हिन्दी सिनेमा का हिन्दी के प्रसार में योगदान

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 

 

पहली भारतीय फिल्म सवाक हिन्दी आलम आरा थी। मगर वह मूक फिल्म थी। हालांकि पहले ल्यूमिये बंधु की फिल्मी स्ट्रिप्य बाजार में आ चुकी थी। उसी समय लोगो ने अनुमान लगा लिया था कि एक सशक्त माध्यम जन्म ले चुका है। सन् उन्नीस सौ तेईस में “हरिशचन्द्र तारामती पहली हिन्दी मूक फिल्म थी। उस समय की फिल्मों में पारसी थियेटर का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। उस समय की हिन्दी फिल्मों में उर्दू के शब्दों की बहुलता मिलती है। सन् उन्नीस सौ चालीस से उन्नीस सौ पचास तक हिन्दी फिल्मों का स्वर्ण युग आरम्भ हो चुका था। वह समय के के.एल.सहगल, दिलीप कुमार, देविका रानी जैसे सितारों का युग था। पृथ्वी थियेटर आरम्भ हो चुका था और मुम्बई हिन्दी फिल्मों का केन्द्र बन चुका था।

सन् पचास से साठ तक कई धार्मिक सामाजिक फिल्में बनी। स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित फिल्में भी बनी वे फिल्में खूब चली। इस समय फिल्मी नायको में कुमार नाम से प्रचलन हो गया था जैसे दिलीप कुमार तो पहले से ही थे, राजकुमार, राजेन्द्र कुमार, मनोज कुमार आदि। मगर कुछ और नायक भी थे जैसे कपूर परिवार, विश्वजीत आदि। कवि प्रदीप ने इस दौरान कई मधुर गीत लिखे।

साठ और सत्तर का दशक हिन्दी सिनेमा का स्वर्ण युग था। शैलेन्द्र और नीरज जैसे कवि सतह पर आये। जैसे पचास के दशक में “मदर इंडिया” दिया और तूफान जैसी अप्रतिम फिल्में बनी। साठ के दशक में तो जैसे उत्तम फिल्मों की बाढ़ सी आ गई। जेमिनी, आर.के.प्रोडक्शन, राजश्री प्रोडक्शन आदि कई कंपनियां बाजार में उतर आई। राजकपूर के पीछे तो लोग पागल हो गये थे। उसकी फिल्म रिलीज होत ही लोग सैकड़ो मील दूर से उसकी फिल्में देखने आते थे। हिन्दी सिनेमा में देवानंद एवं धर्मेन्द्र के योगदान को कभी भूला नहीं जा सकता। नई पीढ़ी इनकी नकल करने लगी थी। यह युग नायिकाओं का भी युग था। जिनमें नरगिस का नाम सबसे ऊपर रखा जाता है। साथ ही साथ मीना कुमारी, वहीदा रहमान इस समय की सबसे अमर नायिकायें है।

उन दिनों गाने, संगीत एवं नाच उत्कृष्ट होते थे। पचास और साठ के दशक के गाने अमर हैं। लोगो ने हिनदी सीखना एवं नृत्य सीखना, गाने एवं संगीत की मधुरता से किया। साठ से सत्तर के दशक में हिन्दी फिल्मों की तूती बोलने लगी। मध्य पूर्व के लोग हिन्दी सीखने लगे। इन्ही फिल्मों को समझने के लिये महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के लोग हिन्दी सीखने लगे। मुगले आजम, “वक्त” के तो डायलाग जीवन शैली बनने लगे । जैसे “सलीम का दिल हिन्दुस्तान” की सल्तनत नहीं है या वक्त का डायलाग “चिनाय सेठ”, जिनके अपने घर शीशे के बने होते है वे दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंका करते या वक्त का एक और डायलाग यह चाकू है, लग जायेगा तो हाथ कट जायेगा। इसी समय बालीबुड में हालीवुड से ज्यादा फिल्में बनने लगी। सत्तर के दशक में एक ऐसे नायक का उदय हुआ जो सदी का महानायक कहा जाने लगा। ख्वाजा अहमद अब्बास की सात हिन्दुस्तानी ने अमिताभ बच्चन को जन्म दिया। उसकी दीवार और जंजीर फिल्मों ने एक नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व किया। उसकी छवि एंग्रीयंगमैन की बन गई। उसकी अन्य अमर फिल्में काला पत्थर, त्रिशूल, लावारिस इत्यादि रही। ये बाक्स आफिस पर अत्यन्त सफल रही।

साठ से सत्तर का दशक समानान्तर सिनेमा का युग भी था। ये फिल्में कम बजट की होती थी मगर चलती खूब थी। इन्हीं फिल्मों के माध्यम से स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, नसिरूद्दीन शाह सहदशिव अमरापुरकर इत्यादि कलाकारों ने हिन्दी सिनेमा में मानो भूचाल ला दिया। फिल्मों की हिन्दी सामान्य बोलचाल की भाषा होती है। यह विशुद्ध संस्कृत निष्ठ मानक हिन्दी नहीं होती। यह वह, संख्यक हिन्दी की सरल हिन्दी होती है। इसलिये ग्राहय होती है। फिल्मों ने हिन्दी को विश्व की पहले दर्जे की भाषा बना दिया है। हालांकि इसे अंग्रेजी, मण्डारिन के बाद रखा जाता है।

“शोले” फिल्म का तो हर वाक्य अमर हो गया जैसे “मैं देखना चाहता था कि तुम्हारे हाथो” में अभी भी वह दम है और मियां मैं सूरमा भोपाली ऐसे नहीं कहलाता, “ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर,” “कितने आदमी थे”, यहां से पचास पचास कोस दूर गांव में जब बच्चा रोता है तो माँ कहती है, बेटा सो जा, नहीं तो गब्बर आ जायेगा, हम अंग्रेजो के जमाने के जेलर है और कई अन्य अनेक डायलाग लोगो की जबान पर आ गये।

मनोज कुमार ने हमारी धार्मिक भावनाओं और देश प्रेम को खूब भुनाया। “ओम जय जगदीश हरे”, आरती उनमें पूरब पश्चिम में डाली इस आरती के परदे पर आते ही लोग श्रद्धा से हाथ जोड़ते हुए देखे गये। इसके रिकार्ड भी बहुत बने और उनसे ग्रामाफोन भी बहुत बिके। क्रांति फिल्म कमजोर निर्देशन के कारण अधिक नहीं चली। पर उसकी फिल्मों के गाने बहुत प्रसिद्ध हुए। अभिताभ बच्चन की “सिलसिला” एक ऐसी फिल्म थी जिसने विदेशो में खूब पैसे कमाये। उसकी अग्निपथ अधिक नहीं चली। इन सभी फिल्मों के संवाद और उनकी अदायगी ने लाखों लोगो को हिन्दी सीखने के लिये मजबूर किया। हिन्दी ही नहीं कतिपय हिन्दी फिल्मों के कारण उर्दू को भी प्रसार मिला। खान बन्धुओं की फिल्मों ने मध्य पूर्व एशिया ने जम कर हिन्दी का प्रचार एवं प्रसार किया।

अभी सलमान खान की “बजरंगी भाईजान” पर्दे पर आई। उसे कुछ काटने छाटने के बाद पाकिस्तान में भी दिखाया जा रहा है। निर्देशको ने अलग-अलग देशो में जो छायांकन किया है वहां के देशवासी भी इन फिल्मों को देखने के लिये उत्सुक रहते है। सलीम-जावेद की जोड़ी ने सशक्त संवाद लिखे। वे अच्छे अभिनेताओं का सहारा पाकर और सशक्त हो गये। उन संवादो की अदायगी के समय उन्हें बोलने वाला भी स्वयं को नायक समझने लगता है।

आमिर खान की फिल्में नये विषयों को लेकर बनाई जाती है। लगान एक उत्कृष्ट फिल्में थी। शाहरूख खान रोमांटिक फिल्मों में आये और नई पीढ़ी से प्रशंसा बटोरी। अक्षय कुमार एक्शन फिल्मों के नायक रहे। मेनेरिज्म, दिलीप कुमार के समय से फिल्मों पर छाया रहा।

हिन्दी का जितना प्रसार फिल्मों ने किया है उतना किसी हिन्दी के प्राध्यापक या विश्वविद्यालय ने नहीं किया। वैसे भी हिन्दी या हिन्दी का मूल रूप सामान्य बोलचाल की भाषा है, संस्कृत निष्ठ या मानक हिन्दी नहीं।

गानों ने हिन्दी को बहुत लोकप्रिय बनाया। बिनाका टूथ माला के अमीन सयानी को कौन भूल सकता है ? जिसका प्रसारण सीलोन से होता था। लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, आशा भोसले, महेन्द्र कपूर, हेमन्त कुमार, बर्मन दा आदि हिन्दी फिल्मों के अमर गायक रहें है। “सा, रे, गा, मा, या लिटिल चेम्प कार्यक्रम में उन्हीं की नकल की जाती है।

हिन्दी फिल्मों से हिन्दी के प्रसार का श्रेय पूरा हिन्दी फिल्म उद्योग को जाता है मात्र एक व्यक्ति को नहीं। आज विश्व में सर्वाधिक फिल्में हिन्दी की ही होती है और अधिक से अधिक लोग उन्हें देखने और समझने को उत्सुक रहते हैं।

 

 

 

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