मैत्रेयी पुष्पा : स्त्री‌ आपबीती और लोकधर्मीता

 

 

मैत्रेयी पुष्पा का साहित्य हमें युगीन बोध कराता है। एक ओर जहां सहित्यकार की रचनाएं उसके व्यक्तित्व, मन और मस्तिष्क की झकल देने में सहायक होती है, वहीं दूसरी ओर उसका व्यक्तित्व भी उन रचनाओं के अनुशीलन में सहायक बनता है। मैत्रेयी पुष्पा एक परिवर्तनकामी, स्वकस्थ विचारधारा की संपोषक हैं। मैत्रेयी की कृतियॉं समाज के प्रत्येरक वर्ग की स्त्रीक को चेतना संपक्षता के औजार सौंपती हैं। मैत्रेयी के अंदर का लोकधर्मी कलाकार त्रासद जीवन के पीछे स्थित कुटिल साजिशों की पोल खोलकर बुनियादी तथ्यों का उद्घाटन करता है। रूढ़ीगत विधानों का उच्छेटदन तथा उनके स्थाुन पर स्वोस्थद सुलझे जीवन मूल्यों का आरोपण हमें मैत्रेयी की रचना प्रक्रिया में दिखाई पड़ता है। मैत्रेयी जी ने आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं का यथार्थ चित्रण किया है तथा स्त्री‌-शक्ति के नये आयाम खोजने का प्रयोग किया है।
आम तौर पर स्त्रियां अपनी आपबीती कहते अथवा लिखते हुए झिझकती हैं। इसका कारण यह है कि स्त्रियों की आपबीती से समाज की जो दबी–ढंकी सच्चाइयां खुलकर सामने आती है, उससे तथाकथित मालिकों के खफा होने का खतरा रहता है। इससे संबंधों में टूट-फूट की तो आशंका रहती ही है, समाज में बदनामी, पारिवारिक बहिष्कार जैसी सजाएं भी तय रहती हैं घर-भीतर का रहस्य खोलने वाली स्त्रियों के लिए। लेकिन एक चेतना संपन्न रचनाकार बहुत दिनों तक चुप रहकर यथास्थिति का पोषण नहीं कर सकता क्योंकि शोषण का प्रतिकार न करना शोषण का समर्थ नहीं कहलाता है। मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आत्मकथा–लेखन के कारणों की पहचान करते हुए लिखा है-“आत्मकथा लिखने की शुरुआत अपनी उन कमजोरियों ने ही कराई, जिनके बरक्स आत्मचेतना कभी दबे स्वर में तो कभी मुखरित होकर हमसे सवाल करने लगी। अंतरात्मा हमारे कुचले हुए वजूद पर हमें धिक्कारती रही। और हम हैं कि औरत के पैरोकार बने हुए पुरूष पुरोधाओं की ‘खास लोकतांत्रिक’ सीखों को सुनने में खोए रहे। भीतर धुनकी भले ही चलती रही हो लेकिन साहित्यिक आकाओं के सामने इंकार में सिर नहीं हिला और वे समझते रहे कि यही मौन स्वीकृति का लक्षण है।”1 मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा उस घुटन का परिणाम है जो सदियों से स्त्री को बेजुबान मानकर सनकी आत्मचेतना को कुंठित करने के कारण पैदा हुई है। यह उस शोषण का प्रतिकार भी है जिसने स्त्रियों की समस्त मानवीय अस्मिताएं छीनकर उसे महज देह में रेड्यूस करके रख दिया है। आत्मकथा लिख कर मैत्रेयी पुष्पा ने इन्हीं अत्याचारों के खिलाफ सामाजिक न्याय की मांग की है। इसके अलावा आत्मकथा द्वारा उन्होंने अपने लेखन पर लगने वाले आरोपों का भी जवाब दिया है। उन्होंने दिखाया है कि ‘मर्यादाहीन और व्यवस्था बिगाड़ू’ माने जाने वाले उनका लेखन जीवन की किन जमीनी सच्चाइयों की देन है।
‘अल्मान कबूतरी’ में मैत्रेयी ने कबूतरा जनजाति की पीड़ा को अभिव्यलक्त किया है। कबूतरा हमारे देश की ऐसी अनुसूचित जनजाति है जिनके नाम के साथ ‘अपराधी’ का टैग जुड़ा होता है। हमारा सभ्य समाज इन्हेंै अपराधी का टैग देकर बड़ी आसानी से समाज से फेंक देता है और ये चुपचाप समाज के हाशियों पर डेरा लगाए सदियॉं गुजार देते हैं। इनके पास इनकी प्राथमिक जरूरतों को पूरा करन के लिए कोई संसाधन नहीं होते जिसके कारण इन्हें चोरी-डकैती का रास्तां चुनना पड़ता है। अर्थात चोरी करना इनकी शौक नहीं मजबूरी है, लेकिन सभ्यै समाज इनकी चोरी को शौकिया पेशा मानकर इन्हेंथ समाज से खदेड़ने का बहाना ढूंढ लेता है। इन असभ्यी अनुसूचित जनजातियों के अंदर सभ्ये समाज में शामिल होने की बेचैनी एवं छटपटाहट दिखती है, लेकिन l सभ्य‍ समाज इन्हेंह अपने समाज में शामिल नहीं होने देना चहता क्योंहकि उन्हें उनका भविष्यर खतरे में नज़र आने लगता है, उन्हेंश लगता है कि कहीं उनकी हुकूमत उनसे छिन न जाए, वे जिन पर शासन करते हैं। कहीं उन्हें उन्हींं का मुलाजिन न बनना पड़े, इसलिए कज्जा (सभ्यह समाज) चाहता है कि कबूतरा कबूतरा ही बने रहें, कज्जाक बनने की कोशिश न करे, इसके लिए कज्जा पुरजोर कोशिश करता हैं। यही कारण है कबूतरा पुरुष या तो जेल में रहता है या जंगल में और स्त्रियॉं शराब की भट्टियों पर या कज्जा पुरुषों के बिस्त रों पर।
अपने विधागत ढ़ांचे में ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ की विशेषता यह है कि इसका मूल चरित्र आत्मकथा और जीवनी के तालमेल से तैयार ‘सांझी कथा’ का है- कस्तूरी देवी की जीवनी और मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा के सन्योग से बुनी गई सांझी कथा है। सांझी कथा की रचना का बुनियादी नियम यह होता है कि इसमें कथ्य व्यक्ति और कथाकार का जीवन आपस में इतना संश्लिष्ट रूप से गुथा होता है कि दोनों की परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया में जीवन विकास की कथा चलती है। हिंदी में शिव रानी देवी द्वारा लिखी गई प्रेमचंद की जीवनी ‘प्रेम चंद घर में’ सांझी कथा का अन्यतम उदाहरण है। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ में कस्तूरी देवी और मैत्रेयी पुष्पा का जीवन आपस में इतना संश्लिष्ट रूप से गुथा हुआ है कि जीवन तो मां का है लेकिन जीना बेटी का है। यहां मां के जीवन की दिशा बेटी के जीवन की दिशा निर्धारित करती है। मां के जीवन-संघर्षों के मध्य परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया द्वारा बेटी के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। मैत्रेयी पुष्पाो डेढ़ वर्ष की आयु में पिता का देहाँत होने के कारण मैत्रेयी पुष्पा की मां नौकरी पर चली जाती थीं तो मैत्रेयी गांव की पुरोहितन – खेरापतिन के साथ दिनभर गीत गाती फिरती थी, खेरापतिन दादी जहां भी जाती, मैत्रेयी पुष्पा उसके साथ–साथ रहती। पहले पढ़ाई-लिखाई में बिल्कुल रूचि नहीं थी। गांव की पुरोहितन – खेरापतिन, जिसके साथ कंठ में सैकड़ों कस्तूरी की बेटी मैत्रेयी के लिए विलक्षण स्त्री है, वह स्कूल छोड़कर दिनभर बुढ़िया के आगे-पीछे घुमती है, खेरापतिन भी इन दिनों अपनी गायिकी का नया वारिस खोज रही है और उसकी तलाश मैत्रेयी पुष्पा पर आकर ठहर जाती है क्योंकि बिना भाई की बहन अपने पिता की खेती पर ताउम्र रहेगी, ब्याही जाने के बाद उसका पति खेती का वारिस बनेगा। इनकी प्राईमरी शिक्षा सिकुर्रा गांव में हुई। इसके बाद मैत्रेयी पुष्पा की पूरी शिक्षा की झांसी में सम्पन्न हुई। एक साल कन्या गुरुकुल में भी शिक्षा प्राप्त की। आरम्भ में पढ़ाई में बिल्कुल रुचि नहीं थी परन्तु माता के कठोर व्यवहार के कारण मैत्रेयी पुष्पा को मन मारकर स्कूल जाना पड़ता था।
हर रचनाकार की रचना अपनी परिस्थितियों की देन होती है। उनकी रचनाओं के संवेदनात्माक उद्देश्यच अनिवार्य रूप से जीवन की परिस्थितियों और जीवन के प्रश्नोंन से संबंधित होती है। मैत्रेयी पुष्पा स्वंय बुंदेलखंड अंचल के अभावग्रस्त जीवन से सम्बद्ध रही हैं और ग्रामीण जीवन के जीवन को इन्होंने निकट से देखा है, भोगा है। मैत्रेयी पुष्पा के साहित्य में पुरूष-प्रधान व्यवस्था के प्रति आक्रोश का भाव जगह-जगह झलकता है परन्तु उसके पीछे कोई नारीवादी आग्रह नहीं दिखाई पड़ता। डॉ.कांति कुमार जैन लिखते हैं- “मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा कलाकृति से बढ़कर जीवन की घुटन है, जो जिंदगी के धूल – धक्कड़ से लड़ते हुए गिरते है और गिरकर फिर उठने का हौसला रखती है। वह पीछड़े हुए रूढ़ि जर्जर, पुरूष अनुशासित भारतीय समाज में अपने औरत होने का भागमान मना रही है ‘जो कहूंगी, सच कहूंगी’ के हलफिया बयान के साथ ‘तिरिया जनम झन देहु’ की कातर प्रार्थना को नकारते हुए। वह स्त्री होने की अपनी जैविकता से न तो क्षमा- याचना की मुद्रा में है, न ही अपनी जैविकता को लेकर भगवान को कोसती है।”2 नारी शोषण को मैत्रेयी पुष्पा ने व्यापक सामाजिक विधान से जोड़कर चित्रित किया है। उनके साहित्य में नारी-पात्र मुख्य रूप से उभरकर सामने आयीं है जो अपने–अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन नारी-पात्रों के माध्यम से मैत्रेयी पुष्पा ने नारी शक्ति के नये आयाम खोजने का प्रयास किया है। अपने साहित्य में मैत्रेयी जी केवल कोरे यथार्थ को सामने रखकर नहीं चली अपितु आदर्श और कल्पना की भी यथासंभव संयोजना की है।

 

 

 

संदर्भ-सूची
1. पुष्पाे मैत्रेयी, तब्दील निगाहें, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण - 2012,
पृष्ठा सं. -158
2. सिंह विजय बहादुर (सं.), मैत्रेयी पुष्पाा: स्त्रीर होने की कथा, लेख- कस्तूरी कुंडल बसै :हलचल मचाती एक आत्मकथा, कान्ति कुमार जैन, प्रथम संस्करण - 2011,किताबघर प्रकाशन,नई दिल्ली, पृष्ठ सं. - 251

 


आनंद दास, शोधार्थी, कलकत्ता विश्व विद्यालय, सहायक संपादक, उन्मुक्त पत्रिका
संपर्क-9804551685, ईमेल- anandpcdas@gmail.com

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