्रिकाओं ने अनुवाद की परिभाषाओं को जन्म दिया।अधिकतर अनुवाद की परिभाषायें साहित्यकारों और भाषा वैज्ञानिकों के आत्ममंथन की उपज है।डाँ सुरेष कुमार के अनुसारर-एक भाषा के विषिश्ट भाषा भेद के विषिश्ट पाठ को दूसरी भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत कना अनुवाद है जिसमें वह मूल के भाशिक अर्थ प्रयोग के वैषिश्टय से निश्पन्न अर्थ,प्रयुक्ति और षैली की विषिश्टता,विशय वस्तु तथा सम्बन्ध सांस्कृति वैष्ष्टिय को यथासम्भव संरक्षित रखते हुए दूसरी भाषा के पाठक को स्वाभाविक रूप से ग्राह्य प्रतीत होता है।डज्ञँ रववीनछ्रनाथ श्रीवास्तव के अनुसार-एक भाषा।स्रोत भाषा। की पाठ सामग्री में अन्र्तनिहीत तथ्य का समतुल्यता के सिद्धान्त के आध्धर पर दूसरी भाषा।लक्ष्य। में संगठनात्मक रूपान्तरण अथा सर्जनात्मक पुर्नगठन की ही अनुवाद कहा जाता है।डां.भोलानाथ तिवारी अनुवाद को इस प्रकार परिभाशित करते हैं- भाषा रूवन्यात्मक प्रतीकों की व्यवस्था है और अनुवाद है उन्हीं प्रतीकों का प्रतिस्थापन अर्थात एक भाषा के स्थान पर दूसरी भाषा के निकटतम्।कथनः और कथ्यतः।समतुल्य और सहज प्रतीकों का प्रयोग। इस प्रकार अनुवाद निकटम्,समतुल्य और सहज प्रतिप्रतीकन है।



वर्तमान समय में अनुवाद का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है। अनुवाद के माध्यम से अन्र्तराष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्बन्ध और राजनयिक विधानों का समझा जा रहा है।राष्ट्राध्यक्ष जो कुछ बोलते है लिखते हैं उसको अनुवाद के द्वारा ही समझा जाता है।अध्यापन कार्य में भी अनुवाद का महत्वपूर्ण योगदान है। विभिन्न भारतीय भाषाओं और विदेषी भाषाओं को समझने-समझाने में अनुवाद का विषेश महत्व रहा है। द्वितीय विष्व युद्ध के बाद और भारत के आद होने के बाद से दुनिया भर के देषों से सम्बन्ध बनाने में अनुवाद ने उल्लेखनीय काम किया है।सांसकृति विरासतों का भी अनुवाद के माध्यम से जाना पहचाना गया है।अनुवाद को षिक्षाषास्त्र के रूप में देखा जाना चाहिये । हाई स्कूल से अनुवाद को पठन-पाठन का विशय बनाने के बारे में सोचना चाहिये,इसमें देष की प्रान्तीय/क्षेत्रीय भाषाओं सहित विदेषी भाषाओं को शामिल किया जाना उचित होगा। इससे अनुवाद विधा का महत्व तो बढ़ेगा ही साथ साथ राष्ट्रीय अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेगे।




अनुवाद भाषाविज्ञान के अन्र्तगत् स्वतन्त्र विधा है। अनुवादक के विभिन्न आयामों में वैज्ञानिक अनुवाद अलग सिद्धान्त और अनुप्रयोग की अपेक्षा रखता है। अनुवाद में भाषा की व्याकरणिक संरचना और वैज्ञानिक सिद्धान्त की अवधारणाओं से भी परिचित होने की आवष्यकता है। वर्तमान विज्ञान के युग में विज्ञान और उसके अनुप्रयोगों को सामान्यजन तक पहुंचाने की जरूरत है।संचारक्राति और व्यापारीकरण के इस युग में अनुवाद आवष्यक हो गया है। वर्तमान दौर में अनुवाद कोई कई श्रेणियों में रखा जा सकता है। उदाहरण के लिये-प्रषासनिक, व्यावसायिक, आर्थिक,वित्तीय, सामान्य, कानूनी,साहित्यिक,चिकित्सीय,तकनीकी अनुवाद। देष में अनुवाद को बढ़ावा देने के लिये राष्ट्रीय अनुवाद की स्थापना की गयी है, जिसका उद्देष्य ज्ञान आध्धरित मूलपाठों को अनुवाद के माध्यम से भारतीय संविधान की अश्ठम अनुसूची में सम्मिलित भाषाओं में उपलब्ध करना है।



सार में कहा जा सकता है कि अनुवाद भाषान्तर नही है इसमें संवेदनात्मक जुड़ाव जरूारी है। सा्रेत भाषा के बदले लक्ष्य भाषा में शब्दकोशीय अर्थ प्रस्तुत कर देना अनुवाद नही हो जाता,सही अनुवाद तो वह है सो्रत भाषा के लक्ष्य भाषा में वास्तविक और हृदय ग्राहय अर्थ प्रस्तुत करे।अनुवाद के लिये भाषा,ध्वनि,अर्थ,वाक्य,रूप और शब्द विज्ञान का विषेश महत्व होता है। ऐसे ही अनुवाद नवजागरण,चेतना निर्माण,षिक्षा समाजिक समानता-सदभावना,विभिन्न जातियों के बीच सम्बन्धों के विकास,राष्ट्रीय और अन्र्तराष्ट्रीय सम्बन्धों को जन एवं राश्ट्रोपयोगी बनाते है। इसीलिये अनुवाद एक विधा ही नहीं कला और विज्ञान भी है।

 

 

 

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