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खतो खितावत का वह दौर

 

 

खतो खितावत का वह दौर जिसमेँ कोरे कागज पर मात्र सलाम लिख देने भर से वो जान जाते थे ,कि यह पहचान किसकी है .और शमॉ मेँ कई दिनोँ तक उनकी महक बिखरी रहती थी ,अब शायद ही उसी शिद्दत से वापस लौट के आए ,मगर राजनीतिक गलियारोँ मेँ जब इसका इस्तेमाल होता है तब उसके खूनी छीँटे चारो तरफ बडे ही विभत्स नजारे पेश करते हैँ ,वैसे जो पत्र महबूब के लिए ,अज़ीज़ के लिए लिखे जाते हैँ उनमेँ बिखरे खून भी जख्मे दिल को सूकुन देती है ,खैर ,मेरा मकसद तो इतिहास से कुछ बतियाने का है .
पत्र लेखन तो अप्ने ह्रिदय की भावनाओ को व्यक्त करने की एक मनोहारिणी कला थी जिसे याद कर् के आज के चिंतक ,कला मर्मग्य ,लेखक ,कवि ,आदि टेलिफोन को अपराधी मानते हुए ,उस भव्य अतीत के खंडहर को देख कर जार जार आँसू बहाते हुए कहते हैँ कि पत्र लेखन की परमपरा द्रुतगति से लुप्त हो रही है और वह दिन दूर नहीँ जब लोग लिखना हीँ भूल जाएँ .
इतिहास के झरोखोँ से झाँके तो वे भी क्या स्वर्णिम काल थे पत्र लेखन के ,क्या भव्य ,बुलंद महल था उसका भी ,,क्या रोब ,क्या ठाठ ,चारोँ तरफ लेखक और लेखनीकी अमूर्त्य भावनाए न्रित्य करती रहती थी.
नील नदी की घाटी सभ्यता से निकली कागज और स्याही के आविश्कार ने मनुश्योँ को अपनी भावनाओँ को व्यक्त करने की एक नई दिशा दी .
भारतीय राजतंत्र के भग्नावशेशोँ को ,राजा महाराजाओँ के ,सरकर के म्युजियमोँ को ,उनके पुस्तकालयोँ को खंगालने पर शोधकोँ को विभिन्न प्रकार के पत्र हस्त गत होते हैँ जिससे बहुत सी गूढ रहस्योँ की जानकारी मिलती है. इससे अन्य बातोँ के साथ साथ तत्कालिन इतिहास ,राजनीति ,भूगोल ,अर्थ शास्त्र आदि का भी पता चलता है .
रा जाओँ के अधिकतर पत्र युदध के संदेश वाहक हुआ करते,अथवा शांति के पैगाम का . तपती ,झुलसती गरमी ,मूसलाधार बारीश , भयँकर तूफान ,या रात के सन्नाटे मेँ कच्ची सड्कोँ के दोनो ओर की पहाडिओँ के मध्य ,रुक रुक कर या सर पट दौडता हुआ घुड्सवार ,जिनके हाथोँ मेँ शासनाध्य्क्षोँ के गोपनीय पत्र लेकर रात दिन दौडा करतेथे .उनमे से कुछ पत्रोँ ने इतिहास मेँ हँगामा कर दिया था .
मगर पत्रो के इतिहास मेँ सबसे ज्यादा ख्याति एवम अमरत्व पेम पत्रो को ही मिली . बाद्शाहोँ के शासन काल मेँ कसीदाकारोँ {उन कविओँ को ,जो उनके आश्र्य मे रहते थे और जन्म्गॉठ ,विजयोत्सव ,नवाबोँ की प्रशंसा,इश्क हक़ीकी ,} आदि पर जितना अच्छा लिखते उन्हेँ उतनी प्रतिश्ठा मिलती .उर्दू और सल्तनत काल दोनो ने मिलकर ह्र्दय की भावनाओँ जैसे शोले भर दिए . राजदरवारोँ मेँ शेरोँ शायरी के साथ साथ शायरोँ को ज़न्नत की खुशी बख्शी जाती थी .पत्रोँ की उदारता ,लोकप्रियता और व्यापकता को मद्देनज़र रखते हुए शायरोँने एक से एक लाजवाब शेर लिखे जिनमेँ कुछ चुनिंदे नमूने प्रस्तुत करने से इसकी खूबसूरती मेँ चार चांद लग जाते हैँ ,तो पेशे खिदमत हैँ कुछ नमूने ,
अज्ञात: बरसोँ से कान मेँ है कलम इस उम्मीद पर ,
लिखवाएँ मुझसे खत मेरे खत के जवाब मेँ .
मोमिन : लिक्खो सलाम गैर के खत मेँ गरीब को ,
बंदे का बस सलाम है ऐसे सलाम को .
बेखुद देहलवी : दोस्त के धोखे मेँ उसने दे दिया दुशमन
को खत,
नामावर ऐसा मेरा ऑखोँ का अंधा हो गया
अज्ञात: दिल चाहता है अपना की कासिद , बजाय मुहर ,
आंखे अपनी हो लिफ़ाफए मे लगी हुई ,
नामे को पढ़ना जरा देख भाल कर ,
कागज पे रख दिया है कलेजा निकाल कर ।
दाग दहलवी – तुम्हारे खत मे एक नया सलाम किसका था ,न था रकीब तो आखिर वो नाम किसका था ।

आदि आदि ।
प्रेम पत्रों का इतना ज्यादा प्रचलन बहुत बाद मे हुआ होगा, खास कर सावाक चलचित्रों के प्रसार के बाद प्रेम पत्र लेखन की परीपाटी प्रगाढ़ हुई होगी ।
एक जमाने मे फिल्मों के नायक और नायिका पूरा पूरा गीत खातो मेम लिखकर ही गा लिया करते । बेचारा शांति का पैगंबर कबूतर ,इसने भी पत्र वाहक की भूमिका बड़ी खूबी निभाई है । ऐतिहासिक फिल्मों मे मशहूर प्रेमी प्रेमिकाओ के रंग बिरंगे खतों को कबूतरों के माध्यम से एक दूसरे के पास पहुचाते हुए दिखाया जाता । कभी कभी नायिका इतनी भोली और निरक्षर होती कि उसे अपने दिल का हाल दिलबर तक पहुचाने के लिए किसी पढे लिखे ,होशियार ,विश्वास पात्र व्यक्ति की तलाश होती थी ।
फिल्मों मे खतों पर ढेर सारे गाने लिखे गए ,मगर जो प्रसिद्धि ‘ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर ,कि तुम नाराज ना’को मिली ,शायद ही किसी और गीत को मिली होगी ।
एक ऐसा भी दौर आया था जब एक से बढ़कर एक सुंदर लैटर पैड बाजारों मे बिकने लगे ,जिसपर लिखे शब्दों को इत्रों के फुहारों से सुवासित किया जाता था ,फिर उसमें गुलाबों की कुछ पंखुड़िया डालकर लिफाफे को प्रियतम तक भेजने वाले आनंद से गा उठते थे “ फूल तुझे भेजा है खत मे ,फूल नाही मेरा दिल है’ ।
इधर मोहब्बत का इजहार करने के जीतने भी तरीके ईजाद किए जाते ,,,उससे ज्यादा उन गुप्त प्रेम पत्रों का भंडा फोड़ने के उपाय सोचे जाते । रंगीन ,सबसे जुदा ,निराले लिफाफा को देखकर दूर से ही सूंघने वालों की निगाहें थम जाती ,और भृकुटी छाते की कमानी की तरह ऊपर उठ जाती , कुछ सयाने ,कुछ शातिर किस्म के लोग लिफाफ़ा देखकर डायलॉग भी बोलने लगते । इस छींटा कसी से ,रुसवाई से ,बेबसी से बचने .के लिए पत्र लेखकों ने फिर से सादगी का रास्ता अख़्तियार किया ,सदा अंतर्देशीय या लिफाफा सामान्य सा । मगर कुछ मंथरा या हंटर वाली टाईप की सौतेली माताए,,बहने, भाभिया ,कुमारी कन्याओ पर बेहद सख्त नजर रखती और उनके नाम आए सखी सहेलिओ के पत्रो को इसअदा और फुलप्रूफ तरीके से चिपका देती की पोस्ट मास्टर क्या बड़े बड़े जासूस भी पकड़ न पाए की चिट्ठी पढ़कर चिपकाई हुई है ।
ऐसे भी नायाब लोग हुए हैजिन्हें पाठशाला मे पत्र लेखन मे भले ही शून्य नंबर आए ,मगर आशिक़ी के खतों मे सौ मे सौ नंबर आए । वह भावुकता भरे ,दर्द से ओतप्रोत ,जो किसी कालिदास का कोई यक्ष ही अपनी यक्षणी के विरह मेंलिख सकता था , और एक पत्र के पाते ही प्रेमी घायल शेर जैसा व्याकुल हो जाता ।पता नहीं कैसे ,बिना किसी ट्रेनिंग के लोगों को प्रेम पत्र लिखना कैसे आ जाता होगा । यह भी ललित कला ही था । इसके लिए अक्षर ज्ञान ही काफी मानी जाती है । कोई कौलेज या विश्वविद्यालय इसके लिए डिग्री या डिप्लोमा नही निर्धारित करता था ।
पहले एक पत्र को लोग बार बार पढ़ते ,जबतक एक एक शब्द जेहन मे न उतर जाए ,कभी कभी पत्र पढ़ते पढ़ते आंखो से टपकते अश्कों से कागज पर लिखे शब्द धुंधले पड़ जाते थे मगर उनकी बात ही कुछ और थी । सिरहाने के नीचे छुपा कर रखी गई चिठ्ठिया भी कमाल का इज्जत हासिल रखती थी ।

पत्र लेखन ने कितनों को रुसवा कर के ,बदनामी के कलंक मे डुबो दिया , कितनों की जिंदगी बियावान कर दी , कितनों को ताउम्र मुंह छुपा कर जार जार रोने के लिए विवश किया इसका कोई लेखा जोखा अभी तक प्रस्तुत नहीं किया गया ।
पत्र के साथ उसक इंतजार भी बेहद रोमांचकारी हुआ करता था । प्रोषित पतिकाए,नव विवाहित ,प्रेमी ,माताए ,पिता ,दादा ,,जिस व्याकुलता से डाकिए का इंतजार करते थे वे भी एक अजब दास्तान हुआ करती थी ।क्या बेकरारी ,, आंखों के साथ दिल भी दरवाजे पर ही टंगा रहता था ।गली मुहल्ले या गौवके टोले मे कही भी डाकिया दिख जाता ,हसरत भारी निगाहें उसका ऐसा पीछा करती मानो उसकि थैली मे सबकी मनोरथ पूरा करने कि जादुई चिराग हो । कई लोग तो दिन मे कई कई दफ़े डकीया से अपने चिट्ठी के बाबत पूछ लिया कराते ,डाकिए की पूरकश खातिरदारी भी की जाती ,ताकि वह उनके पत्र समय से पहुचा दिया करे ।
यहां यह भी बताना जरूरी लगता है कि हमारे प्यारे जवाहर लाल नेहरू को पत्र लेखन के इतिहास मे एक गौरव पूर्ण स्थान है । नैनी जेल और विभिन्न जेलो से लिखा गया उनका “पिता का पत्र पुत्री के नाम” काफी लोकप्रिय रहा है ,वैसे उनका एडविन के नाम लिखा प्रेम पत्र भी काफी चर्चा मे रहा । विदेशो मे तो महान हस्तियो के प्रेम पत्रों कि नीलामी भी होती रही है । हाल मे नेपोलियन के प्रेम पत्र की नीलामी हुई ।उसके पात्रो से पता चलता है कि तानाशाह भी इंसानो की तरह टूट कर प्यार करते है । उनमे भी मानवीय भावनाओ का उद्रेक होता है । नेपोलियन और उसकी पहली जोसेफिन के बीच सच्चा प्यार था ।नेपोलियन जब युद्ध क्षेत्र मे चला गया तब वहा से लंबे लंबे प्रेम पत्र भेजता था ,जीनामे से कुछ अब भी उपलब्ध है । बीच बीच मे सामनी दंपत्ति की भांति उनमे मनमुटाव होता था ,झगड़े तक होते थे ,और कई कई दिन तक वे एक दूसरे से बोलते तक नही थे ,वे अकेले मे रोते भी थे और उनमे समझौता भी हो जाता था ।
हिटलर के पत्र भी ईवा ब्राउन के प्रति उसके असीम प्रेम की गवाही देता है। आइन्टीन के पात्रो से महान वैज्ञानिक का एक अजीब सा सनकीपन लोगों के सामने आया ।साथी वैज्ञानिक मिलेवा से सुखद चल रही शादी शुदा जिंदगी और प्यार के प्रतीक दो बच्चो के वावजूद उसे तलाक देकर अपनी चचेरी बहन इलसा से ब्याह करना पत्र ने उजागर कर दिया ।एक पत्र मे उनका एगारह वर्ष का पुत्र ने लिखा की अगर आप माँ के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कराते तो मै भी आप के साथ छुट्टी मनना नहीं चाहता । एक अन्य पत्र के मोतबिक आइंस्टीन ने नोबल पुरस्कार मे मिली राशि को वौल स्ट्रीट के खराब बांड मे निवेश कर उसका सर्व नाश कर दिया । पत्र जिंदगी भर के गुप्त कार्य को जगजाहिर भी कर देता है।
यह भी काफी रोचक है कि सौ साल से ज्यादा का हो गया दुनिया का पहला एयर मेल । 18 फरवरी 1911 को इस पहली फ्लाइट से भेजे गए पत्रों की आय को बेंलुरु के ट्रिनिटी चर्च के एक हास्टल निर्माण के लिए दान मे दे दिया गया ।राइट बंधु के द्वारा पहली पावर फ्लाइट की कामयाबी के महज सात वर्ष बाद हुई इस ऐतिहासिक उड़ान मे 6500 पत्र ले जाए गए थे

 

 

 

कामिनी कामायनी

 

 

 

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