कर्तव्य या अधिकारः सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक परिपेक्ष्य

 

 

 

डाo अमित त्रिपाठी
वैज्ञानिक/अभियंता- एससी
अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, इसरो, अहमदाबाद

 

 

 

मित्रों ! प्रायः यह पाया जाता है कि एक व्यक्ति के रूप में हमें अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों (घर-परिवार वाले, सहकर्मचारी आदि) से कई सारी अपेक्षायें एवं शिकायतें रहती हैं | हम सोचते हैं कि अमुक व्यक्ति को अमुक-अमुक कार्य करने चाहिये और अमुक तरीके से करने चाहिये । हमारे दैनिक जीवन की यह शिकायतें हमारे अन्दर असन्तुष्टि व कुण्ठा पैदा करती हैं । हमारी यह कुण्ठा हमें संगठनों व उनकी व्यवस्थाओं (घरेलू, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय व वैश्विक आदि) की प्रासंगिकता, उनके अस्तित्व और उनके प्रति निष्ठा के बारे में सोचने पर विवश करती है । परन्तु अपनी व्यक्तिगत व सामाजिक निर्भरता के कारण इन व्यवस्थाओं व संगठनों को हम न तो पूरी तरह नकार पाते हैं और न ही स्वीकार ।
हमारी इस संशयात्मक मनोदशा का लाभ उठाकर कुछ व्यक्ति अथवा संगठन हमारे अधिकारों के हिमायती बनकर, हमें व्यवस्थाओं से द्रोह के लिये उकसाते रहते हैं । प्रथमदृष्टया ऐसे व्यक्ति अथवा संगठन हमें अपने हितैषी मालूम होते हैं किन्तु हम भूल जाते हैं कि सूक्ष्म आणविक कणों से लेकर बड़े-बड़े ग्रह आदि तक कुछ नियमों के अनुरूप एक निर्धारित ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के अन्तर्गत गतिशील हैं | सूक्ष्म से लेकर विराट तक सभी के लिए सह-अस्तित्व मूलक व्यवस्थाओं के अन्तर्गत गतिशील रहना अनिवार्य है । हर व्यवस्था में कुछ गुण व दोष होते ही हैं परन्तु बिना किसी व्यवस्था के अराजकता फैलती है । सह-अस्तित्व मूलक ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के नियम न केवल व्यवस्था के सुचारू नियमन को सुनिश्चित करते हैं अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व इसकी प्रत्येक इकाई के एक निश्चित दिशा में प्रसार व विकास को भी सुनिश्चित करते हैं |
नई व्यवस्थाओं का निर्माण तभी किया जाना चाहिये, जब पुरानी को सुधारने का विकल्प शेष न हो और पुरानी व्यवस्था को तभी प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जब नई व्यवस्था का भली प्रकार परीक्षण कर लिया गया हो । हमें यह याद रखना चाहिये कि ‘जो सुधार कर सकते हैं, वे शिकायतें नहीं रखते और जो सुधार नहीं कर सकते, उन्हें शिकायतें रखने का अधिकार नहीं’ ।
जो नई व्यवस्था देना चाहते हों उन्हें इसका कारण, इसकी प्रासंगिकता व इसके नियमों का निर्धारण करने से पहले पुरानी व्यवस्था में स्वयं के अस्तित्व, स्वयं की प्रासंगिकता, स्वयं के सम्पादित व गैर-सम्पादित कर्तव्यों का भली प्रकार विश्लेषण कर लेना चाहिये । जिसने व्यक्ति के रूप में स्वयं के कर्तव्यों को ठीक प्रकार से नहीं समझा, वह संगठनों का निर्माण व संचालन करने का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता । कर्तव्यों को करने से अधिकार मिलते हैं । किसी भी व्यवस्था में जो एक का कर्तव्य है वही दूसरे का अधिकार है ।
विडम्बना यह है कि बहुत कम व्यक्ति या संगठन ही ऐसे हैं जोकि हमें हमारे कर्तव्यों के बारे में जागरूक करते हों, शेष सभी तो हमें हमारे अधिकारों के नाम पर व्यवस्थाओं को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिये उकसाते रहते हैं । अन्ततः ऐसे व्यक्ति या संगठन कानूनों का एक मकड़जाल तैयार करवाने की कोशिश करते हैं । वे भूल जाते हैं कि जीवन की स्वतंत्रता सबके हित के लिये उठी अन्तःप्रेरणा से कार्य करने में है, डण्डों/कानूनों द्वारा नियमों का पालन करवाने में नहीं । कानूनों के मकड़जाल में दम घुटने पर यही व्यक्ति/संगठन फिर से इन्हें खत्म करवाने के लिये आन्दोलन करने लगते हैं ।
कर्तव्यों का पालन हमें एक इकाई के रूप में संगठनों व व्यवस्थाओं में रहने का अधिकार देता है जबकि कर्तव्यों को किये बिना अधिकारों की माँग एक ओर अनुचित है वहीं दूसरी ओर संगठनों को नष्ट करने का काम भी करती है । परस्पर कर्तव्यों को करने से मैत्री-प्रेम बढ़ता है जबकि परस्पर अधिकारों को माँगने से कटुता बढ़ती है । कर्तव्यों का पालन सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को निजी मैत्री सम्बन्धों से लेकर विश्व-बन्धुत्व के रूप में परिलक्षित करता है ।
बन्धुत्व कर्तव्यों के पालन का सामाजिक परिणाम है । परस्पर कर्तव्यों को करने से संगठन मजबूत होते हैं व बाहरी संगठनों पर आर्थिक-सामाजिक व राजनैतिक निर्भरता कम होती जाती है । वहीं दूसरी ओर बिना कर्तव्यों को किये परस्पर अधिकारों की माँग करने से हमारे संगठन (घर/परिवार/समाज/राष्ट्र/विश्व) आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक रूप से बिखरते चले जाते हैं और उनकी मौलिक इकाई होने के कारण हम सभी आर्थिक, भावनात्मक, सामाजिक व राजनैतिक रूप से कमजोर व परावलम्बी होते चले जाते हैं ।
हमें यह याद रखना चाहिये कि मौलिक इकाई होने के कारण, हम हमारे संगठनों के अभिन्न अंग-अवयव हैं । हमारी कमजोरी/मजबूती संगठनों की कमजोरी/मजबूती है और संगठनों की कमजोरी/मजबूती हमारी स्वयं की कमजोरी/मजबूती है । महापुरूषों के जीवन से यह निष्कर्ष निकलता है कि जो कर्तव्यों व सुधार कार्य करने में व्यस्त हैं उनके पास अधिकारों को माँगने की समस्या नहीं आती और यदि आती भी है तो उन्होंने ऐसा समझा कि व्यक्ति विशेष के अधिकारों के बलिदान से यदि संगठन सुरक्षित रहता है तो यही सबके लिये हितकारी है ।
हमें यह समझना चाहिए कि मनुष्य को ‘चुनाव’ करने की जो स्वतंत्रता मिली हुयी है , वह एक शाश्वत व्यवस्था के अन्तर्गत निर्धारित कर्तव्य कर्मों को निर्धारित विधियों से करने के लिए है | स्वैच्छिक व अराजक व्यवहार केवल पीड़ा और पतन ही पैदा कर सकता है |

 

 

 

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