गुरू, गाय और गंगा

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 

गुरू, ज्ञान गंगा का उद्गम है। और शिवय उस ज्ञान गंगा में डूब कर स्नान करते हैं और आचमन करते हैं। ज्ञान की गंगा में डुबकी लगा कर उनका पुनर्जन्म हो जाता है। गुरू ज्ञान की कामधेनु है। वह शिवय की हर मनोकामना पूर्ण करने का बीज है। यदि शिवय एक उपजाऊ भूमि बन गया तो उसकी मनोकामना पल्लवित होकर मन वांछित फल देती है। हर धेनु एक कामधेनु है उसका मूत्र गंगा जल में समान रोगहर है। हर गाय में तैंतीस करोड़ देवता निवास करते हैं। गाय से स्वर्ग, पौष्टिक दूध, गोबर से खाद, ईंधन प्रकाश, गौ मूत्र से औषधि तो प्राप्त होते ही है।
गंगा भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न होकर भगवान शंकर को शिरोधार्य हुई। फिर भगीरथ की तपस्या उन्हें पृथ्वी पर लाई। गंगा आई तो भगीरथ के पूर्वजो को पुर्नजीवित करने पर हम सबको भी जमीन दान देती है। गंगा पाप हर है। हिमालय से उद्गम कर श्रिप्र गति से बहती हुई कई नदियों को समाहित कर उन्हें भी पार हर बनाती है। गंगा मार्ग में कई प्रयाग उत्पन्न करती है जैसे रूद्र प्रयाग, विष्णु प्रयाग और प्रयागराज आदि। वह हमारी संस्कृति एवं इतिहास का प्रवाह है। महाभारत की जन्म दात्री है। गंगा विष्णु की साक्षात चरणोदक है और सभी कामनायें पूर्ण करती है। जनक ने गायों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त किया था। इस तरह गुरू, गाय और गंगा एक परमात्मा के तीन प्रवाहमान गुण रूप है। इनमें से किसी की भी भक्ति ब्रह्नम पद प्राप्त करा देती है फिर तीनो की एक साथ भक्ति का तो कहना ही क्या।
लगभग सम्पूर्ण ब्रहदारण्यक उपनिषद गुरू और गाय की प्रवाहनमान गंगा है। जनक याज्ञवल्कल से ज्ञान प्राप्त करने के लिये स्वर्ण मुद्रा जटित श्रंग युक्त गायें ज्ञान के निमित्त दान करते थे। जिन गायों का दान किया जाता है, व्यक्ति उन की पूछ पकड़ कर ही बैतरणी पार कर लेता है।
भगवान कृष्ण ने गीता के दसवें अध्याय में गायों में कामधेुनु गुरूओं में वृहस्पति एवं नदियों में गंगा को स्वयं की विभूति बतलाया है, वहीं मंत्रो में गायत्री को स्वयं की विभूति बतलाया है। इस तरह गुरू गायत्री गाय और गंगा संस्कृति के पवित्र घटक है।
मात्र गायों की सेवा ने सत्यकाम जावाल को ब्रह्नम वेत्ता बना दिया था। गुरू हरिदु्रमित गौतम ने चार सौ दुर्बल गायों को सत्यकाम जावाल को देते हुये कहा है कि साम्य इनके पीछे पीछे जाओ। तब सत्यकाम जावाल ने कहा है “इनके सहस्त्र हुये बिना मैं वापिस नहीे आऊँगा। फिर कुछ दिन बीतने पर ऋषभ ने सत्यकाम से कहा “हे सत्यकाम अब हम सहस्त्र हो गये है हमें आचार्य कुल में पहुंचाओ। मैं तुम्हें ब्रह्नम का एक पाद बतलाता हँू। पूर्व दिशा एक कला पश्चिम दिशा एक कला उत्तर दिशा एक कला और दक्षिण दिशा एक कला ये चार कलायें मिल कर ब्रहन का प्रकाशवान नाम का एक पाद होता है।
अग्नि तुम्हें आगे की कला बतायेगा। रात में अग्नि ने दूसरा पाद बतलाया “पृथ्वी, कला, अंतरिद्वा कला, स्वर्ग कला और समुद्र कला मिल कर ब्रह्नन की अनंत पद नामक एक कला होती है। अब हंस तुम्हें तीसरा पाद बतलायेगा। हंस ने बतलाया “अग्निकला, सूर्य, कला, चन्द्रकला और विद्युत कला ब्रह्नम ज्योतिवमान कला होती है। अब मदगु तुम्हें अगला पाद बतलायेगा। मदगु ने कहा “प्राण कला, चक्षु कली श्रीत्र कला और मन कला ब्रह्नन की आयतन वान कला होती है। इस तरह प्रकाशवान, अनंत, ज्योतिकला और आयतन कला युक्त सत्यकाम को गौतम ने देख कर तुम ब्रह्नन वेत्ता मालूम पड़ते हो।
अति श्रेष्ठ कनेपनिषद का जन्म ही गायों के दान को लेकर हुआ था। प्रेमल वाज श्रवस का लड़का नचिकेता था। जब पिता ने पानी पी चुकी, घास खा चुकी, दूध दे चुकी ढीली इन्द्रियों वाली (बूढ़ी, दुबली, पतली) गायों को यज्ञ के पश्चात दान में दिया तो नचिकेता ने पिता का भला चाहते हुये पूछा “कि” मुझे किसको दान करेंगे। तब गौतम ने कहा कि “मैं तुम्हें मृत्यु को दान देता हँू।” इसके पश्चात यम नत्रिकेता संवाद प्रारम्भ हुआ जो कठोपनिषद के नाम से जाना जाता है।
आज हम भी भंगीलाल को पूजते है पर गिपथगा को दूषित करते हैं जो रघुवंश और महाभारत की जनक है। गोपाल, गोवधर्न या गोविन्द की भागवत श्रद्धा से सुनते है पर गायें उपेक्षित है। यथा दैवो तथा गुरू कहते है पर गुरू को महत्व नहीं देते । भूलिये कि भगवान राम को गुरू वशिष्ठ और विश्वामित्र ने बनाया था। भगवान कृष्ण को योग गायों और संदीपनी ने सिखया था।
ब्रह्नम ज्ञान वह ज्ञान है जिसको प्राप्त कर सब ज्ञान प्राप्त हो जाते हैं। ब्रह्नन वेत्ता ही विरले हैं और मुमुक्षु तो हैं ही नहीं। गंगा में शव और नाले प्रवाहित कर हम गंगा मां का अपमान कर रहें है। गो माता भिखारियों की तरह यहां वहां कचरे में मंुह डालती रहती है। शासन गीता को पाठ्यक्रम में शामिल कर हमें संस्कृति सिखाने का बलात प्रयत्न कर रहा है। क्या परिवार नामक संस्था इतनी कमजोर हो गई है कि हम बच्चों को संस्कृति से परिचित करवाने में अक्षम हो गये है।

 

 

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