‘गोदान’ और ‘रंटिटंङष़ी’ फिर से पढ़ते समय

 

 

‘गोदान’ प्रेमचन्द से हमें मिली उच्च कोटि के महाकाव्यात्मक उपन्यास है । ‘रंटिटंङष़ी’ (दो सेर धान) तकष़ी (‘तकष़ी’गाँव का नाम है, वास्तविक नाम –शिवशंकरपिल्लै) से केरल की भाषा मलयालम में उपलब्ध अमर-अनुपम उपन्यास। दोनों निश्चय ही कालजयी कृतियाँ है । प्रेमचन्द और तकष़ीशिवशंकरपिल्लै उत्तर – दक्षिण के निवासी है । प्रेमचन्द का जन्म 8 अक्तूबर 1880 में काशी के निकट ‘लमही’ में हुआ तो तकष़ी का जन्म 17 अप्रैल 1912 में केरल के आलप्पुष़ा जिले के अन्तर्गत‘कुट्टनाटु’में हुआ था ।प्रेमचन्द का मृत्यु 1936 में हुआ तो भारतीय ज्ञानपीठसे पुरस्कृत तकष़ी का मृत्यु 1999 में हुआ था। विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न समय रहकर भी दोनोंमें अनेक अद्भुत समानताएँ दिखायी पड़ती है ।
‘गोदान’ और ‘दो सेर धान’ निःसंशय कालातीत कृतियाँ है । युगांतरकारी श्रेष्ठ रचनाएँ युग से संबंधित नये - नये प्रश्नों को जगाता है । उसका समाधान ढूँढना सामाजिक जीव मनुष्य का बाध्य बन जाता है । कहा जाता है कि समाज की गतिशीलता विचार-पुनर्विचार पर निर्भर है । ‘गोदान’ पढ़ने का अर्थ भारत की इतिहास पढ़ने के बराबर है। ‘गोदान’ पढ़ते समय लगता है कि यह प्रेमचन्द के जीवन का भी गोदान है । यह अंतरराष्ट्रीय और अंतर्भाषायी उपन्यास है । इस अमर रचना के बारे में डॉ. ज्ञानचन्द्र गुप्त का उल्लेख है- “गोदान” आधुनिकता-बोध का प्रस्थान-बिन्दु है । नये विचार, नयी संवेदना और संरचना की नयीअन्विति है । कृषक जीवन के समस्त संबंध- असहायता, शोषण, संघर्ष, हर्ष-विषाद, आशा - आकांक्षा, संस्कार, मर्यादा, आस्था-अनास्था और जीवन मूल्य एक दूसरे से जुड़कर सामाजिक यथार्थ की बदलती तस्वीर पेश करते है ।”(गोदान विमर्श, डॉ. ज्ञानचन्द्र गुप्त, पृष्ठ-9.)
‘गोदान’ के पूर्व के उपन्यासों में प्रेमचन्द एक ही प्रकार का आदर्शवाद अपनाकर चले । लेकिन न सुधारवादी दृष्टि है न प्रचारवादी दृष्टि । ‘गोदान’ में न किसी आश्रम की स्थापना हुई है, न ही किसी गाँधीवादी नेता की अवधारणा । यहाँ प्रेमचन्द की दृष्टि यथार्थवादी सत्य से ओतप्रोत है । कहने का तात्पर्य है कि ‘गोदान’ एक शुद्ध यथार्थवादी रचना है । प्रेमचन्द ने इसके सामाजिक रूप को युग-युग के मानवीय सत्य का रूप दिया है । समाज की समस्याओं का जितना गहन और व्यापक रूप ‘गोदान’ में प्राप्त है उतना पहले की किसी भी रचना में नहीं मिलता । प्रेमचन्द ने साहित्य में पहली बार एक दीन - हीन निम्न वर्ग के किसान (होरी) को नायक बनाकर उसके जीवन की मार्मिक परिस्थितियों का चित्रण किया है ।
तकष़ी अपनी लंबी जीवन यात्रा के बीच तीस से अधिक छोटे - बड़े उपन्यास, कहानियाँ, नाटक, यात्रा विवरण आदि लिखे है । प्रेमचन्द भी साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में अपना नाम जोड़ा है । किंतु प्रेमचन्द और तकष़ी उपन्यासकार के रूप में जाने जाते है । ‘गोदान’ की तरह, तकष़ी ने भी ‘रंटिटंङष़ी’ (दो सेर धान) में पतनोन्मुख सामंतवाद और तत्स्थान पर उदित पूंजीवाद दिखाने का सफल प्रयास किया है । इसलिए दोनों उपन्यास भूतकाल के ही नहीं, वर्तमान और भविष्य काल के भी दस्तावेज है । ‘गोदान’ प्रेमचन्द युग और प्रेमचन्दोत्तर युग के बीच की कड़ी है। तकष़ी की कृतियाँ भी अवश्य मलयालम गद्य काल के पुराने – आधुनिकता के बीच की कड़ी है ।
‘गोदान’ में भारतीय जन जीवन के अनेक मुख उजागर होता है । इसमें प्रेमचन्द ने डूबने वाले सामंतवाद और उगने वाले पूंजीवाद की आँखों देखा वर्णन किया है । ‘गोदान’ को शोषण के विरुद्ध का धर्म युद्ध कहना उचित है । ‘रंटिटंङष़ी’ (दो सेर धान) में तकष़ी भी पतनशील जमींदारी - सामंतवाद एवं तत् स्थान पर उदित पूंजीवाद दिखाते है । ‘गोदान’ के समान तकष़ी के ‘रंटिटंङष़ी’ भीहमें हर वातावरण में पुनर्विचार को उत्तेजित करता है । यही कारण आज भी दोनों की अध्ययन-अनुसंधान हमारी बाध्य एवं साध्य है ।
विश्वविख्यात उपन्यास ‘गोदान’ भारतीय किसान के प्रतिनिधि होरी का अमर समर गाथा है । ‘रंटिटंङष़ी’ (दो सेर धान)तकष़ी का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है, जिसका प्रकाशन 1948 में हुआ था । मलयालम प्रकाशनसे दस वर्ष बाद, 1958 में श्रीमती भारती विद्यार्थी ने ‘दो सेर धान’ नाम में इसका हिन्दी अनुवाद करकेंद्र साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित किया । ‘दो सेर धान’ केरल के शोषित किसान-मज़दूरों के जीवन की लड़ाई का दर्पण है । केरल के किसानों-मज़दूरों के भौतिक एवं नैतिक जीवन का अद्भुत वर्णन इसमेंमिलता है । आलप्पुष़ा के कुट्टनाट‘धान की खान’ जाने जाते है । यहाँ ‘पुलया’ और ‘परया’ (अधिसूचित) जाति के लोग मृत्यु पर्यंत धान उपजने का पेशा करता है। मनुष्य होकर भी उसका जीवन मनुष्य समान नहीं है। उन मज़दूरों के मर्मस्पर्शी जीवन से ‘दो सेर धान’उपन्यास संपन्न है ।
‘गोदान’ बड़ी गहराई से एक युग की प्रतिनिधित्व करने वाली उपन्यास है । यह भारतीय किसान का संघर्ष - गाथा है । इसे हिन्दी उपन्यास की वास्तविकता की गौरवकहना उचित है ।प्रेमचन्द ने ‘गोदान’ में अपनी परवर्ती रचनाओं से अलग होकर यथार्थवाद का उपयोग किया है ।इसमें घटना और अनुभूति- दोनों में यथार्थवाद मिलता है । घटना और अनुभूति, आदर्श और यथार्थ का सम्मेलन ‘गोदान’ की गरिमा को बढ़ाते है । इस में उपन्यासकार ने सामाजिक यथार्थ की धरातल पर खड़ा होकर किसानइतिहास को भली-भाँति रेखांकित किया है । प्रेमचन्द के उस विशिष्ट सक्षमता को आलोचकों ने ‘आदर्शोन्मुखयथार्थवाद’ नाम से पुकारा है । ‘दो से धान’ के आरंभ से अवसान तक की घटनाओं में यथार्थ की चमक मिलती है । अथवा इसे निःसंकोचआदर्शोन्मुखयथार्थवादी रचना कह सकते है ।
‘गोदान’ के हीरो (Hero) होरी और ‘दो सेर धान’ की कोरन ग्रामीण भारत की कृषक-मज़दूर संस्कार-सभ्यता के प्रतीक है । कूट व्यवस्थिति के आगे नतमस्तक होरीहमारे किसान इतिहास का ज्वलंत प्रतिनिधिहै । सच में होरी भारतीय साहित्य की बड़ी उपलब्धि है । अतः यों कहिए कि ‘गोदान’ के उपलब्धि और निष्पत्ति होरी है । ‘गोदान’ और ‘दो सेर धान’ में ग्रामीण जीवन की वास्तविकताएँ भरा पड़ा है । ग्राम्य जीवन की झाँकियाँप्रेमचन्द में कितनी उपलब्ध है उतनी और कहीं नहीं मिलता। लगता है कि ग्रामीण आत्मीयता प्रेमचन्द और तकष़ी साहित्य का प्राण है ।
‘गोदान’ का होरी और ‘रटिटंङष़ी’ (दो सेर धान) का कोरन आर्थिक स्थिति में ऋणी है । लेकिन दोनों की दृष्टिकोण में थोड़ी अंतर है । होरीमें आदर्शवाद और यथार्थवाद है, कोरनमें आदर्श और यथार्थ के साथ विप्लव ज्वाला भी है । धनिया (गोदान) और चिरुता (दो सेर धान)में भी कई समानताएँ है। होरी के मृत्यु के अवसर धनिया परास्त नहीं होती, सामना करती है । कोरन जेल जाते समय चिरुताउस विडंबना पूर्ण वातावरण को धैर्य पूर्वक सामना करती है । संक्षेप में कहा जा सकता है कि ‘गोदान’ और ‘दो सेर धान’, दोनों अनेक समानताओं के साथ समानांतर चलने वाले, भारत की दिशा सूचक कृतियाँ है । दोनों हमारी महान कालजयी उपलब्धियाँ भी है ।

 

 


Written by: Lembodharan Pillai

 

 

 

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