कन्या भ्रूण हत्या एवं घटता लिंगानुपात

 

 

 

मानव सृष्टि की सर्वोत्तम कृति है तथा मानवीय हितों से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक अवधारणा मानवीय मूल्यों की परिधि में ही समाविष्ट है। लेकिन अब प्रश्न उठता है कि जब मानव सृष्टि में उत्कृष्ट है तो फिर उसमें भेद, असमानता की व्याप्तता क्यों पनपी? इसी भेद एवं असमानता ने मनुष्य-मनुष्य के बीच खाई पैदा की और अब सिलसिला शुरू होता है ऊँच-नीच, वर्ग, समुदाय, जाति, लिंग, क्षेत्रीयता, भाषायी आदि भिन्नताओं का। चूंकि यह विषय मानवता से जुड़ा एवं सामाजिक विज्ञानों में चिन्तन का विषय है और समाज से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक वैज्ञानिक एवं चिन्तक है अतः प्रत्येक सामाजिक प्राणी को मानवीय जीवन से जुड़े इस संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण विषय पर चिन्तन करने की आवश्यकता है। सभी चिन्तक, विद्वान, पुरोधा, राजनीतिज्ञ, प्रशासक, समाज सेवक एवं गैर सरकारी संगठन सैद्धान्तिक तौर पर महिला एवं पुरुष को समाजरूपी रथ के दो पहियों की संज्ञा देते हैं तथा समाज की उन्नति के लिए दोनों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए एक-दूसरे के पूरक समझते हैं परन्तु वास्तविकता से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है कि आज भी पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता प्रत्येक स्तर एवं स्थान पर देखी जा सकती है और महिलाओं के साथ आज भी दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है।

 

 

देश में सकल लिंगानुपात की बात की जाये तो यह वर्ष 2001 में 933 था जो 2011 की जनगणना में 940 हो गया है परन्तु भविष्य की ओर जो संकेत प्राप्त हो रहे हैं वे नकारात्मक हैं। भारत में 0-6 आयु वर्ग में लिंगानुपात 2001 में 927 था जो 2011 में घटकर 914 रह गया है। राजस्थान के संदर्भ में बात की जाये तो सकल लिंगानुपात 2001 में 921 था जो 2011 में बढ़कर 926 हो गया है परन्तु 0-6 आयु वर्ग में 2001 में 909 की तुलना में 2011 में 883 रह गया है। राजस्थान में वर्ष 2011 की जनगणना में सर्वाधिक लिंगानुपात डूंगरपुर जिले में 990 है जो कि वर्ष 2001 में 1022 था, राजसमंद 988 है जहाँ 1000 था, वहीं न्यूनतम लिंगानुपात धौलपुर जिले में 845 है। इसी प्रकार 0-6 आयु वर्ग में सर्वाधिक लिंगानुपात प्रतापगढ़ जिले में 926 है जबकि झुंझुनू में न्यूनतम 831 है। अब प्रश्न उठता है कि राज्य में लिंगानुपात कम क्यों हो रहा है? देश में केरल में ही सर्वाधिक लड़कियाँ क्यों पैदा हो रही हैं तथा हरियाणा में लड़कियाँ पैदा कम क्यों हो रही हैं? अथवा राजस्थान में डूंगरपुर में ही लड़कियाँ सर्वाधिक क्यों पैदा हो रही हैं, धौलुपर में क्यों नहीं?

 


मानव ही मानव का दुश्मन क्यों बनता जा रहा है? एक ओर हम विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी की दिशा में निरन्तर प्रगति करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इस सूचना एवं प्रौद्योगिकी के युग में तकनीकी का नकारात्मक दिशा में प्रयोग कर स्वयं अपनी जड़ें काट रहे हैं। अंग्रेजी में कथन है ष्ैबपमदबम पे ं हववक ेमतअंदज इनज ं इंक उंेजमतष् अर्थात् विज्ञान एक अच्छा सेवक है परन्तु एक घातक मालिक। विज्ञान के इसी तकनीकी विकास ने लिंगभेद की खाई को और बढ़ाया है तथा प्राकृतिक संतुलन को भी बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अल्ट्रासाउण्ड मशीन हो या इसी प्रकार के अन्य उपकरण यदि विज्ञान के इन उपकरणों का गलत दिशा में उपयोग करते रहे तो लड़कियाँ पैदा होना ही बन्द हो जायेंगी। यह प्रश्न देश की लिंगानुपात के संदर्भ में बात करते हैं तो हरियाणा पर लागू होती है क्योंकि वहाँ सर्वाधिक अवैध तरीके से लिंग परीक्षण होता है और भ्रूण के स्त्रीलिंग होने पर गर्भपात, कन्या भू्रण हत्या, जन्म के बाद भी हत्या कर दी जाती है क्योंकि हरियाणा में आज भी लड़कियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है जिसका जीता जागता उदाहरण प्रेम विवाह जैसी घटनाओं पर खाप पंचायतों द्वारा तुगलकी फरमान जारी कर लड़कियों के सिर कलक कर दिये जाते हैं अथवा काला मुँह करके नग्न अवस्था में गधे पर बैठाकर सार्वजनिक रूप से उनकी इज्जत को तार-तार कर दिये जाने की घटनाऐं आज भी देखने को मिलती हैं। हालांकि हरियाणा में न्यूनतम लिंगानुपात होने के दुष्परिणाम उनके सामने हैं और शादी-विवाह नहीं हो पाने के कारण दूसरे राज्यों से लड़कियों एवं औरतों को खरीद कर गृहस्थ जीवन जीने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

 

 


समाज में आज भी धारणा बलवती है कि सामाजिक सुरक्षा एवं वंश नाम तथा सम्पत्ति के वारिश के लिए लड़का होना आवश्यक है। लड़का या लड़की का निर्धारण तो गुणसूत्रों के मिलन का परिणाम है परन्तु 90 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या में रूढ़िवादिता, धार्मिक मान्यताएं, देवी-देवताओं की इच्छा, टोटके, विभिन्न प्रकार की दवाइयों को लिंग का निर्धारक तत्व मानते हैं। बड़े-बड़े बाबाओं, भोपाओं, श्याणें, घुड्ल्या, पुजारी अपनी निराधार धारणाओं से लोगों को गुमराह एवं गलत आश्वासन देते हैं। देश के कई समाजों में लड़की के जन्म को ही अपशगुन माना जाता है और या तो उन्हें पैदा ही नहीं होने दिया जाता या पैदा हो भी जाती हैं तो जिन्दा या मारकर गाढ़ दिया जाता है। कन्या भू्रण हत्या के लिए कोई यह तर्क दे कि अशिक्षा के कारण ये सब हो रहा है तो यह कतई मान्य नहीं होगा। इसके लिए न केवल शिक्षित बल्कि उच्च शिक्षित एवं व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त लोग अधिक जिम्मेदार हैं क्योंकि अशिक्षित या कम शिक्षित तो संतानोत्पत्ति को भगवान की कृपा मानते हैं परन्तु उच्च शिक्षित एवं व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त अधिक बच्चे पैदा नहीं करना चाहते और वे सब कुछ जानते हुए लिंग परीक्षण करवाते हैं और भ्रूण हत्या में भी नहीं सकुचाते हैं।

 


दूसरी बात आज यह वैधानिक प्रावधान कर दिया गया है कि किसी भी संस्था या स्तर का चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक संतान नहीं होनी चाहिए। ऐसे में लोग लिंग परीक्षण करवाते हैं और यदि गर्भ में कन्या भ्रूण होता है तो वे भू्रण हत्या में पीछे नहीं हटते हैं क्योंकि वे हर हाल में वारिश चाहते हैं जो कि लड़का ही होना चाहिए ऐसी उनकी मान्यताएँ हैं और साथ ही अधिक बच्चे पैदा कर वे चुनाव के लिए अयोग्य भी नहीं होना चाहते हैं। तीसरी बात सरकारी कर्मचारियों के लिए भी यह अनिवार्य कर दिया गया है कि जिन कर्मचारियों की दो से अधिक संतानें होंगी तो उनकी वार्षिक वृद्धि एवं पदोन्नति रोक दी जायेगी। ऐसे कर्मचारी गर्भस्थ भू्रण की जांच करवाते हैं और कन्या भू्रण होने पर गर्भपात करवा लेते हैं। आजकल तो सरकारी भर्ती में भी दो से अधिक संतान अयोग्यता है इसलिए युवा वर्ग भी लिंग परीक्षण करवा कर कन्या भू्रण होने पर उसे जन्म ही नहीं लेने देते हैं।

 


राजस्थान के जैसलमेर जिले में कन्या भ्रूण हत्या की घटनाऐं सबको चैंका देने वाली हैं, वहाँ के एक गांव में 0-6 आयु वर्ग के लड़कों की संख्या तो सैकड़ों में परन्तु लड़कियाँ केवल 3 बची हैं। हाल ही के दिनों में एक खबर ने सभी को सोचने को मजबूर कर दिया जिसमें एक डाॅक्टर द्वारा अवैध लिंग परीक्षण किया जाता था और कन्या भ्रूण होने पर गर्भपात करवाने पर उस भ्रूण को अपने कुत्तों को खिलाने का मामला सामने आया जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया। जिनको हम जीवन रक्षक समझते हैं क्या वे ही ऐसे कुकृत्य कर मानवता के लिए कलंक नहीं हैं?

 


अब हम बात करते हैं कि क्या इनकी रोकथाम के लिए कोई कानून उपलब्ध नहीं हैं? जिसके जवाब में उत्तर है कानून तो ढेर सारे हैं परन्तु पहली बात कानून कोई जादू की छड़ी नहीं है और दूसरी बात क्या हर बात के लिए कानून आवश्यक है? क्या हम सबकी कोई जिम्मेदारी नहीं है? शायद इन प्रश्नों का उत्तर हम खोजें तो समस्याएँ अपने आप हल हो जायेंगी। भारतीय संविधान में कानूनों की भरमार है परन्तु उनकी पालना अथवा क्रियान्विति उस रूप में नहीं हो पाती है जिस रूप में उनका निर्माण होता है। फिर यदि उसकी क्रियान्विति करने की कोशिश भी की जाती है तो कई प्रकार के दबाव, नकारात्मक हस्तक्षेप, घूंस आदि तैयार रहती हैं। समाज में जो नकारात्मक अवधारणाऐं बनी हुई हैं जिनमें लड़के के जन्म को पुत्र रत्न कहा गया है, उसे घर का चिराग, दीपक, वारिश, मालिक कहा गया है और उसके जन्म पर पार्टी या विशेष समारोह का आयोजन किया जाता है, वहीं लड़की के जन्म को धिक्कार के रूप में लेते हैं, वे आज तो यथार्थ नहीं होनी चाहिए क्योंकि यदि हम इन्दिरा गांधी को ले तो वे जवाहर लाल नेहरू की इकलौती बेटी थी, क्या आज नेहरू जी का वंश नहीं चल रहा, क्या उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान नहीं बनाई? आज छोटे से लेकर बड़े-बड़े ओहदों पर महिलाऐं आसीन हुई हैं और सफलता का परचम पहनाकर एक नई इबारत लिखी है। इसलिए कन्या बचाओ, आगे बढ़ाओ और खूब पढ़ाओ तभी विकास का बिगुल बजेगा।

 

 

 

Dr. Janak Singh Meena

 

 

 

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