यहाँ इतिहास जीवित है

 

 

वर्षों से एक जबर्दस्त ख़्वाहिश थी राजा जनक की राजधानी देखने की । जब वहाँ जाने को प्रस्तुत हुए तो लगा ,वहाँ से भी बुलावा आने पर ही लोग आते होंगे । बड़ी गाड़ी से हम अपने रिश्तेदारों के साथ 18 अप्रेल को सुबह छह बजे निकल पड़े थे । दरभंगा की सड़कों का कायाकल्प देखकर मैं हैरान थी ।यह सड़कें ही कभी यहाँ की अभिशाप थीं । लगभग एक सौ दो किलोमीटर की दूरी पर यहाँ से जनकपुर है । जिसमें से तकरीबन बीस किलोमीटर सड़क बेहद खराब ,वहाँ जगह जगह रोड़े ,पत्थर आदि पड़े हुए थे ,जो सड़क निर्माण के सूचना दे रहे थे ।
चारों तरफ गेंहू की कटाई के बाद के खुले खुले खेत .कुछ खेतों मे फसलों के बोझ बनकर रखे थे ,कुछ मे,दानों को भूसे से अलग कर जमा किया गया था ।
रास्ते के दोनों तरफ मँझोले आकार के गदराए आम के पेड़ थे । हम बढ़े जा रहे थे उस अनुपम सुषमा को निहारते हुए ,भारत नेपाल सीमा पर गाड़ी रोक दी गई । चेकिंग के बाद एक टोकन लेकर गाड़ी आगे बढ़ी ,तो कुछ दूर पर नेपाली सीमा रक्षक ने रोक लिया । वहाँ की रसमअदायगी के बाद आगे बढ़े । ,वैसा ही सब कुछ ,वैसे ही वृक्ष ,पोखर तालाब ,जिनके किनारे एकदम साफ सुथरे ,चमकता हुआ जल ,,तनिक भी नहीं लगा ,हम मिथिला से बाहर हैं । किसी दूसरे देश जैसी बात सिर्फ चेक पोस्ट पर लगी थी । करीब साढ़े दस बजे हम लोग जनकपुर पहुँच गए ।
मुख्य मंदिर के सन्मुख से आगे बढ़कर सर्व प्रथम हम ,विवाह मंडप की ओर अग्रसर हुए ।वहाँ गेट पर पाँच रुपए प्रति व्यक्ति टिकट और पाँच रुपए कैमरे का देकर हम उस लोहे के फाटक को पर करते हुए उस विशाल मंडप की ओर बढ़े ।
इतिहास है कि इस जगह पर एक प्राचीन मंडप था जो विक्रम संवत 1990 के भूकंप में धराशायी हो गया था । बाद में इसका निर्माण कराया गया था ।यह पेगोडा शैली में निर्माण किया गया बहुत ही आधुनिक ,आकर्षक और दर्शनीय स्थल है । इस नवीन मंडप में उनके विवाह के समय जीतने बरती और सराती के रूप में देवी देवियाँ मौजूद थे सब का विग्रह बना हुआ है । ऊंचे चबूतरे के ऊपर बना मंडप कि दीवारें शीशे के हैं ,जिससे अंदर का दृश्य दिखाई पड़ता है । दरवाजे पर बैठे पंडित जी ने कथा को विस्तार दिया ।सामने सिंहासन पर श्री राम और सीता विराजमान हैं । श्री राम के ओर से उत्तर की ओर मुंह करके सिंहासन पर जनकजी ,उनकी पत्नी ,जनक जी के भाई ,भाभी ,और बीच मे उनके पुरोहित शतानन्द बैठे हैं । सिताजी के तरफ से दक्षिण की ओर मुंह किए सिंहासन पर श्री दशरथजी ,विश्वामित्रजी जी और वशिष्ठ जी बैठे हैं । वहाँ भीतर के खंभों मेंउन देवी देवताओं की मूर्तियाँ हैं ,जो विवाह के समय उपस्थित थे । विवाहमण्डप के चारों कोने पर चारॉ भाईयों का कोहबर बना हुआ है । सीता ,जनक जी की पुत्री उर्मिला ,जनक जी के भाई की दोनों बेटियों का विवाह एक साथ ही चारों राजकुमारों के साथ हुआ था । श्री राम जानकी का ,लक्ष्मण उर्मिला का ,भरत मांडवी का ,शत्रुघ्न श्रुतिकीर्ति का । इस मंडप के चारों ओर बहुत ही सुंदर और आकर्षक पार्क हैं ।
वहाँ से हम श्री जानकी मंदिर देखने आए । यह नेपाल का सबसे भव्य मंदिर माना जाता है । इस मंदिर का निर्माण टिकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुँवर द्वारा 1894 ईसवी में प्रारम्भ किया गया था । करीब 15-16 वर्ष का समय और 9लाख रुपए इसमें खर्च हुए थे ,इसलिए इसे नौ लखा मंदिर भी कहा जाता है । उनका जन्म तो पूनौड़ा में जमीन से हुआ ,मगर लालन पालन इसी स्थल पर माना जाता है । इस महल के पीछे एक सुंदर संग्रहालय भी है ,जहां ,सीता जन्मोत्सव ,आदि उनके जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों की मनोहारिणी झाँकियाँ प्रस्तुत की गई हैं ।
जनक पुर में काफी मंदिर हैं ।राम मंदिर ,लकसमन मंदिर ,राजदेवी मंदिर ,रामानन्दआश्रम ,मणिमण्डप ,संकटमोचन ,शिव मंदिर ,नगर डीहबार मंदिर [ग्राम या नगर देवता ] तोताद्रीमठ ,रानी पाटी मंदिर ,युगल बिनोद कुंज ,सुंदर सदन अग्निकुटी ,रत्नसागर कुटी गंगा सागर ,धनुष सागर ,दूधमती ,कुपेश्वर क्षिरेश्वर नाथ ,जलेश्वर नाथ आदि ।जहां से सीताजी की शादी के मंडप का मिट्टी लाया गया था ,वह मृतखनी बाद में मटीहानी के नाम से प्रसिद्ध है ।
धनुशाधाम जनकपुर से पंद्रह किलो मीटर उत्तर पूर्व में हैं ।रामायण काल के समय का एक मात्र जीवित और सुरक्षित अवशेष जो सीता स्वयंवर में श्री राम द्वारा भंग किया गया था ,उसके तीन खंड हुए ।एक जनकपुर के तलाब में गिरा ,दूसरा रामेश्वरम में ,और तीसरा यहाँ पर ॥ कहा जाता है कि शिवजी का धरोहर यह धनुष दधीचि की हड्डी का बना है । यह टुकड़ा निरंतर बढ़ता जा रहा है। इस खंड के ऊपर एक विशाल प्राचीन पीपल का वृक्ष है । जड़ के समीप ही एक कुंड है ,जिसका संबंध पाताल से है ।पुजारीजी ने बताया ,जब इसमें पानी कम होता है तब नेपाल पर कोई न कोई संकट आता है ।ऐसा समय अभी उस वक्त आया था ,जब नेपाल में राजा और उसके परिवार की हत्या कर दी गई थी ।{लेकिन पंडित जीने यह नहीं बताया कि इस बार भी पानी बहुत कम है ,क्योंकि मात्र एक सप्ताह के बाद ही वहाँ भूकंप का विनाश काठमांडू सहित नेपाल के अन्य हिस्सों को भी झेलना पड़ा }
वहाँ रामजानकी का सुंदर मंदिर भी है ,और धनुष वाले स्थान को घेर कर उसके ऊपर एक शेड बना दी गई है ।
जनकपुर में विवाह पंचमी अत्यंत ही आनंद दायक उत्सव है । वहाँ आज के ही दिन [अग्रहण शुक्ल पंचमी] श्रीजी का विवाह हुआ था । विवाह की सारी रीति रिवाजों को इतने मनोहर रूप से मनाया जाता है ,कि देखने वाले धन्य धन्य हो उठते हैं । इसे देखने के लिए देश विदेशों से श्रद्धालुओं की भीड़ लग जाती है ।
इसके अलावा रामनवमी ,जानकी नवमी ,झूला ,फागुनी पूर्णिमा भी धूम धाम से मनाया जाता है ।
यह नेपाल का एक साफ सुथरा अच्छा शहर है ।यहाँ आने के लिए रेल मार्ग ,वायु मार्ग बस ,गाड़ी आदि की पर्याप्त सुविधा है ।धर्म शाला ,गेस्ट हाउस आदिकी व्यवस्था है ।
लोग मैथिली ,हिन्दी ,बोल रहे थे ।भारतीय रुपए आराम से काम कर रहा था । ढेर सारे दुकान हैं ,विदेशी समान भी बिकता है ,मगर अधिकांश समान भारत से ही जाता है । विकास के नाम पर एक सिगरेट फैक्ट्री है ,जिसे लोग चुरोट फैक्ट्री भी कहते है ,यहाँ करीब 1800 सौ लोग काम करते हैं । सड़क अच्छी है ,गाड़ी मोटर की आवाजाही कम है ।लोग सीधे सादे है । चारों ओर का माहौल एकदम धार्मिक है ।
खराब रास्ते को याद कर हम सूरज के रहते ही वहाँ से निकल कर भारतीय सीमा में प्रवेश कर चुके थे । मन प्राण पर धनुर्धारी राम का पौरुष और जगत जननी सीता का बाल्य और किशोर अवस्था के साथ अभूतपूर्व विवाह की मनोहर कहानियाँ अनुगुंजित हो रही थी ।लाखों वर्ष पहले हुए थे वे ,मगर धरती के उस पृष्ट भूमि पर वे मानो अद्यतन मौजूद हैं । यह भी सत्य है कि विवाह के बाद एक बार भी लौट कर सीता अपने मायके नहीं आई , और उन्हें जीवन भर असीम कष्ट मिला ,इसी को गांठ बांधकर लोग अपनी बेटी का जनम कुंडली नहीं बनाते और इस माह में बेटी की शादी भी नहीं करते , मगर लोग उस महाशक्ति बेटी को आज भी अपने हृदय में बसाए हुए हैं । मिथिला को अपनी इस अपर शक्तिशालिनी कन्या पर हमेशा नाज़ रहेगा ।

 

 


कामिनी कामायनी ॥

 

 

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