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लक्ष्य से जीत तक

जीवन अनमोल है। आधुनिक युग में हर व्यक्ति बेहतर भविष्य, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं अच्छे जीवन के लिए  सदा प्रयत्नशील रहता है। आपको भी यदि सफल होना है; जीवन में कुछ पाना है; महान बनना है; तो निम्न  बातों को जीवन में अपना लीजिए ।
1. लक्ष्य निर्धारण - सर्वप्रथम हमें अपने जीवन में लक्ष्य का निर्धारण करना है। एक लक्ष्य - बिलकुल निशाना साध कर। अर्जुन की चिड़िया की आँख की तरह। स्वामी विवेकानंद ने कहा था - जीवन में एक ही लक्ष्य साधो और दिन रात उस लक्ष्य के बारे में सोचो । स्वप्न में भी तुम्हे वही लक्ष्य दिखाई देना चाहिए । और फिर जुट जाओ, उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए - धुन सवार हो जानी चाहिए आपको । सफलता अवश्य आपके कदम चूमेगी । लेकिन एक बात का हमें ध्यान रखना है। हमारे लक्ष्य एवं कार्यों के पीछे शुभ उद्देश्य होना चाहिए। पोप ने कहा था - शुभ कार्य के बिना हासिल किया गया ज्ञान पाप हो जाता है । जैसे परमाणु ज्ञान - ऊर्जा के रूप में समाज के लिए लाभकारी है तो वहीं बम के रूप में विनाशकारी भी ।
2. कर्म - लक्ष्य निर्धारण के बाद आता है कर्म । गीता का सार है - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । कर्म में जुट जाओ। उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, जो आपने चुना है। हर पल । बिना कोई वक्त खोए। गांधी जी ने कहा था - अपने काम खुद करो, कभी दूसरों से मत करवाओ। गांधी जी खुद भी अपने सभी कार्य खुद करते थे। दूसरी बात जो गांधी जी ने कही थी - जो भी कार्य करो, विश्वास और आस्था के साथ, नही तो बिना धरातल के रसातल में डूब जाओगे। यह अति आवश्यक है कि हम अपने आप पर विश्वास और  आस्था रखें, यदि हमें अपने आप पर ही विश्वास नही है तो हमारे कार्य किस प्रकार सफल होंगे? जरूरी है - अपने आप पर मान करना, स्वाभिमान रखना । विश्वास और लगन के साथ जुटे रहना । हमारे कार्यों से हमेशा एक संदेश मिलना चाहिए । नेहरू जी से मिलने एक बार एक राजदूत, एक सैनिक एवं एक नवयुवक मिलने आए । तो नेहरू जी ने सबसे पहले नवयुवक को मिलने के लिए बुलाया, फिर सैनिक को एवं सबसे बाद में विदेशी राजदूत को । बाद में सचिव के पूछने पर बताया कि नवयुवक हमारे देश के कर्णधार हैं, सैनिक देश के रक्षक; उनको सही संदेश मिलना चाहिए । बिना बोले हमारे कर्मों से समाज को संदेश मिलना चाहिए ।
3. अवसर - हर अवसर का उपयोग कीजिए। कोई भी मौका हाथ से न जाने दीजिए । स्वेट मार्टेन ने कहा था - अवसर छोटे बड़े नही होते; छोटे से छोटे अवसर का उपयोग करना चाहिए। चैपिन ने तो यहां तक कहा कि जो अवसरों की राह देखते हैं, साधारण मनुष्य होते हैं; असाधारण मनुष्य तो अवसर पैदा कर लेते हैं । कई लोग छॊटे छॊटे अवसर यूं ही खॊ देते हैं कि कोई बड़ा मौका हाथ में आएगा, तब देखेंगे। यह मूर्खता की निशानी है।
4. आशा / निराशा - आप कर्म करेंगे तो जरूरी नही कि सफलता मिल ही जाए। लेकिन आपको घबराना नही है। अगर बार बार भी हताशा हाथ आती है, तो भी आपको निराश नही होना है । मार्टेन ने ही कहा था - सफलता आत्मविश्वास की कुंजी है । ग्रेविल ने कहा था - निराशा मस्तिष्क के लिए पक्षाघात (Paralysis) के समान है| कभी निराशा को अपने पर हावी मत होने दो । विवेकानंद ने कहा था - 1000 बार प्रयत्न करने के बाद यदि आप हार कर गिर पड़े हैं तो एक बार फिर से उठो और प्रयत्न करो । अब्राहम लिंकन तो 100 में से 99 बार असफल रहे। जिस कार्य को भी हाथ में लेते असफलता ही हाथ लगती । लेकिन सतत प्रयत्नशील रहे। और अमेरिका के राष्ट्रपति पद तक जा पँहुचे । कुरान में भी लिखा है - मुसीबतें टूट पड़ें, हाल बेहाल हो जाए, तब भी जो लोग निश्चय से नही डिगते, धीरज रख कर चलते रहते है, वे ही लक्ष्य तक पहुँचते हैं ।
 5. आलस्य - आलस्य को कभी अपने ऊपर हावी मत होने दो । कबीर की यह पंक्तियां तो हम सभी के मुंह पर रहती हैं - काल करे सो आज कर । और यह मत सोचो कि आपका काम कोई दूसरा कर देगा । राबर्ट कैलियर ने कहा था - मनुष्य के सर्वोत्तम मित्र उसके दो हाथ हैं । अपने इन हाथों पर भरोसा रखो एवं सतत प्रयत्नशील रहो ।
6. निंदा/ बुराई - जब हमने लक्ष्य ठान लिया है, कर्म कर रहे हैं, अवसरों का उपयोग कर रहे हैं, निराशा से बच रहे हैं, सतत आगे बढ़ रहे हैं तो राह में हमें कई प्रकार के लोग मिलते हैं । हमारे विचार, दृष्टिकोण, लक्ष्य परस्पर टकराते हैं। लेकिन हमें एक चीज से बचना है । दूसरों की बुराई से, उनकी निंदा से । रिचर्ड निक्शन ने कहा था - निंदा से तीन हत्याएं होती हैं; करने वाले की, सुनने वाले की और जिसकी निंदा की जा रही है । स्विफ्ट ने कहा था - आदमी को बदमाशियां करते देख कर मुझे हैरानी नही होती है, उसे शर्मिंदा न देखकर मुझे हैरानी होती है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपनी गलतियों को सहर्ष कबूलें । हम इंसान हैं, हमसे गलतियां भी होंगी। लेकिन गलती को मान लेना सबसे बड़ा बड़प्पन है । और इन गलतियों से सीख लेते हुए हमें आगे बढ़ना है ।
7. परोपकार - हमारे लक्ष्य, हमारे कर्मों में कहीं न कहीं परोपकार की भावना अवश्य होनी चाहिए। चाहे वह हमारे समाज, जाति, देश, धर्म, परिवार, गरीबों के लिए हो । परोपकार की भावना जितने बड़े तबके के लिए होगी आप उतने ही महानतम श्रेणी में गिने जाएंगे । गांधी जी ने कहा था - जिस देश में आप जन्म लेते हैं, उसकी खुश हो कर सेवा करनी चाहिए । तुलसीदास जी ने कहा है - परहित सरिस धर्म नहि भाई । नेहरू जी ने भी कहा था - कार्य महत्वपूर्ण नही होता, महत्वपूर्ण होता है - उद्देश्य; हमारे उद्देश्यों एवं कर्मो के पीछे परोपकार की भावना निहित होनी चाहिए ।
8. जीत - आपने लक्ष्य ठाना; कर्म कर रहे हैं; अवसरों का उपयोग कर रहे हैं; निराशा, आलस्य और निंदा से बच रहे हैं; परोपकार की भावना से निहित हैं । बस एक ही चीज अब बचती है । जीत । जीत निश्चित ही आप की है । ऋग्वेद में भी लिखा है - जो व्यक्ति कर्म करते हैं, लक्ष्मी स्वयं उनके पास आती है, जैसे सागर में नदियां ।
जो इन सब पर चलते हैं, असाध्य कार्य भी संभव हो जाते हैं । दो उदाहरण देना चाहता हूँ -
1. एक गुरू ने अपने शिष्यों को बांस की टोकरियां दी और कहा कि इनमें पानी भर कर लाओ। सभी शिष्य हैरान थे, यह कैसा असंभव कार्य गुरूजी ने दे दिया । सब तालाब के पास गए । किसी ने एक बार, किसी ने दो बार और किसी ने दस बीस बार प्रयत्न किया । कुछ ने तो प्रयत्न  ही नही किया । क्योंकि पानी टोकरी में डालते ही निकल कर बह जाता था। लेकिन एक शिष्य को गुरू पर बहुत आस्था थी, वह सुबह से शाम तक लगातार लगा रहा। प्रयत्न करता रहा। शाम होते होते धीरे धीरे बांस की लकड़ी फूलने लगी और टोकरी में छिद्र छोटे होते गए और धीरे धीरे बंद हो गए। इस तरह टोकरी में पानी भरना संभव हो सका ।
2. 1940 के ओलंपिक खेलों में शूटिंग के लिए सभी की नजरें हंगरी के कार्ली टैकास पर टिखी थीं; क्योंकि वह बहुत अच्छा निशाने बाज था । लेकिन विश्वयुद्ध छिड़ गया । 1944 में भी विश्वयुद्ध के चलते ओलंपिक खेल नही हो पाए । विश्वयुद्ध तो समाप्त हो गया लेकिन 1946 में एक दुर्घटना में कार्ली का दायां हाथ कट गया । जब हाथ ही नही तो शूटिंग भला कैसी ? कार्ली ने घर छोड़ दिया । सबने सोचा निराशा के कारण कार्ली ने घर छोड़ दिया है । लेकिन जब 1948 में लंदन में ओलंपिक खेल हुए तो सबने हैरानी से देखा कि शूटिंग का गोल्ड मैडल लिए कार्ली खड़ा है। बाएं हाथ से गोल्ड मैडल जीता ।
9. अहंकार - जीत आपने प्राप्त कर ली । अब एक बात का और ध्यान रखना है । कभी अहंकार को अपने ऊपर हावी नही होने देना है । अहंकार मनुष्य के विनाश का कारण बनता है। सहजता और सौम्यता बड़प्पन के गुण हैं । शेक्सपीयर ने कहा था - अहंकार स्वयं को खा जाता है । अपनी दो पंक्तियों के साथ -
हिम बन चढ़ो शिखर पर यां मेघ बन के छाओ,
रखना है याद तुम्हे सागर में तुमको मिलना ।
 
कवि कुलवंत सिंह
वैज्ञानिक अधिकारी
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई

 

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