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चेतना का मण्डीकरण

 

 

 

by  Jarry Mander and translated by कुमार सुशील

 

 

 

क्या विज्ञापन कानूनन वैद्य है? बहुगिनती लोगों का मानना है कि विज्ञापन हमारे जीवन और चेतना पर बिना हमारी मर्ज़ी के दख़लअन्दाज़ी ही नहीं करता बल्कि हमारे जीवन पर हमला भी करता है। फिर भी बिना किसी घबराहट के हम इस सम्बन्ध में सुचेत हो सकते हैं, यह तथ्य हमारी हुक्मबरदारी की तरफ इशारा करता है। विज्ञापन और सत्ता के संबंधों के बारे में नाम मात्र चर्चा हुई है। हालांकि यह सम्बन्ध भ्रष्टाचार के दलदल में डूबे हुए हैं। फिर भी कुछ लोग इस बारे में बोलने और सुनने की हिम्मत रखते हैं।
ऐ.जे. लिवलिंग का मशहूर कथन है ‘‘प्रैस की आज़ादी लाज़मी मिलेगी अगर आप इसके मालिक हों तो।’’ विचार रखने की आज़ादी भी लाज़मी मिलेगी अगर आप कुछ अरब डालर खर्च करके एक प्रभावशाली मीडिया गुटबाज़ी करने में सक्षम हों। मंचों से दिए गए लच्छेदार भाषण लोगों को दीर्घकाल तक मूर्ख नहीं बना सकते। विज्ञापन अपने लागत मूल्य से कई गुना अधिक प्रभावशाली होता है। विज्ञापन का असली चरित्र उस चलती-फिरती तस्वीर में है जो दर्शकों को घण्टों अपने चक्कर में फंसा कर रखती है। इतिहास में हम इस तरह की स्थिति के साथ पहली बार आमने-सामने हो रहे हैं जो हमारी चेतना पर इस प्रकार हमला करती है। बावजूद इंटरनैट युग के, टैलीविज़न और विज्ञापन के महत्व में कोई कमी नहीं आई, चाहे यह मसला जांच पड़ताल का हो या बहस का।
विज्ञापन पेशे में काम करने के आरम्भिक दिनों में ही मुझे यह साफ समझ आ गया था कि मेरा काम लोगों का ध्यान इस बात से हटाना है कि वह क्या सोचते हैं या क्या करना चाहते हैं। जबकि उनका ध्यान मुवक्किल के लिए तैयार की गई जानकारी पर ही केन्द्रित करना है। हमारे सारे ही विज्ञापन एक गुट विशेष को दूसरे पर कब्ज़ा करने की कोशिश है। अब इस देश (अमरीका) में विज्ञापन पर 150 अरब डालर सालाना खर्च किए जाते हैं जबकि सारी दुनिया में 450 अरब डालर। विज्ञापन पर खर्च किए हर एक डालर का एक ही उद्देश्य होता है - लोगों को विज्ञापन कर्ता की इच्छा अनुसार व्यवहार करने के लिए मज़बूर करना। बहुत ही कम लोगों के पास मीडिया द्वारा विज्ञापन कर्ता के पास अपना इतराज प्रगट करने का अवसर होता है। न ही लोगों के पास चीज़ों को खरीदने के इलावा प्रसन्नता के दूसरे साधनों के बारे में सुझाव देने का अवसर होता है। यह अवस्था एकतरफ़ा सौदे को अन्ज़ाम देती है। विज्ञापन कर्ता तर्क देते हैं कि उपभोक्ता के पास चीजों को न खरीदने की आजादी होती है। कहने को तो यह बात अच्छी लगती है पर वास्तव में वह हमें हाँ या ना के चक्कर में उलझाना चाहते हैं जिस तरह एक पार्टी सिस्टम में वोट डालने की आज़ादी और यह बात हर दिन हज़ारों बार दोहराई जाती है।
विज्ञापन अब सर्वव्यापी है। यह हर पल हमारे जीवन में दखलअन्दाज़ी करता है। हम तमाम ज़िन्दगी इसके निशाने पर हैं, चाहे वह निशाना मीडिया का हो या फिर सड़कों बाज़ारों में टिमटिमाते हुए विज्ञापन बोर्डों का। यहाँ तक कि हमारा पहरावा भी इसके प्रभाव से मुक्त नहीं है, और हम इन कपड़ों को इतराते हुए पहनते हैं। कार्पोरेशन ही हमारे लिए एक ‘‘समाज’’ बन चुका है। स्टीव जाॅब्स हमारा गुरू था। हम उसकी मौत पर इस तरह दुःख महसूस करते हैं जिस तरह कभी हम किंग मार्टिन लूथर की मौत पर करते थे। क्या कमाल का परिवर्तन है?
आज का पूँजीवाद हमारे सारे अनुभव का लाभ उठाते हुए एक दैत्यकारी रूप धारण करता जा रहा है जिसे हम ‘‘ग्लोबल मार्किट’’ कहते हैं। जीवन अब मात्र इन्हीं चीज़ों से बचने की कोशिश भर रह गया है। यह चीज़ें हमें जबरदस्ती बेचने की कोशिश की जा रही है। हैरानी की बात है कि बहुगिनती लोगों को इस पर कोई एतराज़ नहीं है।
हम क्यों सहन करते हैं? उनके पास इस तरह का व्यवहार करने का क्या हक है? हमने उन्हें हमारे मस्तिष्क में इस तरह तस्वीरें चलाने का हक कब बेचा। यदि वायु तरंगें सबकी सांझी जायदाद है तो इसमें हर समय बिना हमारी आज्ञा के चीज़ों को बेचने का धन्धा क्यों चलता है? वास्तव में यह वायु तरंगें हमारी हैं। रेडियो प्रसारण के शुरूआती दौर में तुम और तुम्हारे मित्र घर में ऐन्टीना लगा कर पूरी दुनिया के साथ बातें कर सकते थे। यह बिल्कुल इंटरनैट के शुरूआती दौर में यू-ट्यूब के इस्तेमाल की तरह था।
प्रसारण तरंगों की संख्या बढ़ने से पूँजीपतियों को यह बात समझ आ गई कि यह तरंगें उनके लिए कितनी खतरनाक हो सकती हैं। इसलिए इस प्रबंध को बंद कर दिया गया। एफ.सी.सी. ने 1920 ई. के दशक में व्यापारक संगठनों के साथ मिलकर हमारी वायु तरंगों पर सामाजिक अधिकार बेचने शुरू कर दिए और व्यापारिक संस्थायों को उनके हितों के अनुसार लाईसन्स जारी कर दिये। प्रारम्भिक दिनों में वायु तरंगों के संतुलित और बराबर (सामान्य) प्रयोग के लिए कुछ नियम बनाए, परन्तु इन नियमों को जल्दी ही दबा लिया गया। इसके बाद रोनाल्ड रीगन और फिर बिल कलिंटन ने इन नियमों को बिल्कुल खत्म कर दिया। जब वायु तरंगें अब पूरी तरह से निजी सम्पत्ति में तबदील हो गई। यहाँ तक कि सरकारी संस्थान और एन.पी.आर. भी व्यापार के लिए प्रयोग किये जाते हैं। पी.बी.एस. पर समाचार प्रस्तुत करने वाली रिपोर्टर शैबर्न के अमेजन के साथ दुव्र्यावहार की चर्चा करती है तो उसको यह भी बताना पडता है कि आज के समाचारों को प्रायोजित करने वाला शैबर्न वही कम्पनी है जिस पर यह आरोप लग रहा है। मैंने यह सुनते ही प्रोग्राम बन्द कर दिया।
हालांकि कभी-कभी विज्ञापन मनोरंजन भरपूर भी हो सकता है परन्तु यह तथ्य मामले की गम्भीरता को कम नहीं करता आप जहोवा विटनैसज कम्पनी के प्रतिनिधियों के साथ समय व्यतीत कर सकते हैं या फिर आप कूड़ा-कर्कट साफ करने वाले यन्त्र को बेचने वाले हास्यस्पद किसम के आदमी के साथ समय व्यतीत कर सकते हैं। इस तरह की कम्पनी के प्रतिनिधि दिन में पाँच बार आपके घर की घण्टी बजाते हैं। परन्तु यह तभी संभव है जब आप बिल्कुल (पूर्णतः) अव्यस्त हों। तुम्हारे दिमाग पर भी तुम्हारी तरंगों की तरह आक्रमण किया जाता है। क्या यह निजी जीवन पर कानूनी मान्यता प्राप्त आक्रमण नहीं है तो फिर यह क्या है ?
सन, 1975 ई. में मैंने बे. क्षेत्र के प्रसिद्ध सरकारी वकीलों के साथ सान फ्रांसिसको में अपने कमरे में मीटिंग की और उनसे सवाल पूछा कि क्या वह सोचते हैं कि विज्ञापन कानूनन वैद्य है? पहला शोध पढ़ते हुए मैंने उनको कहा कि इसका उद्देश्य लोगों को अभिव्यंजना के एक-सामान्य अवसर प्रदान करना तथा स्वतन्त्र अभिव्यंजना का अधिकार प्रदान करते हुए लोकतन्त्र को मजबूत करना था। इसके साथ ही दूसरे लोगों के विचारों को समझने की काबलीयत पैदा करना भी था। 1700 ई. के आखिर में अधिकारों का कानून लिखते समय करोड़ों लोगों में एक-तरफीय राजनीतिक विचारधारा पहुँचाने वाला कोई भी राष्ट्रीय प्रसारण नहीं था और न ही उस समय विज्ञापन नाम की कोई वस्तु थी। हालांकि कभी-कभी लाखों लोगों की सोच को बदलने के इरादे से हस्तलिखित इश्तहार अनिवार्यता बांटे जाते थे।
अगर पहली शोध का उद्देश्य सूचना की लोकतांत्रिक लहर को बरकरार रखना था तो इस उद्ेश्य के दिन चले गये हैं। बाज़ारू मीडिया दिन-रात अपने प्रसारण के माध्यम से अपनी बात रखता है और हमारे पास अपनी बात रखने का कोई अवसर नहीं है। इन मीडिया चैनलों पर मुट्ठीभर बड़े कार्पोरेट घरानों का कब्ज़ा है।
जहाँ तक विज्ञापन की परिभाषा का सवाल है, यह सिर्फ उन्हीं लोगों तक सीमित है जो इसके लिए पैसा खर्चने के समर्थ हों। पहले शोध का उद्देश्य विज्ञापन को लोगों से अधिक ताकतवर बनाना नहीं था। विज्ञापन कर्ता चल-चित्र के माध्यम से अपनी बात कहता है और हम इसको ग्रहण कर लेते हैं। क्या यह संविधान की उल्लंघना समझी जानी चाहिए? क्या यह गैर-कानूनी नहीं है। मेरे कमरे में बैठा बुद्धिजीवियों का गिरोह यह सोचता है या उसको यह सोचना चाहिए था। परन्तु तथ्य यह है कि उस समय उच्चतम न्यायालय अधिक ताकतवर था, इस लिए गिरोह ने फैसला लिया कि इस मामले में बात करने का यह उचित समय नहीं है। उस समय से ही यह मामला अधिक जटिल होता गया और खास तौर पर जब से उच्चतम न्यायलय ने ‘‘सिटिज़न यूनाईटड़‘‘ का पहला इन्द्राज किया।
विज्ञापन की आवश्यकता किसको है?
पूँजीवादी चाहे विज्ञापन के बिना भी प्रफुल्लित हो सकता है और अपने प्रारम्भिक दौर में यह रहा भी है। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मसाला व्यापारियों और सन् अठारह सौ के आस-पास अमरीकन महाद्वीप में रेल लाईन बिछाने के लिए मज़दूरों की आवश्यकता हेतु विज्ञापन का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि इसका लाभ साफ और स्पष्ट समझ आता था। उस समय इस प्रकार के कार्य नाम मात्र थे और इनसे लाभ प्राप्त करने का मौका अपने आप में एक समाचार होता था।
जब पूँजीवादी व्यापारी इस प्रकार की वस्तुएँ तथा सेवाएँ प्रदान करते थे जो हर एक की आवश्यकता तथा इच्छा होती थी, जिस प्रकार बुनियादी अनाज, सब्जियाँ, फल तथा मीट जैसे खाद्य पदार्थों की बिक्री के लिए विज्ञापन की जरूरत नहीं पड़ती।
हालांकि जिन खाद्य पदार्थों की स्वाभाविक आवश्यकता नहीं होती उनको बेचने के लिए विज्ञापन की आवश्यकता होती है। उदाहरणतयः पैक, फ्रोज़न, लामराना, कोका कोला, बर्गर और चिटोज़ को बेचने के लिए विज्ञापन और मनमोहक पैकिंग की आवश्कता होती है। ताज़े पानी के विज्ञापन की आवश्यकता नहीं होती परन्तु पैरियर कम्पनी को पानी बेचने के लिए विज्ञापन की आवश्यकता पड़ती है। तुम्हें कपड़ों के लिए विज्ञापन की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि लोग जानते हैं कि वह एक बुनियादी जरूरत की वस्तु है। परन्तु मैसे और इस तरह गौप, वाल मार्ट और क्रिष्चियन डौयर जैसी कम्पनियों को विज्ञापन की आवश्यकता पड़ती है। न ही किसी को ट्रांसपोर्ट सेवाओं को प्राप्त करने के लिए विज्ञापन की आवश्यकता होती है। जिसने एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना होता है, वह अपने आप ही रास्ता ढूंढ लेता है। परन्तु नई फोर्ड फ्रियैस्टा या कैडीलाॅक कम्पनियों की कारों की कीमत को सही साबित करने के लिए कलात्मक विज्ञापन की आवश्यकता पड़ती है। यदि तुम एक बार इन्हें बेचने में सफल हो जाते हो तो तुम्हें उपभोक्ता को लगातार नया माॅडल खरीदने के लिए उकसाने की आवश्यकता होती है। इसी दौरान लोगों के मन में यह बात घर करने के लिए कि खरीदो फरोख्त जीवन का हिस्सा है तथा यह खुशी और सन्तुष्टि के साथ जुड़ा हुआ है। इसके लिए एक बड़े ताने बाने की आवश्यकता होती है।
आज के इंटरनैट युग में भी विज्ञापन का प्रमुख साधन टैजीविज़न है। पूँजीवादी समाज में सभी व्यापारिक मीडिया के साथ-साथ टैलीविज़न को प्रतिदिन अधिक से अधिक दर्शकों को आकर्षित करने का काम सौंपा गया है। इस मामले में टैलीविज़न उम्मीद से कहीं अधिक सफल रहा है। एक औसतन अमरीकन सारा साल प्रतिदिन साढ़े चार घण्टे से भी अधिक समय के लिए टैजीविज़न देखता है। कार्पोरेट दुनिया को टैलीविज़न और इसके प्रोग्राम अपने विज्ञापनों के लिए सबसे लाभकारी साधन लगता है। यदि कोई प्रोग्राम विज्ञापन कर्ता को आकर्षित करने में असफल रहता है तो उस प्रसारण को बंद कर दिया जाता है।
टैलीविज़न पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन लोगों में अनावश्यक वस्तुओं को खरीदने की तीव्र इच्छा पैदा करने की पूरी समर्था रखता है। अमरीकन संस्कृति और सारे विश्वी अर्थव्यवस्था की बनावट इन्हीं अनावश्यक वस्तुओं की खरीदो फरोख्त पर टिकी हुई है। असली बात अनावश्यक वस्तुओं की खरीदो फरोख्त को लगातार बढ़ाने की है। जब तक यह अंत बिंदु तक न पहुँच जाए। यह वस्तु पैदावार तथा खपत का विश्व गुब्बारा है। हाल ही में देखा गया है कि यदि यह थोड़ा सा नीचे आ जाता है तो नाटकीय ढंग से अलोप भी हो जाता है।
विज्ञापन का दौर बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दिनों में रेडियो द्वारा हुआ और सन् 1950 तथा 60 के दहाके तक भरपूर यौवन अवस्था में रहा। इसके बाद रेडियो का स्थान टैलीविज़न ने लेना शुरू कर दिया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमरीका तथा सारी दुनिया आर्थिक मन्दी से बचने के लिए छटपटा रही थी। इससे बचने के लिए अतिरिक्त औद्योगिक समर्था के साथ-साथ अतिरिक्त मजदूर शक्ति का उपयोग करना आवश्यक हो गया था। हथियार बनाने वाले कारखाने अब खाली हो चुके थे तथा उनको उपभोगी वस्तुएँ बनाने वाले कारखानों में परिवर्तित करना समय की आवश्यकता थी। चलती फिरती तस्वीरों के माध्यम से इस तरह का मुहावरा घड़ा गया जो ग्राहकों की उपभोगी चेतना को गति देता है। इस प्रकार टैलीविज़न पूँजीवादी प्रबन्ध के लिए बड़ा ही लाभदायक सिद्ध हुआ है।
पिछली सदी के मध्य के पश्चात् टैलीविज़न और खगोलशास्त के दैत्याकारी विज्ञापनों के गठजोड़ ने अमरीकनों और तमाम कायनात् के लोगों की चेतना हमारे बिम्ब, हमारी जीवनशैली, हमारी आदतें, विचार प्रसंग, इच्छाएँ और हमारी सोचने की शक्ति को एक नए रूप में परिवर्तित कर दिया। अमरीका में सन् 1940 ई. के दौरान विज्ञापन पर 2 अरब डालर खर्च किया जाता था। आर्थिक मंदी के बावजूद सन् 2010 तक अमरीकी विज्ञापन उद्योग पर 150 अरब डालर से अधिक खर्च किया गया जिसका सबसे बड़ा हिस्सा टैलीविज़न को जाता है। ऐडवीक के अनुसार भी इस पूँजी का अधिकतर हिस्सा टैलीविज़न पर ही खर्च किया जाता है। केवल अमरीका विज्ञापन के लिए पूरी दुनिया का एक तिहाई हिस्सा खर्च करता है जबकि सन् 2010 तक कुल दुनिया 450 अरब डालर विज्ञापन पर खर्च करती है। बावजूद इन्टरनैट, रेडियो, पत्रिकाएँ और समाचार पत्रों के साथ मुकाबला होने पर टैलीविज़न विज्ञापन का सर्वोच्च माध्यम माना जाता है तथा यह प्रबन्ध तेज़ी से बढ़ रहा है। ई. मार्किटर (29 मार्च 2011) अनुसार साल 2010 में विज्ञापन के लिए टैलीविज़न के माध्यम में 9 प्रतिशत की बढ़ोŸारी हुई तथा यह बढ़ोŸारी आॅनलाईन विज्ञापनों से दोगुनी थी।
इस दौरान यू.ऐस. ब्युरो आॅफ इकनाॅमिक्स अनालिसिस के आँकड़ों के अनुसार अमरीकन सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में बेतहाशा बढ़ोŸारी हुई। सन् 1940 में 100 अरब डालर से शुरू होकर सन् 1960 में 525 अरब डालर तथा सन् 1980 में 30 अरब डालर और 2007 में 140 अरब डालर तक पहुँच गया।
मीडिया और जिन्दगी
टैलीविज़न मामलों के साथ खासतौर पर जुड़ी नैलसन कम्पनी के मतानुसार 99 प्रतिशत अमरीकी घरों में टैलीविज़न सैट हैं तथा 95 प्रतिशत आबादी कुछ न कुछ समय प्रतिदिन टैलीविज़न देखते हैं। दो तिहाई अमरीकी घरों में अपना-अपना प्रोग्राम देखने के लिए तीन या इससे अधिक टैलीविज़न सैट हैं। औसतन हर एक घर में 7 घण्टे के लगभग टैलीविज़न चलता है। कई बार तो कोई देख भी नहीं रहा होता तब भी टैलीविज़न चल रहा होता है। हर एक बालिग प्रतिदिन औसतन पाँच घण्टे तथा दस से ग्यारह साल का बच्चा एक दिन में चार घण्टे के लगभग टैलीविज़न देखता है। 65 साल की उम्र से अधिक के बुजुर्ग एक दिन में लगभग 7 घण्टे टैलीविज़न देखते हैं।
66 प्रतिशत अमरीकी रात को भोजन करते समय टैलीविज़न देखते हैं। स्थानीय न्यूज़ चैनल कुल समय दौरान 35 प्रतिशत समय विज्ञापन दिखाते हैं तथा इस में अपराध तथा दुर्घटना का हिस्सा 53.8 प्रतिशत होता है। पिछले दो दहाकों में यह आँकड़े बदलते रहे हैं परन्तु यह बदलाव नाम मात्र ही है। प्रतिदिन चार घण्टे टैलीविज़न देखने वाला इनसान एक साल में लगभग 25000 विज्ञापन देखता है तथा 65 साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते वह 2 अरब से अधिक विज्ञापन देख लेता है। ‘‘खरीदो और खुशहाल रहो‘‘ विज्ञापन एक साल में 25000 बार दोहराया जाता है।
यदि अमरीका का औसतन बालिग प्रतिदिन 5 घण्टे के लगभग टैलीविज़न देखता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि अमरीका की आधी आबादी 5 घण्टे से भी अधिक टैलीविज़न देखती है। यह प्रक्रिया सालों से चल रही है (रोज़ देर रात तक और सप्ताह के अन्त में सारा-सारा दिन और सारी सारी रात) इतिहास में यह हमारी पहली पीढ़ी है जिसने अपनी चेतना मीडिया के हवाले की है और दूसरे लोगों, समाजों, ज्ञान के दूसरे स्त्रोतों, वास्तविक दुनिया से अपना सीधा रिश्ता तोड़ लिया है। यही कारण है कि हमारे पास घटनाओं और अनुभवों के झूठे या आधे अधूरे वर्णन ही पहुँचते हैं।
कुछ लोगों की दलील है कि अब हमारे पास मोबाईल फोन, कम्प्यूटर, आई पैडस, ट्विटर, दूसरा सोशल मीडिया होने के कारण हालात सुधर गए हैं। पिउ रिसर्च सैंटर के अध्ययन के अनुसार अधिकतर अमरीकन किशोर प्रतिदिन पचास के लगभग टैक्सट मैसेज़ (एस.एम.एस.) भेजते हैं। उनके अनुसार गैर टैलीविज़न तकनीक अच्छी है और यह टैलीविज़न से कहीं कम एकतरफा है। इस लिए अधिक बौद्धिक है। यहाँ हम बौद्धिक रूप से जुड़ सकते हैं, परन्तु हैरानी की बात यह है कि कम्प्यूटर और इन्टरनैट के मनमोहक रूप के बावजूद लोगों द्वारा टैलीविज़न देखने के समय में कोई कमी नहीं आई। इन्टरनैट के आने से लोग जानकारी प्रदान करने वाली मशीनों, कम्प्यूटर आदि के साथ शारीरिक और मानसिक तौर पर अधिक जुड़े हैं। इसलिए बनावटी दिमागों में साईंस फिक्शन के लिए अधिक स्थान बना है।
अमरीका में सोने और काम करने के अतिरिक्त लोगों के लिए टैलीविज़न देखना भी एक मुख्य धन्धा है। सामाजिक, पारिवारिक जीवन तथा संस्कृति का स्थान टैलीविज़न ने ले लिया है। अब टैलीविज़न ही अपने आप में संस्कृति बन गया है। इससे मेरा भावार्थ ‘पापुलर कल्चर‘ नहीं है, क्योंकि यह तो फिर भी थोड़ा बहुत लोकतान्त्रिक होता है। टैलीविज़न रत्ती भर भी लोकतांत्रिक नहीं है। दर्शक टैलीविज़न का निर्माण नहीं करते केवल देखते हैं। टैलीविज़न संस्कृति को नहीं बल्कि कार्पोरेट संस्कृति को परोसता है।

 

 

 

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