धर्म संसद

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 



स्वरूपानंद ने कहा है साइ बाबा के विरूद्ध उनका अभियान सनातन धर्म बचाने के बचाने के लिये है। सनातम धर्म नामक कोई धर्म नहीं है। भारतीय संविधान में या तो हिन्दु धर्म है या सिख, ईसाई या इस्लाम धर्म है। इस उद्देश्य के लिये कि साई बाबा की मूर्तियां सनातन धर्म के मंदिरों में नहीं रखी जानी चाहिये उन्होने धर्म संसद का आयोजन छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में दिनांक 24.8.2014 को किया। स्वरूपानंद ज्योतिष और द्वारिका पीठ के संयुक्त शंकराचार्च है। सनातम धर्म में अब सनातम धर्मियों को इतनी कमी आ गई है कि अब दो दो पीठों का भार एक ही शंकराचार्य को संभालना पड़ रहा है। धर्म संसद के केवल एक ही वर्ग के लोग प्रमुखतः थे। 13 अखाडे भी मध्यभारत श्रेत्र के ही थे। धर्म संस्था नामक पंजीकृत संस्था है या नहीं यह ज्ञात नहीं। चार व्यक्ति मिलकर अहं तुष्टि के लिये कोई भी संस्था बना सकते है।
साइमूर्ति बलात हटवाने का जो निर्णय धर्म संसद ने लिया है वह मुगल लोगो की याद दिला देता है मुगल को भी हमारे चार हाथ या दस हाथ के देवी देवताओं की मूर्तियां विचित्र लगी थी। हालांकि वे हमारे श्रद्धा की आधार थी पर मुगल लोगो ने उन्हें खंडित कर दिया था। मूर्ति पूजा हमारे धर्म का आधार बन चुकी थी। अतः साइ मूर्ति को मंदिरो से हटवाने का फतवा जारी कर स्वरूपानंद ने मूर्ति पूजको की आस्था पर प्रहार ही किया है।
साइबाबा की पूजा के खिलाफ जो तर्क दैनिक भास्कर के दिनांक 25 अगस्त 2014 की प्रति में छपे हैं उन्हें अक्षरशः निम्नानुसार उद्धत किये जो रहे है। सनातम परंपरा में पांच देवोः शिव, शक्ति गणेश, विष्णु सूर्य और चैबीस अवतारों की ही पूजा की जा सकती है। कलियुग में दो ही अवतारोंः बुद्ध बल्कि की ही चर्चा है। ये तीसरे साइ कहां से आये ?
साइचरित ही स्पष्ट करता है कि 1018 में उनकी मृत्यु हो गई थी। एक नश्वर शरीर की आत्मा कहां गई पता नहीं। उनकी पूजा कैसे संभव है। साई असत है अचेतन है अब चेतन है। वह गुरू भी नहीं। इसलिये उनकी पूजा भी संभव नहीं है। सनातन परंपरा वेदो और शास्त्रो से चलती है। पूजा हिंदु विधि से ही संभव है। साई हिन्दु या मुस्लिम दोनो होने की संकल्पना को स्वयं नकार देते है। हमारी आपत्ति साइ को सनातन धर्म से जोड़ने को लेकर है। इस धर्म संससद में सभी शंकरचार्यो व 13 अखाड़ो ने भाग लिया। साइ भक्तो को जो कि कुछ ही थे धक्के देकर स्टेज से उतार दिया गया। तात्पर्य यह है कि एक ही पक्ष के लोगो ने इस धर्म संसद में भाग लिया और निर्णय ले लिया गया। इसे फतवा भी कह सकते हैं।
जिन पांच देवोः चैबीस अवतारों का जिक्र किया गया है उनके अलावा कई देवी देवताओं की हिन्दू लोग श्रद्धा से पूजन करते है उन्हें एक सिरे से ही धर्म संसद ने नकार दिया। इनमें से कुछ प्रमुख देवी देवताओ निम्नानुसार है: बजरंग बली शनिदेव, मां वैष्णों देवी चित्रगुप्त, विश्वकर्मा, सहस्त्र बाहु, स्कन्द, भैरो बाबा, इन्द्र, अयप्पा स्वामी, बलराम सुभद्रा (पुरी) लक्ष्मण सीता, सेन महाराज, बंजारी देवी, लोकपाल सरस्वती, नाग देवता, शेगांव के गजानन महाराज शनि महाराज, ठन ठन पाल बाबा (इनसे स्वरूपानंद भी मिलते थे) आदि अनेक देवता है। चारो वेद तो इन्द्र के यशोगान से भरे पड़े है। मगर उन्हें अपूज्य माना है। चैबीस अवतारों को स्पष्ट नहीं किया गया।
आज तो अमिताभ बच्चन, सचिन, मीनाकुमारी दक्षिण भारत के कई अभिनेता (रजनीकांत) नेताओं यथा इंदिरा गांधी, नरेन्द्र मोदी की भी मूर्तियां मंदिरों में रखाने लगी है। यदि स्वरूपानंद में हिम्मत है तो उन्हें भी समाज से विहितकृत कर दें। फिर धर्मसंसद में मात्र पांच देवताओं और भगवान विष्णु के अवतारों को ही पूज्य माना हैं। अब उन्होने शक्ति किन एक देवी को माना है वह स्पष्ट नहीं किया। क्योंकि उन एक के अलावा शक्ति के सारे रूप नकार दिये गये है। धर्म संसद हिन्दु समाज के मात्र एक वर्ग की ही संसद थी। शिरडी के साई मंदिर तो सभी जननायक जाते है। स्वरूपानंद के मत में वे सभी मूर्ख है।
स्वरूपानंद के मन में साई बाबा के प्रति गहरी नफरत झलकती है। मात्र एक व्यक्ति की नफरत ने साई बाबा को अपूज्य माना है। क्योंकि धर्मसंसद के पूर्व स्वरूपानंद के साई बाबा के विरूद्ध नफरत भरे बयान आ चुके है। फिर धर्मसंसद में वे स्वयं दो शंकराचार्यो का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। अतः निष्पक्ष नहीं माना जा सकता। धर्म संसद का निर्णय साई बाबा के मंदिरों में एवं अन्य सभी मंदिरों में भी ब्राम्हण ही पुतारी है। अतः साई बाबा को अपूज्य बतला कर स्वरूपानंद एवं धर्मसंसद के जमाव ने उनकी अस्मिता को चोट पहुंचाई है। ब्राम्हण हिन्दु समाज में पूज्य है अतः उन्हें गलत ठहराकर स्वरूपानंद ने उन्हें अपमानित किया है।
स्वरूपानंद ने हनुमान जी सहित अन्य भगवानों का भी अपमान किया है जो क्षम्य नहीं है स्वरूपानंद ने शनि देव सहित आठो ग्रहो का अपमान किया है। उन्होने भैरो बाबा का अपमान किया है। सभी उपनिषद अवतारों एवं उनकी मूर्तियों को नकारते है। उदाहरण के लिये खेताश्नतर उपनिषद के अनुसार
नैनमूरध्व न तिरयंच न मध्ये परिजग्रंभूत
न तस्य प्रतिमाग्रस्ति यश नाम मदययशः (53)
अठारह हजार श्लोको वाले श्रीमद देवी महापुराण ने सारे अवतारों को मायाबद्ध एवं जन्म मरण शील बतलाया गया है। अतः सभी अवतार स्वरूपानंद के मत में नकारने योग्य है। मंदिरों में साइबाबा की मूर्तियां बलात हटाना एक नागरिक की आस्था एवं धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है जो किसी स्वतंत्र नागरिक को उनकी आस्था को मानने से रोकता है। इस तरह की गुंडागर्दी की संविधान अनुमति नहीं देता है। स्वरूपानंद भारत की धार्मिक सहष्णिुता को तहस नहस कर रहें है अतः शासन एवं न्यायालयों द्वारा उन्हें आगे धर्मसंसद नामक भड़काऊ भीड़ इकट्ठी करने से रोकना चाहिये।

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...