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चाय तो चाय ही है

 

 

सर्दी हो या गर्मी ,पतझड हो या काली काली मेघोँ वाली बरसती या बिन बरसती समॉ ,समूह मेँ होँ या तन्हा ,रात हो या दिन ,खाली पेट हो या भरा चाय के क़द्रदानोँ के लिए चाय से बढिया और लुभावनी चीज और भला क्या हो सकती है .रेलवे स्टेशनो पर या ट्रेन के भीतर ,बस स्टैंड पर केट्ली लेकर “चा गरम चा गरम ‘ की आवाज मुसाफिरोँ की आंखोँ मेँ कैसी उत्सुक्ता जगा देती है ,और मन चाय पीने के लिए कितना बेचैन हो जाता है इसे वही महसूस कर सकता है जो इसका सच्चा आशिक हो . हॉ ,गर्मी मेँ थोडी सी मंद जरूर नजर आती है हमारी राश्ट्रीय पेय चाय .
एक साधारण पेय चाय का इतना असाधारण तरक्की वास्तव मेँ काबिले तारीफ है .इसकी मोटी कमाई ईस्ट इंडिया कम्पनी भुला नही पायी है ,और एक बार फिर से एक नए अंदाज मे वह भारत मेँ चाय बेचना चाह रही है .
कहा जाता है कि चाय का प्रयोग सर्व प्रथम चीन मेँ हुआ था .एक चीनी राजकुमारी जब अपने बागीचे मेँ टहल रही थी तो उसके गर्म पानी के कटोरे मेँ एक पेड का पत्ता गिर पडा .जब उसने उस पानी को पिया तो उसे बेहद स्वादिश्ट लगा .पता चला वह चाय का पत्ता था .
आज की दुनिया मेँ यह पत्ता कई द्वीपोँ ,महाद्वीपोँ को लॉघताहुआ कहॉ कहॉ नहीँ पहुँचकर अपना जड जमा चुकाहै .
हिंदुस्तान मे चाय को इतना लोकप्रिय बनाने मेँ अंगरेजोँ का बहुत बडा हाथ रहा है .वैसे चाय की चर्चा रामायण मेँ हुई बतायी जाती है ,मगर एक लम्बे अंत रा ल तक इसकी चर्चा नही सुनाई पडी .बहुत समय बाद बौध संतोँ के साथ इसकी झलक देखने को मिली . औशधिय गुण से लबरेज इसके पत्तो को कुछ आदिवासी समुदाय मेँ पीने की प्रथा पायी गई है
वैसे यहॉ के इतिहास मे लोक् प्रिय पेय के रुप मे दूध ,लस्सी ,छाछ आदि को ही माना जाता रहा है और नगर से लेकर गॉव तक यही सब चलन मेँ था ,मगर ब्रिटिश भारत मेँ यह द्रिश्य बदलने लगा . पहले चाय पर चीन का एकाधिकार था इसे तोडने के लिए अंगरेजोँ ने भारत मेँ चाय की खेती शुरु की . 166 साल पहले उन लोगोँ ने जो भी इसकी खेती करना चाहता था बुला बुला कर दार्जिलिंग मे चाय की खेती करवाना शुरु करवाया .और ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इसकी बिक्री शुरु कर दी . भारत मेँ इसे लोक प्रिय बनाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाए .मजमा लगाए गए ,नाच गानो का आयोजन किया जाता ,और एकत्रित भीड को मुफ्त मेँ चाय पिलाकर चाय की पत्ती बॉटी जाती .
अंगरेज लोग सुबह उठते ही बेड टी पीते थे ,जो हिंदुस्तानी अफसरोँ मेँ सिर चढ कर बोलने लगा . बडे बडे टी पॉट मेँ चाय लाए जाते ,और पीने तथा पिलाने वाले का शान देखते ही बनता था .देशी राजे रजवाडोँ ने इसका खूब अनुकरण किया ,और उनके मातहतोँ की तो बात ही क्या ? सरकारी चपरासी ,औडर्ली तक साहबी ठाठ से कुर्सी पर बैठ कर बडे अंदाज के साथ धीरे धीरे सिप करते हुए पिया करते थे .
तत्कालीन समाज के द्वारा इस पेय को काफी विरोध का सामना करना पडा ,लोगोँ ने इसे स्वास्थ के लिए हानी कारक बताया था . मगर लाख विरोध के वाब जूद छोटे हॉटलोँ ,ढाबोँ से होता हुआ यह घर घर मेँ बहुत तेजी से प्रवेश करता गया .बेटिओँ की दहेज मे सम्पन्न लोग टी पॉट भी देना अपना शान समझने लगे .इसी शोध के अंतर्गत पता चला कि महराजा सिंधिया ने अपनी बेटी को सोने का जो टी सेट दहेज मे दिया था उसका आज के बाजार् अनुसार डेढ करोड मूल्य है .अब सभी लोग तो महाराजा की तरह अपनी बेटिओँ को इतनी महगी तोहफा तो नही दे सकते थे ,इसलिए अन्य धातुओँ का भी प्रयोग हुआ होगा .
भारत मेँ चाय दूध ,पानी ,चीनी मिलाकर उबाल् कर बनाई जाती है . चाय कई किस्म की होती है ,मसाले वाली चाय ,नीँबू वाली काली चाय ,कडक चाय .
चाय की प्रतिस्पर्धा कॉफी से होती रही है .मगर कहॉ राजा भोज ,कहॉ गंगू तेली बात रह गयी .
भारत आज विश्व के चाय उत्पादक देशोँ मे प्रमुख है . यहॉ की उत्पादित चाय का 70% यहीँ खपत हो जाती है . दार्जिलिंग की चाय अपनी गुणवत्ता के लिए विश्वविख्यात है , ग्रीन टी के क्षेत्र मेँ भी भारत का काफी नाम है . चाय के क्षेत्र मे बहुत सारे नए नए शोध किए जा रहे हैँ .
चाय उत्पादकोँ और मजदूरोँ के बीच काफी विवाद पूर्ण रिश्ता रहा है चाय बागान के मालिकोँ के शोशन पर कितने सारे फिल्म भी बन चुके है.कई क्लासिक नॉवेल अंगरेज लेखकोँ द्वारा ही लिखी जा चुकी है गरीब मजदूरोँ के शोशण की वे सब लोम हर्शक कथाए आज भी लोगोँके जेहन मेँ जीवित हैँ .आजादी के बाद भारत सरकारने इस दिशा मेँ समय समय पर काफी ठोस कदम भी उठाए हैँ .आज भारतीय चाय उद्योग भारत मेँ दूसरी सबसे बडी कामगारोँ वाली जगह है दूसरे शब्दोँ मे, .एक कप चाय जो हमारे हाथोँ तक पहुँचती है उसे वहॉ तक और उस रूप मेँ पहुँचाने मेँ असंख्य लोगोँ की मेहनत होती है . चाय पत्ती का दाम उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करता है .इसको परखने के लिए अन्य माप दंडोँ के साथ टी टेस्टर की भूमिका भी अहम होती है .
चाय उत्पादक राज्यॉ मे प्रमुख हैँ ,असम ,पश्चिम बंगाल ,तमिल् नाडु ,केरल ,उत्तराखंड ,सिक्किम ,मणिपुर ,मिजोरम ,मेघालय ,बिहार और ओडिसा .
चाय अमीर ,मध्य,और गरीब सभी तबकोँ मेँ लोक् प्रिय है .अमीरोँ की टी पार्टी मेँ जहॉ भर पेट भोजन हो जाता है ,वहीँ मध्य वर्ग बिस्कुट के साथ चाय का लुफ्त उठाता है तो गरीब सिर्फ चाय को जोर से सुडुक सुडुक कर पीने मेँ ही आनंद के अथाह सागर मेँ गोता लगाने लगता है .
चाय व्यक्ति के औकात के अनुसार सुंदर सजिले सोने चॉदी के बरतनो,कीमती सेरामिक सेटोँ ,डिस्पोजेबल ग्लासोँ ,शीशे के ग्लासोँ या फिर मिट्टीके छोटे छोटे कुल्हडोँ मे परोसकर पीया और पिलाया जाता रहा है .
चाय ताजगी और स्फुर्ती दायक भी होती है और कम पैसे मेँ सर्वत्र उपलब्ध भी हो जाती है इसलिए यह सबकी प्रिय है और आम लोगोँके रोजी रोटीका साधन भी .,एक केटली या
एक सौस्पेन ,चीनी ,चाय पत्ती ,दूध स्टॉव ,और कुछ शीशे के ग्लास ,बस कहीँभी धंधा शुरू कोई खास लागत की जरुरत नही ..हमारे देश के प्रधान मंत्री के उम्मीद्वार श्री मोदी जी ने इस धंधे को और भी गौर्वांवित किया है .इससे देश के कोने कोने के असंख्य चाय बेचने वालोँ को एक साकारात्मक सोच मिला है ,और उनकी आंखोँ मेँ भी नन्हे नन्हे सपनो के अंकुर लहलहाने लगे हैँ .
वैसे चाय को राजनीति से क्या काम ,हॉ उसके दाम और भी बढ सकते हैँ ,मगर चाय तो चाय ही है ,वह तो वैसे ही लोगोँ की जुबान पर चढी हुई है .

 

 

 


कामिनी कामायनी .

 

 

 

 

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