देश में धर्म और चुनाव

 

 

धर्म को लेकर भारत में तरह तरह की अवधारणायें पनपती रही हैं . यद्यपि हमारा संविधान हमें धर्म निरपेक्ष घोषित करतया है किन्तु वास्तव में यह चरितार्थ नही हो रहा . देश की राजनीति में धर्म ने हमेशा से बड़ी भुमिका अदा की है . चुनावो में जाति और धर्म के नाम पर वोटो का ध्रुवीकरण कोई नई बात नहीं है . आजादी के बाद अब जाकर चुनाव आयोग ने धर्म के नाम पर वोट मांगने पर हस्तक्षेप किया है . तुष्टीकरण की राजनीति हमेशा से देश में हावी रही है . दुखद है कि देश में धर्म व्यक्तिगत आस्था और विश्वास तथा मुक्ति की अवधारणा से हटकर सार्वजनिक शक्ति प्रदर्शन तथा दिखावे का विषय बना हुआ है . ऐसे समय में श्री रंगाहरि की किताब धर्म और संस्कृति एक विवेचना पढ़ने को मिली . लेखक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अनुयायी व प्रवर्तक हैं . राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को हिन्दूवादी संगठन माना जाता है . स्वाभाविक रूप से उस विचारधारा का असर किताब में होने की संभावना थी , पर मुझे पढ़कर अच्छा लगा कि ऐसा नही है , बल्कि यह हिन्दू धर्म की उदारवादी नीति ही है जिसके चलते पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि हिन्दूत्व , धर्म से ऊपर संस्कृति है . मुस्लिम धर्म की गलत विवेचना के चलते सारी दुनियां में वह किताबी और कट्टरता का संवाहक बन गया है ,हमारे देश के कई कथित बुद्धिजीवी बिना गहराई से विषय को समझे व उसके दूरगामी परिणामो की कल्पना किये ही अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता के नाम पर सरे आम टीवी व अन्य मीडिया माध्यमो में सस्ती लोकप्रियता के लिये , इसकी पैरवी करते दीखते हैं . ईसाई धर्म भारत व अन्य राष्ट्रो में कनवर्शन को लेकर विवादस्पद बनता रहा है . सच तो यह है कि सदा से धर्म और राजनीति परस्पर पूरक रहे हैं . पुराने समय में राजा धर्म गुरू से सलाह लेकर राजकाज किया करते थे . एक राज्य के निवासी प्रायः समान धर्म के धर्मावलंबी होते थे . आज भी देश के जिन क्षेत्रो में जब तब विखण्डन के स्वर उठते दिखते हैं , उनके मूल में कही न कही धर्म विशेष की भूमिका परिलक्षित होती है . अतः स्वस्थ मजबूत लोकतंत्र के लिये जरूरी है कि हम अपने देश में धर्म और संस्कृति की सही विवेचना करें व हमारे नागरिक देश के राष्ट्र धर्म को पहचाने . हमें नई पीढ़ी को , जिसे बिना संघर्ष ही हमारे संविधान ने अकल्पनीय मौलिक अधिकार दिये हुये हैं , धर्म की संवैधानिक व्याख्या समझाने की आवश्यकता परिलक्षित होती है . देश में धर्मनिरपेक्षता पर खुली बहस की जरूरत है .

 

 


विवेक रंजन श्रीवास्तव

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...