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हिन्दी क्या पूर्णरूप में हमारी राष्ट्र भाषा है...?

 

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चीन पर चीनी, जापान पर जापानी, अमेरिका पर अंग्रेज़ी, जर्मन पर जर्मनी उनकी राष्ट्रभाषा है I संसार के हर राष्ट्र को अपनी राष्ट्रभाषएँ होते है I भारत को भी अपनी राष्ट्र भाषा है, यह ऊँचतम पद पर हिन्दी विद्यमान है I क्या अमेरिका में अंग्रेज़ी के समान, जापान में जापानी भाषा को मिलने के समान, चीन में चीनी को मिलने के समान हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी को हर प्रकार की अभिमान और पद मिला है ? यह कहने में दुःख होता है कि आज भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में उचित तथा आवश्यक स्थान नहीं मिला है I क्यों.....? राष्ट्र और राष्ट्रभाषा प्रेमी इस विषय पर सोचना और मन को परिवर्तित करना आवश्यक है I


हमें मालुम है कि अंग्रेज़ियों के ज़माने में इधर अंग्रेज़ी राष्ट्रभाषा पद पर रहा था I महात्म गाँधी के निर्देश के अनुसार हिन्दी राष्ट्रभाषा पद पर आये I वैसे 14 सितंबर 1949 को संविधान निर्मात्री परिषद ने बहुमत से हिन्दी को भारत संघ के राजभाषा भी घोषित किया I इसके कारण 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है I 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही हिन्दी को पूर्ण रूप में राजभाषा का पद प्रदान कर दिया I


आरंभ काल में स्वतंत्र भारत सरकार ने अंग्रेज़ी को भी हिन्दी स्थान दिया, इससे दक्षिण भारतीयों को मदद मिले I प्रथम सरकार ने यह घोषणा किया कि आगे के दस वर्षों तक अंग्रेज़ी, हिन्दी के सहायक भाषा के रूप में काम करेंगे, इसके बाद कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लोग अपनी सारी भाषा संबंधी कामकाज हिन्दी में कर सकेंगे I राष्ट्र शिल्पियों और राजनीतिञों के यह संकल्प 63 साल बीतने के बाद भी संकल्प मात्र रह सकता है I


रहन-सहन, भाषा, भौगोलिक रीति, राजनीति आदि अनेक क्षेत्र में पहले भारत में विभिन्नताएँ दिखायी पडी थी I यह विभिन्नताएँ एक हद तक समाप्त हुई, फिर भी हिन्दी के प्रति अधिकारी वर्ग और नागिरिकों में कुछ का विकृत मनोभाव का कोई परिवर्तन नहीं हुई है I करीब 66 वर्षों से पहले अंग्रेज़ यहाँ के अधिकार से अलग हो गयी, स्वदेशी के हाथ पर अधिकार आयी, हमारे स्वदेशियों के बीच के विदेशी आज भी हिन्दी का शत्रुता वैसा ही लेकर चलता है, जैसे विदेश शासन काल में ब्रिटन कर दिये थे I


उत्तर हो या दक्षिण भारत, राजनीतिञों और सरकारी कर्मचारियों एवं लोगों में अधिकाँश का गलत विश्वास है कि अंग्रेज़ी अच्छा भाषा है, वह स्टाटस या गरिमा देती है I अंग्रेज़ चले जाने पर भी उनकी प्रेत कन्याकुमारी से काश्मीर तक पडी हुई है Iवे हमारी राष्ट्र भाषा और प्राँतीय भाषाओं के प्रति करने वाले यह नीचतम दृष्टिकोण बदलता तो ये भाषाएँ यथाविधि अपनी अपनी स्तर पर रह सकेगी I


वास्तव में हिन्दी का शत्रु दक्षिण भारत के लोग और उनके राज्य भाषाएँ नहीं है I इधर के लोग अपनी मातृभाषा मलयालम, कन्नडा, तमिल और तेलुंगु के समान अपने राष्ट्रभाषा को भी प्यार तथा आदर करते है I मलयालम हो, तमिल, हिन्दी या असमी, कश्मीर से कन्याकुमारी तक की हर छोटी बडी भाषाएँ हमारी विशिष्ट पैतृक संपत्ति है, उसके भीतर बहने वाली भावधारा एक है, उसकी शरीर और आत्मा इस ज़मीन से बन गयी है I इसलिए ये भाषाएँ एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित है, एक की हानि दूसरे की एवं पूरे भारत की हानी बन सकती है I


यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हमारे यहाँ रहकर, राष्ट्र की हर सुविधाएँ पाकर हमारी भाषा को निकम्मा बताकर, विदेशी भाषा अंग्रेज़ी को मातृभाषा और राष्ट्र भाषा से ऊपर प्रतिष्ठित कर आवश्यक और अनावश्यक संदर्भ में उसका पूजा-आराधना करने वाला जो भी हो, सचमुच राष्ट्रभाषा का शत्रु है I स्वदेश के चीज़ों को त्जकर विदेश वस्तुओं को पहला स्थान देने का एक बुरा मनोभाव कुछ लोगों के मन में अब भी बाकी है, यह भी हिन्दी को राष्ट्र भाषा के पूर्ण पद मिलने का एक और बाधा है I


राष्ट्र भाषा की प्रचार-प्रसार केलिए हर समय हमारे सरकार कुछ संघ व समति को आयोजित करते है, उनके द्वारा तैयार करने वाले परिपाटियाँ उनके या कुछ सीमित लोगों के आसपास ही रह सकते है I बहुभाषी भारत के हिन्दीतर प्रदेशों में हिन्दी का प्रचार प्रसार प्रणाली नाममात्र होता है I इससे कभी कभी शंका भी पैदा होता है कि ये कार्यक्रम सदुद्धेश्य से हो या इसके पीछे कोई दुरुद्धेश्य हो I


दक्षिण भारत के सरकारी कार्यालयों, रेलवे, बैंक और अन्य कार्यालयों में आज भी राष्ट्र भाषा को उतना स्थान नहीं मिलता है, जितना विदेशी भाषा अंग्रेज़ी को देता है I बडे बडे अफ्सरों और कर्मचारियों का दृष्टिकोण में उदासीनता प्रकटतम है I उनके अवहेलना भरी हुई यह व्यवहार के पीछे यह मनोभाव होता है कि हिन्दी विमाता का संतान है, उसे इतना पर्याप्त है I ऎसे अधिकारियों को दंड न देकर सरकार चुपचाप बैठता है, यह भाषा प्रेमियों में निराशा पैदा करता है I


केरल जैसे अहिन्दी प्रदेशों के स्कूलों में त्रिभाषा पद्धति पर पढायी जाती है I सरकार विद्यालयों में मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और अंग्रेज़ी पढने की सुविधा है I किन्तु गैर सरकारी स्कूलों में राष्ट्रभाषा को जानबूझकर छोडकर उसी स्थान पर अंग्रेज़ी को प्रतिष्ठित करती है I ऎसे विद्यालयों में पढने वाले विद्यार्थी स्वाभाविक रूप में राष्ट्रभाषा के साथ, राष्ट्र तथा राष्ट्रीयता एवं हमारी सभ्यता से अलग हो सकती है I इससे एक साथ दो नष्ट घटित होती है, एक राष्ट्रभाषा के संपर्क से नयी पीढी को रोकना, दूसरा भारत की एकता पर बाधा डालना I राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार इसकी मूकसाक्षी बनकर बैठता है I यह भी ध्यान देना योग्य है कि यहाँ के कालेजों और विश्वविद्यालयों में मुख्य भाषा के रूप में अंग्रेज़ी को स्थान दिया है I कालेजों में हिन्दी या प्रान्तीय भाषाएँ उपभाषा के रूप में पढाये जाते है I अपने देश में अपनी भाषा को दूसरी स्थान देकर अपहास और अवहेलना करते समय हमें लज्जा नहीं आता है I स्वभाषा को अपमानित कर विदेशी भाषा को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करने वाला यह सरकार रीति संसार में और कहीं नहीं होगी I


कुछ लोगों का मत यह है कि तकनीकि, डाक्टरी जैसे विषय अंग्रेज़ी में नहीं पढती या पढाती तो सुचारु ढंग पर नहीं होगी I क्योंकि अंग्रेज़ी विश्व भाषा है, हमारे विद्यार्थी आसान से समझ सकता है I यह गलत विश्वास है कि अंग्रेज़ी आसान भाषा है, उर पर विषय आता तो अच्छा पढता है I इस प्रकार अनावश्यक तर्क प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति जापान, चीन, जर्मनी आदि अन्य देशों की ओर ज़रा दृष्टी डालना अच्छा है I क्या ये राष्ट्र व्यापार, व्यवसाय, तकनीकी या डाक्टरी में पीछे है ? उधर बेरोज़गारी या यहाँ के समान का अर्थाभाव है ? नहीं, ऊपर कहे गये सब राष्ट्र में उनकी मातृभाषा में सब विषय पढाते है, छोटे छोटे विद्यर्थी भी उससे आसानी से लाभ उठा सकता है I


मातृभाषा, माता के समान और राष्ट्र भाषा शरीर में साँस के समान है I हमारे अधिकारी और लोग राष्ट्रभाषा के प्रति करने वाला विकट तथा हास्य- व्यंग्य मनोभाव वास्तव में राष्ट्र के प्रति कर रहे है I इससे राष्ट्र की संस्कृति, सभ्यता, अखंडता, राष्ट्रीयबोध और हमारी आज़ादी को भी हानि पहुंचती है I हर राष्ट्र को अपना राष्ट्र भाषा है, अंग्रेज़ी नहीं, हिन्दी हमारी राष्टभाषा, राजभाषा एवं संपर्क भाषा है I हर समय, हर भारतीय के मन में पूर्णार्थ में यह नारा उठता तो हिन्दी सब अर्थ में पूरे भारत की राष्ट्रभाषा बनकर रहेंगी I

 

 


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