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हिन्दी भाषा और साहित्य में चिट्ठाकारिता की भूमिका

 

 

हर समाज की अपनी भाषा और संस्कृति होती है और हर भाषा का अपना साहित्य होता है। हिन्दी भाषा का भी अपना साहित्य और समाज है। कहना न होगा यह समाज और इसका साहित्य अत्यंत समृद्ध रहा है। आधुनिक समय में मीडिया, विज्ञापन, पत्रकारिता और सिनेमा ने हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति की भूमि को उर्वर बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। ब्लाग या चिट्ठा इसी विकास की दुनिया का नवीनतममाध्यम है और ब्लागिंग या चिट्ठाकारिता लेखन या मीडिया की नई विधा।

 

किताब या पत्रिका की तुलना में इसकी पहुँच अधिक और तेज होने के कारण यह कई मामलों में पुराने मीडिया माध्यमों से बेहतर है। हिंदी में चिट्ठे का प्रारंभ २००३ से हुआ पिछले ७ सालों में वह अपने लड़खड़ाते कदमों को संभालकर खड़ा होना सीख गया है। जिस प्रकार साहित्य और संस्कृति के विषय में यह आशा की जाती है कि वे आने वाले समय में व्यक्तिगत मनोविनोद, जय-पराजय, सुख-दुख से ऊपर सामूहिक प्रेम, बन्धुत्व, स्वतंत्रता और समानता के पथ पर कदम बड़ाएँगे, चिट्ठों के विषय में यह आशा रखना उचित होगा कि वे सामूहिक प्रेम, बन्धुत्व, स्वतंत्रता और समानता के क्षेत्र में भाषा साहित्य और संस्कृति की नई दिशाएँ खोजते हुए अपना भविष्य बनाएँगे।

 

चिट्ठा एक ऐसा माध्यम है जहाँ व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार विषय, भाषा, विधा, और लेख की लंबाई का नियंत्रण अपने हाथों में रख सकता है। इसलिये किसी पत्रिका के स्तंभ में समा पाने के लिये उसे अतिरिक्त परिश्रम से मुक्ति मिल जाती है और इच्छानुसार विकास का अवसर मिलता है। ऐसे लेखों पर यदि किसी कुशल संपादक की दृष्टि पड़ जाए तो वह सीधा किसी पत्रिका का हिस्सा भी बन सकता है या फिर किसी प्रकाशक या फिल्म निर्माता का सहयोगी बन जीवन को साहित्यिक सांस्कृतिक दिशा दे सकता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो चिट्ठे भी साहित्य और भाषा के विकास का माध्यम हैं। बहुत से लेखक और कवि ऐसे हैं जिन्होंने लेखन का प्रारंभ या यह कहें कि अपने लेखन को प्रकाशित करना अपने चिट्ठों पर ही शुरू किया। बाद में उनकी रचनाएँ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपीं और पुस्तकों के रूप में भी सामने आईं।

 

हर चिट्ठे की भाषा स्तरीय नहीं होती या विषय घटिया होता है या लेखन स्तरहीन होता है ऐसा नहीं कहा जा सकता। चिट्ठों का लेखक स्वयं अपना संपादक होता है। इसलिये कुछ चिट्ठे प्रारंभ में सामान्य दिखाई दे सकते हैं लेकिन धीरे धीरे उनका विकास हो सकता है। यह लेखक पर निर्भर होता है कि वह कैसा लिखना चाहता है, किन पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है और भाषा या शैली के प्रति कितना और कैसा रचनात्मक रुझान रखता है। यह भी हो सकता है कि चिट्ठा किसी साहित्यिक लेखक का हो तब उसमें प्रारंभ में ही स्तरीय लेखन देखा जा सकता है। हो सकता है कि कोई साहित्यिक चिट्ठा लिखना ही न चाहता हो, उसका चिट्ठा हिंदी में तो हो लेकिन किसी और विषय की ओर केंद्रित हो तब उससे साहित्य और साहित्यिक भाषा की अपेक्षा या जबरदस्ती रखना उचित नहीं है। अच्छी रचनात्मक हिंदी में लिखे हुए कई चिट्ठे पत्रकारिता, संस्मरण, शब्दों के विकास, प्रकृति, पर्यावरण आदि विषयों पर आज भी देखे जा सकते हैं।

 

आज का कोई भी व्यक्ति जो अभिव्यक्ति में पारंगत हैं और पर्याप्त सूचनाएँ रखता है, तर्क युक्तियों के माध्यम से अपनी बात रखने की कला जानता है और सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता रखता है वह अपनी भाषा और अपने साहित्य की सीमाओं को विस्तृत होते देखना चाहता है। इसके लिये वह अपनी सुविधानुसार किस भी माध्यम का प्रयोग कर सकता है और इसके लिये चिट्ठे से बेहतर कोई माध्यम नहीं हो सकता।


इस समय हिंदी में लगभग २२००० के आसपास चिट्ठे हैं, टेक्नोरति के एक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व के कुल चिट्ठों में से ३७ प्रतिशत जापानी भाषा में है, ३६ प्रतिशत अंग्रेजी में और आठ प्रतिशत के साथ चीनी तीसरे नंबर पर है। अंग्रेजी के ४ करोड़ चिट्ठों की तुलना में अभी हिंदी चिट्ठों का विस्तार भले ही कम दिखाई दे किन्तु हिंदी ब्लोगों पर एक से एक विशिष्ट सामग्री प्रस्तुत की जा रही हैं ! समाज, राजनीति, मीडिया और साहित्य से संबंधित महत्वपूर्ण सृजन हिंदी चिट्ठा पर धड़ल्ले से प्रस्तुत किये जा रहे हैं ! हिंदी में चिट्ठा कम होने का एक कारण यह भी माना जा सकता है, कि हिंदी में एक सार्वजनीन फांट आने में देर हुई जिससे हिंदी चिट्टाकारिता अँग्रेजी की तुलना में छह साल देर से प्रारंभ हुई।


आज जिस प्रकार हिंदी चिट्ठाकार समाज और देश के हित में व्यापक जन चेतना को विकसित करने में सफल हो रहे हैं वह संतोष की बात है। अपने सामाजिक सरोकार को व्यक्त करने की प्रतिबद्धता के कारण आज हिंदी के कतिपय चिट्ठे समानांतर मीडिया की दृष्टि से समाज में सार्थक भूमिका निभाने में सफल रहे हैं । हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप देने में हर उस चिट्ठाकार की महत्वपूर्ण भूमिका है जो बेहतर प्रस्तुतिकरण, गंभीर चिंतन, समसामयिक विषयों पर सूक्ष्मदृष्टि, सृजनात्मकता, समाज की कुसंगतियों पर प्रहार और साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी बात रखने में सफल हो रहे हैं। चिट्ठा लेखन और वाचन के लिए सबसे सुखद पहलू तो यह है कि हिन्दी में बेहतर चिट्ठा लेखन की शुरुआत हो चुकी है जो हिंदी समाज के लिए शुभ संकेत है ।

 

कहा गया है कि चिट्ठाकारिता की दुनिया पूरी तरह स्वतंत्र, आत्म निर्भर और मनमौजी किस्म की है ! यहाँ आप स्वयं लेखक, प्रकाशक और संपादक की भूमिका में होते हैं ! चिट्ठे की दुनिया समय और दूरी के सामान अत्यंत विस्तृत और व्यापक है ! यहाँ केवल राजनीतिक टिप्पणियाँ और साहित्यिक रचनाएँ ही नहीं प्रस्तुत की जातीं बल्कि महत्त्वपूर्ण किताबों का इ प्रकाशन तथा अन्य सामग्रियाँ भी प्रकाशित की जाती है। आज हिंदी में भी फोटो चिट्ठा, संगीत चिट्ठा, पोडकास्ट, विडिओ चिट्ठा, सामूहिक चिट्ठा, प्रोजेक्ट चिट्ठा, कारपोरेट चिट्ठा आदि का प्रचलन तेजी से बढ़ा है ! यानी हिंदी चिट्ठाकारिता आज संवेदनात्मक दौर में है इसमें कोई संदेह नहीं है!

 

वर्ष-२०१० में हिंदी चिट्ठाकारिता के चहुमुखी विकास में पूरे वर्ष भले ही अवरोध की स्थिति बनी रही, किन्तु बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका अपने इस आकलन को लेकर करीब-करीब एकमत है कि आने वाला कल हमारा है यानी हिंदी चिट्ठाकारिता का है। इसकों लेकर किन्तु-परन्तु हो सकता है कि हिंदी चिट्ठाकारिता का विकास अन्य भाषाओं की तुलना में धीमा रहा, लेकिन इसे लेकर किसी को संशय नहीं होना चाहिए कि हिंदी चिट्ठाकारी उर्जावान चिट्ठाकारों का एक ऐसा बड़ा समूह बनता जा रहा है जो किसी भी तरह की चुनौतियों पर पार पाने में सक्षम है और उसने अपने को हर मोर्चे पर सिद्ध भी किया है । वस्तुत: विगत वर्ष की एक बड़ी उपलब्धि और साथ ही आशा की किरण यह रही है कि चिट्ठs के माध्यम से वातावरण का निर्माण केवल वरिष्ठ चिट्ठाकारों ने ही नहीं किया है , अपितु एक बड़ी संख्या नए और उर्जावान ब्लोगरों की भी आई है, जिनके सोचने का स्तर परिपक्व है। वे सकारात्मक सोच रहे हैं, सकारात्मक लिख रहे हैं और सकारात्मक गतिविधियों में शामिल भी हो रहे हैं।

 

इसके सिवा अनेक लेखक लेखिकाएँ जो हिंदी भाषा और विभिन्न विषयों पर अच्छी पकड़ रखते हैं साथ ही चिट्ठाकारिता के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति को धार देने की दिशा में सक्रिय हैं, इस वर्ष चिट्ठा लेखन में सक्रिय रहे। कुल मिलाकर यह दिखाई देने लगा है कि हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में चिट्ठाकारिता की भूमिका सर्वोपरि है। आने वाले दिनों में हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माण में यह समृद्धि के नए सोपान को प्राप्त करेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

 

रवीन्द्र प्रभात

 

 

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