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लेखक पाठक और समकालीन समाज

 

- डाँ. सुनील कुमार परीट



“वह लेखक सबसे अच्छा लिखता है, जो अपने पाठकों का सबसे कम समय लेकर उन्हें सबसे अधिक ज्ञान देता है।" यह कथन है सिडनी स्मिथ जी का। हाँ ऐसा ही लेखक खरा उतरता है जो सबसे कम समय में पाठकों को अधिक ज्ञान देकर पाठकों का दिल जीत लेता है। तो इस तरह पाठकों के अभिरुचि के अनुसार लिखकर दिल जीत लेनेवाले को ही लेखक कहेंगे? आम तौर पर कहानी, उपन्यास, नाटक, इतिहास आदि किसी भी गद्य विधा में लेखन करनेवाले व्यक्ति को लेखक कहा जाता है। कुछ लेखक अपनी खुशी के लिए लिखते हैं तो कुछ लेखक दूसरों के मनोरंजन के लिए लिखते हैं। परन्तु सच्चा लेखक जन-कल्याण एवं समाज कल्याण के लिए लिखता है।

 

पाठक किताबों को एवं पत्रिकाओं को पढनेवाले को कहा जाता है। परंतु सच्चा पाठक वह है जो अपनी अभिरुचि के अनुसार कुछ पढता है, और उस साहित्य में अपने आप को महसूस करता है। सामन्यत: पढनेवाले को पाठक कहा जाता है, परंतु देखा जाता है कि कौन क्या पढ रहा है। सभी पाठक सब कुछ नहीं पढते। अलग-अलग पाठकों के अलग-अलग रुचियाँ होती हैं। और यह बात भी सत्य है कि एक लेखक हर एक पाठक के अभिरुचि के अनुरुप नहीं लिख पाता।

 

क्या हम समकालीन समाज यानी हमारे जमाने के समाज को कह सकते हैं, या इस आधुनिक बाजारवाद एवं वैश्वीकरण के दौर के समाज को कह सकते हैं? ऐसा एक प्रश्न तो हर एक व्यक्ति को तरसा रहा है। इन्दौर के श्री ब्रजेश कानूनगो जी कहते हैं, “समकालीन समाज वस्तुत: आज है क्या? कौन से घटक हमारे आज के समाज को प्रभावित कर रहे हैं? बाजारवाद और वैश्वीकरण के इस समय में हम एक उपभोक्तावादी समाज में बदल दिए गए हैं जहाँ सब कुछ बेच डालने के प्रयास किए जा रहे हैं।"

 

लेखक पाठक और समकालीन समाज को हम एक साथ तौलेंगे तो निस्संदेह सब एक्-दूसरे पर आधारित है। समाज जहाँ सजीव प्राणी निर्जीव वस्तुओं के साथ रहते हैं, अनेक चाहे-अनचाहे घटनायें घटती हैं, उन्हीं घटनाओं को लेखक अपनी रचनाओं में दर्शाता है, और ज्यादातर पाठक वही पढना चाहता है जो समकालीन समाज में घट रहा है। समाज में विभिन्न अभिरुचिवाले मनुष्य एवं प्राणी रहते हैं, क्योंकि सामाज यानी व्यक्ति-प्राणी-वस्तुओं का मिला-जुला रुप है। साहित्य समकालीन समाज का दर्पण होता है, जिस तरह समकालीन समाज की परिस्थितियाँ होती हैं उसी तरह का साहित्य का सृजन होता रहता है। इस संदर्भ में श्रीराम शर्मा ’राम’ जी कहते हैं, “ समाज और व्यक्ति दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। व्यक्ति से समाज बनता है, फिर देश और विश्व। व्यक्ति अपने को अकेला बनाकर जीवित नहीं रहता।"


एक विशाल समाज होता है, उसमे एक बडा पाठक वर्ग होता है पर इन सबके बीच लेखक मात्र एक छोटा जीव होता है। अनेक इतिहासकारों ने अपनी ऐतिहासिक पुस्तकों में समकालीन परिस्थितिओं द्वारा समकालीन समाज को दर्शाया है। साहित्य के प्राचीन काल, मध्ययुगीन काल और आधुनिक काल के लेखकों ने समकालीन समाज को ही अपना मुद्दा बनाया है। कबीर तो एक समाज सुधारक मात्र नहीं थे उस समय के युगदृष्टा थे। अपने दोहों द्वारा उन्होंने एक हीन समाज को परिवर्तित करने का प्रयत्न किया है।

 

आज के इस आधुनिक समकालीन समाज में सच मानों तो लेखक, पाठक और समाज का संबंध टूटता हुआ दिखाई दे रहा है। पाठक जो पढना चाहता है, उस तरह के साहित्य का सृजन नहीं हो रहा है। आज चारों ओर भ्रष्टाचार का ताण्डव है, आतंकवाद का भय है, भूख-महँगाई से जनता त्रस्त है। तो इस जटिल परिस्थिति में पाठक क्या चाहता है इसी द्वंद्व में हैं लेखक। ऐसी स्थिति में साहित्य का रुप मनोरंजनपरक हो या प्रबोधनपरक हो इसी को नहीं जान पा रहा है। दरअसल साहित्य हमारे जीवन को प्रखर बनाता पथदर्शक होता है, हमारा सच्चा हमसफर होता है। इसलिए अब वही लेखक खरा उतरेगा जो समकालीन समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विषयों को लेकर पाठकों को जागृत करेगा। श्री ब्रजेश कानूनगो जी कहते हैं- “स्मकालीन समाज के परिवेश और स्थितियों के साथ भाषा, शिल्प, कथ्य और संप्रेषणीयता की चुनौतियाँ तो होती ही है लेकिन विचारधारा, प्रतिबध्दता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बनाए रखना भी गंभीर लेखन की महत्वपूर्ण चुनौती रहती है कि श्रेष्ठ लेखन एक ऐसा लक्ष्य होता है जिसके लगभग पास पहुँच जाने के बाद वह और थोडा दूर जाकर खडा हो जाता है।" सुधि पाठक की भी एक एहम जिम्मेदारी बनती है कि अपनी रुचि के तहत पढकर लेखकों के सामने अपने विचार व्यक्त करे। क्योंकि समकालीन समाज एक गाडी है तो लेखक और पाठक उसके दो पहिए जैसे काम करे तो मात्र यह गाडी सुंदर ढंग से चल सकती है।

 

 

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