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’हम , हमारी आधुनिकता और हमारे बुजुर्ग’

 

 

- डाँ. सुनील कुमार परीट

 

 

Pearl S. Buck जी का कहना है, “Our society must make it right nad possible for old people not to fear the young or be deserted by them, for test of a civilization is the way that it cares for its helpless members.” बुजुर्ग सामाजिक आपत्ति नहीं बल्कि वे समाज के अनमोल धरोहर हैं। भारतीय सनातन शर्म के, सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था के नींव हैं। इसलिए हमारे देश में प्राचीन काल से ही बुजुर्गों का आदर-सम्मान करने की प्रथा एवं परम्परा प्रचलित में है, और यही तो हमारी उच्चकोटि की संस्कृति है। बुजुर्ग यानी हमारे दिमाग में है कि बहुत ही उम्र के साथ अनेक अनुभव प्राप्त किये हुए व्यक्ति की छवि सामने आती है। सही राह पर हम चलते हैं उसका मूल कारण है हमारे बुजुर्ग। हर कदम को हम स्वयं बलबूतों पर नहीं चलते, अगर हमारा हर कदम सही नेक राह पर चलते है तो मान ही लेना चाहिए कि हमे हमारे बुजुर्गों के अनुभव का मार्गदर्शन प्राप्त है। पहले जो राह में पत्थर से ठोकर खाता है उसके बाद पीछेवाला कोई भी ठोकर नहीं खाता, क्योंकि पहले जिसने ठोकर खाया है वही तो हमारे बुजुर्ग हैं। इस तरह हमे सही राह पर चलाने वाले बुजुर्गों के साथ क्या आज हम उनके साथ सही व्यवहार से बर्ताव करते हैं। इस प्रश्न का उत्तर तो आमतौर पर नकारात्मक ही होगा।


अनेक बार कठिन मोड आने पर या कठिन समय में हमारे बुजुर्गों के सही निर्देशानुसार हम सुरक्षित पार हो जाते हैं। तो ऐसे समय में बुजुर्ग किनको माना जाए? घर-परिवार में दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता और सास-ससुर होते हैं, समाज में उम्र में बडे या गुरुजन होते हैं यही लोग तो हमारे बुजुर्ग हैं। जिनके अनुभवों के सहारे हम जीते हैं, जिनके मार्गदर्शन से हम अपने जीवन को निहारते हैं वही तो हमारे बुजुर्ग हैं। आज इस भागदौड की दुनिया में घर के पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, तब बुजुर्ग घर में रहने से बच्चों की देखभाल करते हैं। बुजुर्ग बच्चों में अच्छे संस्कार एवं संस्कृति भरते हैं। बुजुर्गों की छत्रछाया से बच्चे नैतिक मूल्य और अच्छी सभ्यता को आत्मसाथ कर लेते हैं। बुजुर्गों के राह में कदम पर कदम रखते आगे बढेंगे तो सागर रुपी जीवन को सुखमय बनायेंगे। बालगंगाधर तिलक जी का कहना है,”तुम्हें कब-क्या करना है यह बताना बुध्दि का काम है, पर कैसे करना है यह अनुभव ही बता सकता है।"

 

मध्यप्रदेश के सामाजिक न्याय मंत्री गोपाल भार्गव जी ने कहा था कि ’जिन घरों-परिवारों में बुजुर्ग माता-पिता की ठीक ढंग से देखभाल अथवा संरक्षण नहीं हो रहा है उनके विरुध्द ’माता -पिता भरण -पोषण अधिनियम ’ के तहत सख्त कार्यवाही की जाएगी। अधिनियम के तहत दस हजार रुपये का जुर्माना एवं तीन माह की कैद जारी किया गया है।’ तो इस तरह के कानून देश के अनेक इलाकों में जारी हैं। फिर भी हर दिन भीख माँगते हुए अनेक बुजुर्ग फूटपाथों पर दिखाई देते हैं, पत्रिकाओं में पढते हैं अनेक बुजुर्ग तंग आकर आत्महत्या कर ले रहे हैं। तो क्या इस तरह के कानून या अधिनियम बनाने से बुजुर्गों की रक्षा या भरण-पोषण हो रहा है? सवाल कानून का नहीं है, संबंध का है। विपर्यास है कि खून के रिश्ते संभालने के लिए कानून आ रहे हैं, और इससे बडी दुख की बात कौनसी हो सकती है।

 

आज की आधुनिकता और बाजारवाद के दौर में बुजुर्गों के प्रति सबमे अलगाव की भावना पैदा हुई है। परिवार में, समाज में बुजुर्गों का अपमान किया जा रहा है, उनें कोई मान-सम्मान नहीं मिलता तो भी कोई बडी बात नहीं, परंतु आजकल की ये युवा पीढी उने अपनेआप को जीने तक नहीं देती। इसके अनेक कारण हो सकते हैं- बिखरते संयुक्त परिवार , पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव , वैज्ञानिक-तकनिकी प्रगति , संपर्क माध्यमों के दुष्प्रभाव। अनेक घरों में प्राणी के समान बुजुर्गों को अलग कमरे में बंद कर रखा गया है। संयुक्त परिवार की जगह अजकल एकल परिवार जन्म ले रही हैं। तो ऐसे संदर्भ में कहते हैं- ’नीम का पौधा लगाकर आम की अपेक्षा करना ।’ क्योंकि आज चारों ओर एक स्वर गूँज रहा है कि सामाजिक, धार्मिक, नैतिक मूल्य गिर रहे हैं। जब घरों-परिवारों में बुजुर्ग ही नहीं है तो बच्चों में नैतिक मूल्य कहाँ से पैदा होंगे? जिन्होंने हमारी उँगली पकडकर हमे चलना सिखाया, आज उन्की स्थिति अत्यन्त दयनीय होती जा रही है, नहीं आज के लोग आधुनिकता की थपेट में वैसी स्थिति निर्माण कर रहे हैं। जिन्होने खून-पसीना भहाकर चार-पाँच बच्चों का पेट भरकर इतना बडा करते हैं, किन्तु आज वही बच्चे उनकी माता-पिता या बुजुर्गों के भरण-पोषण के संबंध में उने बाँट दिया करते हैं। तो क्या ये आधुनिक मानवीयता है? इसीलिए आज वृध्दाश्रम और old age home खुले हैं। जिन्होने जहाँ पर अपना घर परिवार बसाया था, अपने बच्चों के लिए वे सबकुछ समर्पण कर देते हैं। अनेक दुख-परेशानी के बीच भी चुप रह जाते हैं।

 

अब हमे इन वीडिओ गेम, फेसबुक, ई-मेल से हटकत हमारे वजूद बुजुर्गों के बारेमे सोचना ही चाहिए नहीं तो बहुत देर हो जाएगी। यहाँ हम सब लोगों को एक बात समझनी है कि, आज हम इस धरती पर हैं तो इसका मूल कारण कौन है, वही हमारे बुजुर्ग। बुजुर्ग न होते तो हम कहाँ आकाश से टपकते। हमारे जीवन में बुजुर्गों की महता जितना जानेंगे उतना कम है। यह जिन्दगी ही आज जो भूखे है उन बुजुर्गों की भीख है। बुजुर्ग कभी किसी का बुरा नहीं चाहते, पर हमारा व्यवहार मात्र उनके प्रति विपर्यासजनक है। हमे मानना है-

 


"बुजुर्ग हमारे बोझ नहीं
बुजुर्ग हमारे सुकून है।
जीवन हमारा संवारते हैं
पहले वे राह में निपूण है॥ "

 

 

 

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