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भारत के गाँव---डा० श्रीमती तारा सिंह

 

 

पृथ्वी के आरम्भकाल से ही भारत गाँव प्रधान देश रहा है । यहाँ के 80% लोग गाँवों में बसते हैं, इसलिए तो हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी कहा करते थे; ’भारत गाँव में बसता है’ । यहाँ की रोजी-रोटी का जरिया खेती है । यह अलग बात है, कि आज भारत के गाँव पहले जैसे नहीं रहे, अब यहाँ अधिकतर गाँवों में बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हैं –जैसे, सड़क, बिजली, छोटे-मोटे स्कूल, डाक्टर इत्यादि ।


अब गाँव से शहर जाने के लिए , यातायात के बहुत से साधन उपलब्ध हैं; जिन गाँवों में नहीं है, वहाँ शीघ्र बनाने की कोशिश में सरकार जुटी हुई है । महानगरों और छोटे औद्योगिक नगरों के आस-पास बसे गाँव इन नगरों—महानगरों में समाते जा रहे हैं ,इनके अंग बनते जा रहे हैं । बावजूद इन गाँवों का वातावरण लगभग पहले जैसा है, उनके खान-पान, रहन-सहन में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया है । लेकिन जो गाँव , दूर –दराज जंगलों—पहाड़ों में बसे हुए हैं, उनमें इन अंतरों का छूआ भी नहीं लगा है ; वे आज भी पहले जैसे हैं । उनके, रीति-रिवाज, उठने –बैठने, बोलने –चालने का तरीका सब पहले जैसा,ज्यों का त्यों है । अत: गाँधी जी का यह कहना,’भारत गाँव में बसता है’, आज भी सत्य है ।


आज से तीस-चालीस साल पहले, गाँव का नाम सुनते ही ,उसकी आकृति आँखों के आगे कुछ इस प्रकार बनती थी – गाँव के पास हरे-भरे खेत ,छोटी पगडंडियाँ , ऊबड़-खाबड़ रास्ते, इधर-उधर भटकते गाय-भैंसें, बकरियाँ और उनके पीछे एक लंगोट में,सर पर गमछे को बाँधे, लाठी लेकर भागते चरवाहे ,दीवारों पर सूख रहे उपले गाँव के छोड़ पर, छोटे-मोटे पोखर, उसमें नहाते –तैरते पशुएँ,बच्चे ; कुछ कच्चे,कुछ पक्के मकान, तो कुछ पुआल से बने झोफड़े, झोपड़े के आगे मिमियाती बकरियाँ,शाम होते,हर घर से मिट्टी के चुल्हे से जलती लकड़ियों के धुएं, चौपाल में गप-शप लड़ाते गाँव के बूढ़े बुजुर्ग, शोर मचाते –खेलते बच्चे, भों-भों करते कुत्ते, परिश्रम से थकी---मैली-कुचैली,मगर दिल की साफ़,फ़टी-चिटी साड़ी में लिपटी स्त्रियाँ, हुक्का गड़गड़ाती आँगन में बैठी दादी, कांधे पर लिए हल,खेत को जा रहे किसान, घर में जरूरत भर के बर्तन और दरवाजे पर पूरे मोहल्ले के लिए एक कुआँ; ऐसा था हमारा पुराना भारतीय गाँव ; बाकी तो गाँव के आदमी दीनता के साकार रूप ही हुआ करते थे । फ़िर भी यहाँ की एक विशेषता थी, लोग भूखे पेट नहीं रहते थे ; ऐसी सद्भावना का वातावरण वहाँ रहता था । हाँ, श्रम- ऋण के रूप में जो शोषण का सामन्ती -क्रम जारी था, वह एक अलग बात है ,जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी है और आगे भी रहेगी ।


आज का आधुनिक गाँव, पुराने गाँव के ठीक विपरीत है,यहाँ के लोगों में बाहरी और भीतरी ,दोनों रूप-रंग में भी गुनात्मक परिवर्तन आया है । जहाँ छोटी संकड़ी पगडंडियाँ थीं, वहाँ पक्की-चौड़ी सड़कें बनाकर राज-मार्गिं से जोड़ दिया गया है । अधिकतर गाँवों में बिजली भी पहुँच चुकी है ;घर-घर में दूरदर्शन होना तो आम बात हो गई है । नगर विकास जैसी संस्थाएं गाँव की सीमा पर पीने के पानी की व्यवस्था में, कुएँ खुदवा दिये हैं या ट्यूब-वेल लगवा दिये हैं । खेती के काम में आने वाले आधुनिक औजार और बीज से आज गाँवों की काया ही बदल गई है । अच्छी उपज, बेहतर आमदनी,लोगों के रहन-सहन, खान –पान में भी अंतर ला दिया है । बेकारी की समस्या बहुत हद तक कम हुई है । छोटे-छोटे ग्रामीण उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए तथा उत्पादन को सही मूल्य में बिक्री के लिए, हाट-बाजार की भी व्यवस्था की गई है । कुल मिलाकर भारत का अधिकतर गाँव ,आज आधुनिक हो रहा है। इस आधुनिकता के साथ-साथ ,यहाँ राजनीति और शहरी दुष्प्रवृतियाँ का भी तेजी से प्रवेश होने लगा है ।; जिसके कारण रहाँ का वातावरण अन्य बड़े शहरों की तरह दूषित होने लगा है । इसके अलावा छोटे-मोटे कल-कारखानों ,उद्योंगों से निकले धुएं और गन्दे पानी के (मशीनीकरण) कारण यहाँ का पहले सा स्वास्थ्यप्रद,शुद्ध वातावरण नहीं रहा । अनेक प्रकार की बीमारियाँ यहाँ अपना पैर पसारने लगी हैं; गाय-बैलों के गले की घंटियों की आवाज भी अब धीमी पड़ने लगी है ।


अपने सद्भाव और मुलायम स्वभाव ,जिसके लिए ग्रामीणों को सीधे-सादे इन्सानों में गिना जाता है, उनमें तेजी से बदलाव आने लगा है । यूँ कह सकते हैं, सद्भाव और सहायता की भावना अब खत्म हुई जा रही है । एक ओर जहाँ रुढ़ियों और शोषणों के प्रति जागरुकता आई है, वहीं नई पीढ़ियों में नये प्रकार का शोषण भी आरम्भ हो गया है । वास्तव में हमारा गाँव, हमारे देश की अर्थ-व्यवस्था की रीढ़ है ,और रीढ़ के कमजोर होने से शरीर का स्वस्थ रहना मुश्किल है । इसलिए अगर हम चाहते हैं,कि हमारा देश स्वस्थ और सुंदर बना रहे, तो इसके लिए भारत की अर्थ-व्यवस्था की रीढ़ को ठीक रखना होगा । कार्य-कुशलता का अभाव हमारे देश में नहीं है, कमी है सच्चरित्रता और दृढ़--संकल्प का । लाल फ़ीता साही देश की अर्थ व्यवस्था को खाई में धकेलता जा रहा है । इसे रोकना होगा, नहीं तो गाँव उजड़ जायगा । ऐसे भी ग्रामीणों का जीवन, भट्काव में बीतता है, समय पर बारिश का न होना, पटवन का अभाव उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा । उस पर गाँव के प्रति सरकार की धीमी रवैया व अशि्क्षा-अंधविश्वास, ये सभी दीमक की तरह उन्हें खा-खाकर पूरे रहने कहाँ देते हैं । गाँव में बसा गाँधी का भारत, यदि प्रगति और उन्नति करता है; तभी देश की उन्नति होगी । इस गाँधीवादी चेतना और मान्यता के अनुसार जब हम देश के गाँव-गाँव को अगर हम उन्हीं के सेवाग्राम सा एक आदर्श गाँव बना सके तभी हमारा देश आगे बढ़ेगा । गाँव को दरकिनार कर एक स्वस्थ भारत की कल्पना, भूल है । इसलिए हमें ’देश बचाओ’ के पहले,’गाँव बचाओ’ का नारा देना चाहिये ।
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