नारी विमर्ष – दशा और दिशा

 

 

-देवी नागरानी

 


इतिहास गवाह है इस बात का कि औरत समर्थ है, मर्द की इसी दुनिया में अपना स्थान, अपनी पहचान की महत्वता को बरक़रार रखते हुए उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलने में पूरी तरह सक्षम है। हर दिशा में अपनी परिपूर्णता प्रमाणित करने के बावजूद भी कभी-कभी किसी कारण वो हालातों के सामने घुटने टेक देती है, जि़न्दगी की गर्दिशों की गर्द से घिर जाती है, तब यक़ीनन कुछ देर के लिये उसकी पहचान की रोशनी भी मध्दिम पड़ जाती है। सच मानिये तब नारी कहीं न कहीं ममता के आगे कमज़ोर पड़ी होगी; कभी घर की मान-मर्यादा के आगे मौन हुई होगी, पर जो शक्ति उसके अंदर ऊर्जा बनकर संचार कर रही है, वह उसकी पहचान को बनाए रखने के लिये बहुत है। नारी की क्षमता ही उसका परिचय है। जिन्दगी के मोड़ पर कभी दुश्वारियों का सामना करते वह लड़खड़ाती है, पर अपने बलबूते पर दुगुने आत्म विश्वास के साथ सत्य की राह पर क़दम बढ़ाती है। पुरुष और स्त्री की श्रेष्टता को सामने लाते हुए प्रेमचंद ने लिखा है – “स्त्री पुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है, जितना प्रकाश अंधेरे से। मनुष्य के लिये क्षमा, त्याग और अहिंसा जीवन के उच्चतम आर्दश है। नारी इस आदर्श को पा चुकी है।“


नारी जीवन के वतर्मान समस्याओं पर विचार-विमर्श होता आया है और होता रहेगा। फलस्वरूप पाया जाता है कि नारी पराधीनता से मुक्ति पाने की राह पर क़दम बढा कर बहुत आगे निकल रही है। आचार्य हजारी प्रसाद द्रिवेदी जी की धारणा रही कि नारी परम शिव का निशेधात्मक तत्व है। वह नारी, जो आंचल में दूध और आंखों में पानी लेकर अपनी सहनशीलता और ममत्व का प्रतीक बनी, पुरुष की यातनाएं और अत्याचार सहती रही, वही नारी आज पुरुषों की मानिद स्वतंत्र है, अपनी समस्याओं का समाधान पाने में पहल करती हुई नारी आज जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण समस्याओं पर समाधानों की मोहर लगाती जा रही है। समाज में नारी जाति के प्रति आई विडंबनाओं -दहेज प्रथा, अनमेल विवाह, वैशयावृती, विधवा विवाह, तलाक आदि पर शोषण हुआ है, पर हर स्थित में अपने अधिकारों को स्वतंत्र रुप से पाने में वह तेज़ क़दमो से अपनी तलाश जारी रख रही है। आर्थिक दृष्टि से भी संपन्न होने की संभवनाओं का आकाश उसके सामने खुला है।
इसी संभावना की एक महत्व पूर्ण कड़ी है शिक्षा, जिसकी सबलता आज प्रमाणित हो चुकी है। महिलाएं पढ़-लिख कर अपनी पूर्ण प्रतिभा के साथ देश के, समाज के हर कोने में, हर कार्य में पूर्ण रुप से भागीदारी लेकर कार्य रत हुई है। महिलाओं के सामने की स्थितिया आसान कभी नहीं रही है। संघर्ष के राहों पर चलकर पहाड़ों से अपना रास्ता निकाल कर अब अपनी पहचान के आईने में अपना नया स्वरुप देख चुकी है। उसकी महत्वता की पहचान अब नकारी नहीं जा सकती, अपने बलबूते पर अपने आप को सन्मानित स्थान दिला पाने की स्थिति में है।


नारी अपनी उर्वरा शक्ति नहीं खोती, सृजनवर्त रहती हैं, कठिन क्षणों में वह अपने अंदर की क्षमताओं का मंथन करके, कठिनाइयों का हल निकालते हुए अपने भीतर के सामर्थ्य का प्रमाण देती है। जिस निष्ठा और लगन से वह एक क़दम राह पर आगे बढ़ाती है, उतनी ही तेज़ और दुगुनी चाल के साथ मंजिल उसकी तरफ़ आ रही है। वह सर्व स्वाभिमानी है और सर्व शक्तिमान भी है । असाधारण स्थितियों में अपनी सहनशीलता के साथ संर्घषमय राहों पर चलकर अपने सतीत्व की आन पर आंच नहीं आने दी है। द्रौपदी पांच पतियों के बीच बंटी रहकर भी आपने आप को बिखरने से बचाती रही। आज महिला के अस्तिव का अभिनंदन हुआ है। अपनी छोटी-छोटी संवेदनात्मक स्थितियों को अपनी शक्ति से संचारित किया है, और हर भावनात्मक पहलू को जिया है। शायद आज भी उसका समर्पण त्याग और सेवा समाज में पूरी तरह से रेखांकित नहीं हो पाया है।


प्राचीन और मध्य युग में स्त्री का मान-सन्मान घर की परिधि में रहा जहाँ वह पुरुष की आधीनता और सता में रही। बचपन में पिता, शादी के उपरांत पति और वृध्दावस्था में पुत्र के सरंक्षण में रही। पर आज नारी शिक्षा और स्वतंत्रता के उजाले में आजाद भी है, और सक्षम भी। पुरुष मानसिकता का दबाव अब उसे छू नहीं पाता – इसमें कोई शक नहीं कि नारी के अस्तित्व में पुरुष की महत्वता भी माइने रखती है। जीवन के संघष-पथ पर दोनों एक दूसरे को संपूर्णता प्रदान करते हुए जीवन पथ पर दो पहियों की तरह जो संगठित सोच एवं सरल नैत्रत्व से अपने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाते हैं। नारी की कथा व्यथा की आवाज़ अब एक शस्त्र बनकर क़ लम की धार से अपने आपको अभिव्यक्त कर रही है उस सच का समर्थन करें जब नारी का मानस कहता है-


मेरा बच्चा / तन की उपज / आज दूर मुझसे / मेरे आंचल की छांव तले सो रहा है / मैं उसकी रक्षा करने को वचन बद्ध हूं / शायद इस लिये धूप में खड़ी / ईट गारा ढो रही हूं.


नारी अपनी निष्ठा और सहजता से हर संघर्ष का पड़ाव पार कर जाती है। वह दुखों के बीच खुशियों के पल ले आती है और जिन्दगी को अर्थ देती है। पहले नारी लेखन नरम था, उनमें थोड़ा डर था, अंकुष था। पर अब इस दौर में लेखन के बढते हुए विस्तार ने उसे निडर बना दिया है। अपने सोच को शब्दों में अभिव्यक्त करने से उसे कोई नहीं रोक सकता। अपने बीते हुए कल की परीधि यों को परिभाषित करते हुए नारी मन अपने अंतरमन की पीड़ा को सबके सामने रखते हुए कहती है -


आज ये उसके हिस्से में आया है, कल
वह तुम्हारे कदम से हम कदम न होकर , जब
तूमसे आगे निकल जाएंगी, तब
वह दुख तुम्हारा भी हो सकता है, और
सच मानो तब वह सांझा नहीं होगा
सांझा नहीं होगा।


यक़ीनन जिस तरफ़ नारी अपनी निष्ठा के साथ चलती है वहीं से राह निकलने लगती है, मंज़िल उसकी राह तकने लगती हैं। किसीने नारी के प्रतिनिधित्व को लेकर खूब कहा है - They swim against the tide and achieve their own identity which they very well reflect in their writings

 

 

 

 देवी नागरानी

 

 

HTML Comment Box is loading comments...