काव्य में रचनाकार द्वारा स्वयं का नाम देने का आग्रह

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 

काव्य में स्वयं का नाम देने की परम्परा बहुत पुरानी हैं। यह आग्रह या मोह हमें संस्कृत साहित्य में भी मिलता है। उपनिषदो में यह आग्रह आवश्यक रूप से आया है ऋचाओं के पूर्व में या पश्चात यह आग्रह बिखरा हुआ पड़ा। महर्षि व्यास ने तो महाभारत में इसका खुलकर उपयोग किया है। महाभारत में वह स्वयं को एक मंत्रदृष्टा ऋषि के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं और स्थान स्थान पर युधिष्ठिर को उपदेश देते हुये या सूत्रधार के रूप में दिखते हैं। गीता में तो दसवें अध्याय में स्वयं को कृष्ण के समकक्ष रखते हैं यथा
वृष्णीना वासुदेवोडस्मि पाण्डवानां धनन्जय:।
मुनीनाव्यहं व्यासः पाण्डवानां कबीनामुशना कवि:।।
गीता के दसवें अध्यास के सैतीसवें श्लोक में वे कहते है कि वृष्णियों में मैं वासुदेव (अर्थात कृष्ण) हँू पाण्डवो में धनन्जय (अर्थात अर्जुन) हँू, मुनियों में व्यास और कवियों में उशना (अर्थात शुक्राचार्य) हँू।
वे भगवान की विभूतियों में हाथी घोड़े पीपल नागों इत्यादि तक को बतलाते है पर महर्षि वाल्मीकि को भूल जाते हैं। हिन्दी साहित्य के र्भिक्तकाल में यह आग्रह कविवर रहीम, कबीर, तुलसी, सूरदास, मीराबाई आदि में बिखरा हुआ पड़ा है। उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है पर प्रतिनिधि रूप में कुछ रचनायें प्रस्तुत की जा रही हैं।
(1) कबिरा सोई पीर है जो जाने पर पीर
जो पर पीर न जानहि सो काफिर वे पीर।।
(2) रहिमन वे नर मर चुके जो कहुँ मांगन जांहि।
उनसे पहले वे मुये जिन मुख निकषत नाहि।।
(3) स्वान्तः सुखास तुलसी रघुनाथ
माथा, भाषा निबन्ध मति मन्जुल मा तनोति।।
(4) सूरदास तब बिहंसि जसोदा ने उर कंठ लगायो।
(5) दासी मीरा लाल गिरधर तारियों अब मोहि।
उर्दू गजलें तो बिना तखल्लुस के अपूर्ण मानी जाती है जैसे
यूं तो हैं दुनिया में सुखनवर कई अच्छे
कहते हैं कि गालिब का है अन्दाजे बयां और।।
चाहे मीर हो या गालिब हो वे यह मोह नहीं छोड़ पाते हो गालिब ने कुछ रचनाओं में यह परम्परा तोड़ी है। वे इस मायने में क्रांतिकारी प्रतीत होते हैं। आज से चार सौ साल पूर्व परम्परा तोड़ने की यह हिम्मत एक क्रांति ही मानी जायेगी उनकी गजलें दरबार से निकल कर सड़क पर आ जाती हैं। गजल के उन्होने पूरे मायने ही बदल दिये हैं। जहां गजल का मतलब प्रेमी और प्रेमिका की वार्तालाप होता हैं वहाँ गालिब की गजलें क्रांति का परचम लिये दिखती हैं।
हिन्दी काव्य में इस आग्रह को पूरी तरह नकार दिया गया हैं। जय शंकर प्रसाद हो या सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला हों (हिन्दी के पहले गजलकार) या महादेवी वर्मा हो या आधुनक कवि हों वे रचनाओं में स्वयं को नहीं जड़ते। यहां तक कि हिन्दी गजलों में यह परंपरा टूट जाती है। गजल नाम का काव्य हिन्दी व्याकरण या हिन्दी साहित्य पुस्तक में देखने नहीं मिलता पर उसका प्रयोग दुष्यन्त कुमार ने इस तरह प्रतिष्ठित किया कि वह एक काव्य धारा ही बन गई। आज हिन्दी साहित्य में गजल इतनी लिखी जा रही है जितने की शेष अन्य छन्द। इस का कारण है कि इस विद्या में चमत्कारिक तत्व होना एक तरह से आवश्यक हो गया है। इस विधा में आवश्यक नहीं कि दूसरा छन्द पहले पर परतंत्र हो, सभी छंद एक दूसरे से स्वतंत्र रह सकते हैं। मात्र दो पंक्तियों में दोहों की तरह एक पुस्तक के भाव आ सकते हैं।
छंदो या काव्य में स्वयं का नाम देना एक तरह से कवि का “ब्रान्ड” बन गया था। कहीं कहीं मात्रायें पूर्ण करने के लिये भी नाम का प्रयोग किया जाता है। फिर भक्तिकाल में गुरू शिष्य परम्परा या घराने हुआ करते थे। अतः रचनाकारों के शिष्यों को पहचानने में भी सरलता होती थी। यह परम्परा जहां संस्कृत में छिपी हुई मिलती है वहीं भक्तिकालनी रचनाओं में स्पष्ट रूप से उभर कर आई है और गजलों में शिद्दत के साथ उभर कर आई है।
इंग्लिश साहित्य एवं काव्य में यह परम्परा नहीं मिलतीं है चाहे वह शैले हो, शेक्शपियर हो कोट्स हो वर्डसवर्स हो बारबरा ओनील हो किसी ने उनके काव्यों में स्वयं के नाम का ठप्पा नहीं लगाया है।

 

 

 

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