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अपनी निगाहों से गिरकर कैसे जिओगे?


(डाॅ. शशि तिवारी)

 

भारत को आजाद कराने के लिए न जाने कितनी माताओं की गोद सूनी हुई न जाने कितनों का सुहाग, न जाने कितनों के भाई, सुख-सुविधाओं को छोड़, मान-सम्मान एवं बड़े ओहदों को छोड़ देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देश पर मर मिटे और देश को आजाद करा आने वाली पीढ़ी को खुली हवा में सांस लेने देश को, समाज को प्रगति के पथ पर बढ़ाने की जिम्मेदारी आज के नेताओं के कंघों पर छोड़ गए है। भारत के बलिदानियों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिन नेताओं के कंघों पर देश/प्रदेश को आगे बढ़ाने का जिम्मा है वही सुख-सुविधाओं, धन्धों की खातिर भ्रष्टाचार के दलदल मंत आकण्ठ डूब देश/प्रदेश के मतदाताओं के साथ न केवल धोखा दे रहे हैं बल्कि देश/प्रदेश के साथ विश्वासघात भी कर रहे है, फिर बात चाहे 2 जी स्पेक्ट्रम की हो या प्रदेश में अवैध खनन की हो। जो बढ़ा वह जनता की गाढ़ी कमाई एवं प्राकृतिक सम्पदा को लूट कर ही आगे बढ़ा। नतीजन अब भ्रष्टाचार हमारे खून में इतना समा गया है कि सच-झूठ, वैध-अवैध में फर्क करने की समझ ही जाती रही।
आज अराजकता का ये आलम है कि अधिकांश अपने दायित्वों से बचते ही नजर आ रहे है फिर बात चाहे अफसरों की हो या जनप्रतिनिधियों की। आज जनप्रतिनिधियों का ये आलम है कि अपने नफे-नुकसान के लिए जनता को ही मोहरा बना बंद, आगजनी, शासकीय सम्पत्ति की क्षति कराने से भी नहीं चूकते।
अभी हाल ही में विधानसभा में भ्रष्टाचार मुद्दे को ले अतिउत्साहित कांग्रेस जोश में होश खोने से अपने दो विधायको को शहीद कर चुकी ने जनता के बीच प्रदर्शन के माध्यम से अपनी बात रखने की पहल ने जहां कांग्रेस को एकजुट होने का प्रयास किया ही था कि इसी बीच दोनों निष्कासित पूर्व विधायकों द्वारा पुनः अपनी बहाली की, खेद/दया/माफी, याचना ने पूरे कांग्रेस को गहरी खड्ग में दफन कर दिया। राजनीति में स्वहित के चलते न केवल हाईकमान पार्टी की नजरों में गिरे बल्कि जनता की नजरों में भी बुरी तरह से गिर चुके है? दया की ऐसी घटनाएं अंग्रेजों के जमाने की यादें ताजा कर देती है जिसमें स्वहित के चलते कुछ भारत के साथ दगा करते रहे। यहां सिर्फ मोहरे ही बदले हैं। मेैं यह नहीं जानती कि दोनों पूर्व विधायकों की ऐसी क्या मजबूरी थी जो खुद के स्वाभिमान के साथ जनता के विश्वास को भी गिरवी रख ये कदम उठाया या फिर एक रणनीति? कभी ऐसा भी लगता है। ‘‘कुछ तो मजबूरियां रही होगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता।’’
यहां कई यक्ष प्रश्न उठ खड़े होते हैं मसलन दोनों विधायक कोई पहली बार विधायक नहीं बने थे। अपनी एवं जनता की नजरों में गिरकर कैसे जी पायेंगे। धोखा खाई क्षेत्र की जनता अब किसकी शरण में जायेगी। खेद/माफी/दया के अनुरोक्ष से कही न कहीं क्षेत्र की जनता भी आहत होगी? सोचती भी होगी जब उसका अपना जनप्रतिनिधि ही भ्रष्टाचार की आवाज उठा अपनी विधायकी के जीवन की मिन्नत कर रहा है तो फिर जनता की क्या मजाल वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाए? शर्म तो इस पर भी आ रही है कि क्यों ये जनप्रतिनिधि बने? कम से कम ये बदनामी या कलंक तो माथे पर नहीं लगता? इनके इस कृत्य से अब कांगे्रस हाईकमान भी शर्मिंदगी महसूस कर रहा है। अब इनके खिलाफ ये क्या कार्यवाही करता है यह भविष्य के गर्भ में हैं। यहां राजेश खन्ना की एक बात ‘‘जिंदगी लम्बी नहीं बड़ी होनी चाहिए।’’ बार-बार याद आती हैं।
यहां भाजपा कांग्रेस के दो शेरों का शिकार कर पुनः न केवल कूटनीति में सफल हुई बल्कि एक शक्ति एवं विश्वास के साथ भी उभरी हैं। उसने अनुशासन का डण्डा चला बाकी के जनप्रतिनिधियों के मन में भी डर एवं भय भी पैदा कर दिया है जो कि निःसंदेह अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
भारत स्वतंत्र जरूर हो गया लेकिन मानसिक गुलामी से कब मुक्त होंगे? यह यक्ष प्रश्न अभी भी है।
‘‘वो जिनके जिक्र से रगों में दौड़ती थी बिजलियां
उन्हीं का हाथ हमने छू के देखा कितना सर्द हैं।’’

शशि फीचर

लेखिका ‘‘सूचना मंत्र’’ पत्रिका की संपादक

 

 

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