द्रोणाचार्य एक आदर्श शिक्षक

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 

 

द्रोणाचार्य ऐसे पहले गुरू थे जो शिक्षण संस्थाओं को गुरूकुलों से नगरों में लेकर आये। उन्होने पाठशालाओं की अवधारणा दी। उन्होने गुरूकुलों को पाठशालाओं में बदला। उनके पूर्व विद्यार्थी गुरूकुलों में जाते थे। वहां परीक्षायें वस्तुनिष्ठ नहीं होती थी। व्यक्तिनिष्ठ होती थी। परीक्षा परिणाम ऋषि पत्नियों की इच्छा पर भी आधारित रहते थे। गुरू ने यदि कह दिया कि जंगल में सौ गायों को लेकर जाओं और जब तक वे सहस्त्र गायें न हो जाये तो वापिस मत आना, बस यही परीक्षा हो गई। या ऋषि पत्नि में कह दिया कि किसी रानी के कुण्डल लेकर आना है तो शिष्य को उतीर्ण होने के लिये वही कुण्डल लाना पड़ते थे। यहां तक कि भगवान कृष्ण को गुरू पत्नि का मृत पुत्र लाना पड़ा था।
दूसरी ओर द्रोणाचार्य ने व्यक्तिनिष्ठ परीक्षा से हट कर वस्तुनिष्ठ परीक्षा की परम्परा प्रारम्भ की। उन्होने शिष्यों की योग्यता परखने के लिये मल्ल, तीरंदाजी इत्यादि का सार्वजनिक रूप से परीक्षाओं में समावेश किया। उन्होने परीक्षको के रूप में संबंधित विषयों के निष्णात व्यक्तियों को रखा।
उन्होने शिष्यों के विषय में निमग्न होने की योग्यता का परीक्षण किया। दूर शाखा पर एक पक्षी रखा। तीर से उसकी आँख भेदने की परीक्षा ली गई जिसमें अर्जुन सफल रहे थे। उस समय तक गुरू दक्षिणा की प्रथा भी थी। जब शिष्यों ने आग्रह किया तो उन्होने राजा दु्रपद को पराजित कर कैद करके लाने को कहा। यह इसलिये कि जब दु्रपद के साथ द्रोणाचार्य गुरूकुल में थे तब दु्रपद उनसे दोस्ती का दम भरते थे। पर शिक्षा समाप्त होने पर द्रोणाचार्य के पास अश्वसथामा को पिलाने के लिए दूध भी नहीं था। द्रोणाचार्य को अपने राजा मित्र द्रुपद की याद आई। वे सहायता के लिए दु्रपद के पास पहुँचे तो द्रुपद ने उन्हें अपमानित करके भगा दिया। दूसरी तरफ भगवान कृष्ण और सुदामा की आदर्श मित्रता का उदाहरण है जहां भगवान ने अपने गरीब मित्र के पैरो का प्रक्षालन स्वयं के आंसुओं से किया और बगैर किसी आडम्बर के भगवान ने सुदामा की पत्नि के द्वारा भेट किये गये चावलों को प्रेमपूर्वक खाया।
द्रुपद को अर्जुन ने पराजित कर दिया और बंदी बनाकर द्रोणाचार्य के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। द्रोणाचार्य ने कृपा कर द्रुपद को आधा राज्य वापिस कर दिया। इतने क्षमाशील थे गुरू द्रोणाचार्य। इससे अपमानित होकर द्रुपद ने यज्ञ किया जिससे उनकी संतान द्रोणाचार्य का वध कर सके। यह जानते हुये भी कि धृष्टध्रुम्न उनका वध करेगा गुरू द्रोणाचार्य ने धृष्टदुयुम्न को शिक्षा दी। वे विशालह्नदय गुरू थे।
द्रोणाचार्य को जो आलोचना की जाती है वह उनके द्वारा शिष्य एकलव्य का अंगूठा मांगने पर की जाती है। मगर पहली बात तो यह है कि एकलव्य द्रोणाचार्य के शिष्य नहीं थे। एकलव्य उनसे शिक्षा मांगने जरूर आये थे पर प्रतिबद्धता के कारण उन्होने एकलव्य को शिक्षा देने से इंकार कर दिया था। अतः एकलव्य उनके शिष्य नहीं थे। फिर एकलव्य गुरूदक्षिणा देने के लिए तैयार हो गये। तो द्रोणाचार्य ने उनका अंगूठा मांग लिया। वह इसलिये कि एकलव्य ने एक स्वमी भक्त निरीह जानवर का मंुह वाणों से भर दिया था। वहीं दूसरी ओर युदिप्ठिर का उदाहरण है जो एक कुत्ते के लिये स्वर्ग तक ठुकराने के लिये तैयार हो गये थे।
द्रोणाचार्य ने युद्ध में कौरवों का साथ दिया। यह उनका राज्य के प्रति प्रतिबद्धता के कारण था। उस समय वह एक शिक्षक नहीं वरन् शासकीय सेवक थे। उन्हें उन्हीं के शिष्यों के द्वारा धोखे से मारा दिया गया। जिन शिष्यों को उन्होने पुत्रव्रत शिक्षा दी थी उनमें इतनी योग्यता एवं साहस नहीं था कि ईमानदारी से लड़कर द्रोणाचार्य को हराते।

 

 

 

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