कृष्णवतार के विभिन्न कारक

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 



भगवान कृष्ण सौलह कलाओं युक्त पूर्वावतार थे। कई पुराणों में उनके अवतारों के विभिन्न कारण बतलाये गये हैं। हर अवतार के बारे में उनके प्रशंसक कहते है कि वेद भी उन अवतारों की महिता बखान नहीं कर सके, पर वेदो के काल में अवतार वाद नहीं थो। केवल देवकी नन्दन कृष्ण का सन्दर्भ जरूर छान्दोग्य उननिषद में आया है यथाः
तद् द एतद् घोर आंगरिसः कृष्णाय देवकी पुत्राय उषत्वा उवाच। अपिपास एष से व भूख सौडन्तवेलाया एतत त्रय प्रतिवधेत। अश्रितमसि अच्युतमसि प्राण संशितम सीति। 35।।
घोर आगिरस ने देवकी पुत्र कृष्ण को यह उपदेश दिया। अन्तिम समय में इस मंत्रत्रय का जाप करो। तुम अक्षित हो। तुम अच्युत हो। तुम प्राणों से तीक्ष्ण हो।
इसी संदर्भ में एतरेय महिदास का उदाहरण दिया गया है जो ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जाप करते थे एतरेयश महिदास माण्डूक्य ऋिषि की इतरा नामक पत्नि के पुत्र थे। उस समय लगता है कि मातृ सत्तात्मक समय था। इस हिसाब से देवकी नन्दन कृष्ण का समय सतयुग में आता है।
मुख्यतः भगवान कृष्ण को निर्गुण परमात्मा का सगुण रूप कहा गया है जैसा कि स्वयं भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवत्गीता में कहा है
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावम् अजानन्तो ममाव्ययम नुत्तम।
मुझ अव्यक्त को बुद्धिहीन व्यक्ति व्यक्ति रूप हुआ मानते है पर मेरे श्रेष्ठ अव्यय और अनुत्तम भाव को नहीं जानते। भगवान कृष्ण को मुख्य रूप से भगवान विष्णु का अवतार कहा जाता है। क्योंकि इन्द्र के छोटे भाई उपेन्द्र यानि विष्णु के ही सब अवतार माने जाते है। वे भगवान विष्णु के आठवें अवतार माने गये है। यह समय पुराणों का समय माना गया है। वे देवकी की आठवीं संतान थे।
भगवान कृष्ण की लीलायें एवं महिमा श्रीमद् भागवत् एवं महाभारत में विस्तृत रूप से आई है। राम चरित मानस के अनुसार भगवान विष्णु को नारद ने श्राप दिया था तब वे भगवान राम के यप में अवतरित हुये भगवान विषणु के दो पार्षद जय और विजय को श्राप दिया गया था कि वे राक्षस बनेंगे। श्री कृष्ण को भगवान राम का एवं श्री बलराम को लक्ष्मण जी का अवतार भी माना जाता हैं। रावण श्रीकृष्णावतार के समय शिशुपाल हुआ जिसे भगवान कृष्ण ने मारा। कुभ कर्ण कंस बना उसे भी भगवान कृष्ण ने मारा।
भगवान कृष्ण को नारायण ऋषि का अवतार भी माना जाता है और अर्जुन पर नर ऋषि के अवतार माने गये हैं। श्रीमदभगवत गीता के अध्याय 70 में भगवान कृष्ण ने कहा भी है।
वृष्णीनां वासुदेवोडस्मि पाण्डवानां धनन्जय । मुनीनाप्य हैं व्यासः कबीनामुश्ना कवि। मैं वृष्णियों में वायुदेव हँू पाण्डवो में धनन्जय हँू मुनियों में व्यास और कवियों में शुक्राचार्य हँू।
महाभारत के अन्त में वर्वरीक के सिर से पाण्डवो ने पूछा कि युद्ध में सबसे अधिक योगदान किसका था तो वर्वरीके के शिर ने कहा किसी का नहीं। उसने तो मात्र भगवान कृष्ण को पूरे युद्ध में घूमते हुये और दुष्टो का संहार करते हुये देखा था। भगवान कृष्ण्ध ने श्रीमद्भगवत गीता के ग्यारहवें अध्यास में इस प्रकार कहा है

 


कालोडहमरिम लोकक्षयकृत् प्रवृद्धो
लोकान्यममाहर्तुहि प्रवृतः
ऋतेडपि त्वां न भविष्यति सर्वे
येडवास्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः


(श्रीमद्भगवद्गीता 11 वां अध्याय 32 वा श्लोक)
मैं काल हँू और लोको को नष्ट करने के लिये उद्धत हुआ हँू। तुम्हारे न रहने पर भी युद्ध में आये सभी योद्धा नहीं रहेंगे।
यहां भगवान काल का रूप है।
वहीं थी देवी पुराण (महाभागवत) में भगवान श्री कृष्ण को मां महाकाली का अवतार और श्री राधा जी को भगवान शिव का अवतार बतलाया गया है। भगवान विष्णु दो भागो में बंटकर क्रमशः भगवान बलराम और श्री अर्जुन हुये।
भगवान शिव ने देवी पार्वती से कहा कि वे नारी रूप होकर देवी पार्वती को पुरूष रूप में पाना चाहते है तब देवी ने कहा (उनन्चासवा अध्याय)
भवितयेडहं त्वत्प्रियार्थ निश्चित पृथ्वी तले। 118 श्लोक
पु रूपेण महादेव वसुदेव गृहे प्रभो।
कृष्णोड है मत्प्रियार्थ स्त्री भव त्व हि त्रिलोचन 119 श्लोक
मैं आपके प्रिय कार्य के लिये निश्चित रूप से पृथ्वी तल पर पुरूष रूप में वसुदेव के घर कृष्धावतार के रूप में जन्म लूँगी और आप मेरा प्रिय करने के लिये, है त्रिलोचन, स्त्री रूप में जन्म लेना।
श्री शिव ने कहा “पुरूपेण जगद्वात्रि प्राप्प्रायां कृष्णावताभत्वयि।
वृषभानो सुता राधा स्वरूपां हं स्वयं शिवे।।
तव प्राण समा मूत्वा विहरिये त्वण सह।
मूयोडवटौ तथा मत्र्ये भविवयनयुत योषितः
रूकमणी सत्यभामाद्या महिवश्चारू लोचनाः
आप जब पुरूष रूप में कृष्ण यप जन्मेंगी तब मैं कृ षभानु सुता राधा के रूप में आपके साथ विहार करूँगा। मेरी आठ मूर्तियां सुन्दर लोचना रूक्मणि सत्यभामा आपकी आठ पटरानियां बनेंगी।
इस तरह हमने देखा कि भगवान कृष्ण के अनादि अनन्त के अवतार भगवान विष्णु के अवतार नारायण ऋषि के अवतार काल के अवतार वासुदेव के अवतार भगवान राम के अवतार महाकाली के अवतार अव्यक्त के अवतार इत्यादि माना गया है। भगवान दर असलः।
हरि अनन्तः हरि कथा अनन्ता
कहहि सुनहि गावहिं श्रुति सन्ता
भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता में स्वयं को आत्मा, भूतो का आदि मध्यस और अन्त विष्णु, सूर्य, मरीचि, चन्द्रमा, सामवेद, इन्द्र, चेतना, शंकर, अग्नि, मेरू शिखर, वृहस्पति, कार्तिकेय, समुद्र, भृगु ऊँ, जपयज्ञ, हिमालय, पीपल, नारद, चित्ररथ, कपिल, उच्चैः, श्रवा, एरावत, नराधिप, वज्र,कामधे, कन्दर्प, वासुकि, अनन्त, वरूण, अर्थमा, यम, प्रहलाद, काल, मृगेन्द्र, गरूड, पवन, राम (या बलराम) मगर, गंगा, सृष्टि का (आदि, मध्य और अज) आध्यात्म, वाद “अ” द्वन्द, परम, आश्रय, काल, वृहना, मृत्यु, उदभव, कीर्ति श्री वार्क, स्मृति, मेघा, धृति, क्षमा, गायत्री छन्द, मार्गशीर्ष, वसन्त, धूत तेज, जय, व्यवसाय, अस्तित्व, दण्ड, नीति, मौन, ज्ञान आदि भी बतलाया तात्पर्य यह कि भगवान कृष्ण सभी वैदिक देवता, सम्पूर्ण प्रकृति एवं जो कुछ भी व्यक्त एवं अव्यक्त है वह कृष्णमय हैं जो भी सत्य असत्य और दोनो से परे है वह कृष्ण का ही रूप है।

 

 

 

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