दश-दशहरा, बीस दीवारी

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 

दुर्गा स्थापना पर मालवा में एक कहावत है
दश-दशहरा, बीस दीवारी।
देव उठने की भई तैय्यारी।।
उपरोक्त पंक्तियां हालांकि जल्दी-जल्दी त्योहार आगमन की कामना को दर्शाती हैं पर हिन्दुओं ही हर सामान्य कहावत में एक गहरा दर्शन भी छिपा रहता है। उपरोक्त कहावत एक निर्देश है कि शक्ति पूजा के दौरान मन दशों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करें।
रामयण में यह विचित्र संयोग है कि दशहरा और दशानन के नामों में दश आया है। दश रथ यानि जिसके हाथों में दशो इन्द्रियों की लगाम है और दशानन यानि जिसकी दशो इन्द्रियां भूखी है। जब दशरथ के हाथ से एक इन्द्रिय की भी लगाम छूट जाती है तो आत्मा राम का निष्क्रमण हो जाता है। प्रकृति पुरूष के साथ रहती है। जब तक प्रकृति पुरूष के साथ रहती है तब तक उसका कल्याण होता रहता है। जब वह स्वर्ण मृग की आकांक्षा करती है तब तामसी वृतियां उसका अपहरण कर लेती है। वनवासी सीता ने जब सोने की आकांक्षा की तब रावण ने उसका अपहरण कर लिया।
दशरथ की पत्नियां प्रकृति के तीन गुणो की प्रतीक है। कौशल्या सत्य गुण की प्रतीक है। श्रद्धा से राम उत्पन्न होते है। कैकेई, रजो गुण की प्रतीक है। यानि बैचेन करने वाली न खत्म होने वाली इच्छाये। कैकेई ने उसके लड़के के लिये राज्य मांगा। यह भी कि की इच्छायें हमेशा अधूरी ही रहती है। जैसे दशरथ की इच्छा कि राम को युवराज पद मिले कैकेई की इच्छा कि भरत को राज्य मिले सीता की इच्छा कि उन्हें सोने का मृग मिले, सूर्पनखा की इच्छा कि सीता उसका वरण कर ले इत्यादि। देखा जावे तो रामायण अतृप्त इच्छाओं को महाकाव्य है।
रावण के परिवार में सारे नाम के अंगो या उसके गुणों पर आधारित है जैसे दशान या रावण कुम्भकर्ण है (बड़े कान) विभीषण सूर्पनखा (बड़ी नाक या नाखून) यह तो विश्लेषण हुआ दशरा का अब बीस दिवारी की बात करें। प्रकृति में बीस तत्व है। पांच ज्ञानेन्द्रियां (त्वचा, आंख, नाक, कान, जिहवा) पांच उनके विषय है (स्पर्श, रूप, रस, ध्वनि और गंध) पांच ज्ञानेन्द्रियां (हस्त, पाद, उपस्थ, वाणी और गुदा) एवं पांच स्थूल तत्व (अन्तरिक्ष, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी)। यानि इन पर विजय प्राप्त करने पर चेतना दीप ज्योति तरह झिलमिलती है। हमारी चेतना प्राकृतिक रूप से अंधकार मय रहती है। उसे प्रकाश मय करने के लिये प्रयत्न करना पड़ता है। यही दीप जलाने का महत्व है। जब चेतना प्रकाश मय हो जाती है तब ज्ञान उत्पन्न होता है। हर चीज स्पष्ट हो जाती है। गीताजी में कहा भी है (अध्याय 14 श्लोक 6) तत्र सत्वं निर्मलत्वात्प्रकाश अनामयं सुखसंगेन बन्धाति ज्ञान संग्रेन चानद्य प्रकाश होने पर सुख प्राप्त होता है।
अब हम अंतिम चतुर्थान्जलि लें। वह है: देव उठने की भई तैय्यारी। जब चेतना प्रकाशमय होती है कृष्ण पक्ष प्रकाशमय हम कर लेते है तब हमारे अंदर देवत्न जागृत हो जाता है। ताड़का, सुबाहू, मरीचि, मेद्यनाद, मंदोदरी (क्षीण उदर) इत्यादि। जबकि दशरथ के परिवार में सारे नाम अध्यात्मिक गुणो पर आधारित हैं यथा दशरथ कौशल्या (कुशल यां कौशल) सुमित्रा, राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुध्न इत्यादि। तो तब हम शरीर या उसकी इच्छाओं या उसके गुणो पर ही मन केन्द्रित करते है तो हमारा विनाश सुनिश्चित है।

 

 

 

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