देश प्रेम में विष पीने वाला मसीहा

 

 

 

विष वमन करना ,वो भी दूसरों पर ,बहुत आसान है ,लेकिन , दूसरों के लिए विष पान करना अत्यंत दुर्लभ और बेहद कठिन भी है ।
मगर वह महान दार्शनिक अपनी इसी कर्म के लिए इतिहास मे दर्ज हो गया है ।
पाश्चात्य दर्शन के जनकों मे से एक प्रमुख ,सुकरात ने स्वयम कोई ग्रंथ नहीं लिखा ,पर उनके शिष्यों ने उन पर बहुत सारे लेख लिखे और उसी के आधार पर हमारे सामने तकरीबन ढाई हजार साल बाद भी सुकरात का व्यक्तित्व कुछ यूं उभरता है ।
सुकरात के युग मे रूढ़ियों और परम्पराओं के विरुद्ध विद्रोह करना और लोगों से विद्रोह की बात कहना ,एक बहुत बड़ी बात थी। इसलिए उनको जहर पिला कर मृत्यु दंड दिया गया था ।
वे एक बड़े ही लोकप्रिय अध्यापक थे ,उनके पास दूर पास के काफी प्रभावशाली शिष्यों की,जिज्ञासुओं की , भीड़ लगी रहती थी ,सभी उनक सम्मान करते थे ।
अपने एक मित्र यूथाईफ्रन को उन्होने बताया कि उनपर नवयुवकों को भ्रष्ट करने का आरोप है और इसलिए भी उनपर मुकदमा चलाया जा रहा है कि उन्होने नए देवताओं का आविष्कार किया है और वे पुराने देवताओं में विश्वास नहीं रखते ।एक अज्ञात युवक मेलिटस ने उनपर मुकदमा चलाई थी ।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों के समक्ष जो कैफियत दी थी ,वह अत्यंत अविस्मरणीय है ।उन्होने अपने आरोप मे संशोधन करते हुए कहा था कि आरोप यह होना चाहिए कि ‘ सुकरात एक दुष्कर्म करने वाला व्यक्ति है जो धरती और आकाश विषयों में हस्तक्षेप करके संशोधन करता है और दूसरे लोगों को भी यही सिखाता है’।
न्यायाधीशों से कहा कि आप लोग देख चुके हैं कि अभियुक्त किस प्रकार परेशान हो जाते हैं और न्यायाधीशों से रो रो कर प्रार्थना करते हैं कि उन्हें छोड़ दिया जाए ।वे भावुकता को उभारने के लिए बच्चों ,मित्रों और रिश्तेदारों तक को अदालत में ले आते हैं ,लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा । हालाकि मेरे भी मित्र हैं ,मेरे भी नातेदार हैं ,और मैं भी एक स्त्री के गर्भ से पैदा हुआ हूँ । मेरे तीन बच्चे हैं ,दो अभी छोटे ही हैं ।{ उनकी स्त्री उनसे उम्र मे काफी छोटी थी।}फिर भी मैं उनमें से किसी को भी आपके सामने उपस्थित नहीं करूंगा । और न आपसे प्रार्थना करूंगा कि आप मुझे छोड़ दें”।
एक मजबूत और परिपक्व विचार धारा के स्वामी सुकरात ने आगे कहा “ मैंने उन वस्तुओं की अवहेलना की ,जिन्हें अधिकांश मनुष्य मूल्यवान मानते हैं - जैसे धन ,परिवार ,स्वार्थ ,सैनिक ,उच्च पद ,लोकप्रिय भाषण बाजी ,एथेंस की महत्व पूर्ण नौकरियाँ ,राजनैतिक नियुक्तियाँ ,क्लब और गुट । मैं बहुत विवेक शील होने के कारण यही सोचता रहा कि यदि इन मामलों में मैं पड़ता तो विवेक् शील होने के कारण मैं अपनी जान नहीं बचा पाता”।
भौतिकता से सर्वथा दूर ,ज्ञान ,सदविचार ,विवेक और न्याय के पथ का मुसाफिर ,सुकरात की जिंदगी कठिनाईयों से भरी थी ।उनकी आर्थिक स्थिति कटाई अच्छी नहीं थी । उन्होने कहा
“मैंने जो ऐसी जिंदगी बिताई है ,उसके लिए मुझे क्या मिलना चाहिए ? मैं अभाव ग्रस्त हूँ ,मेरे पास जुर्माना अदा करने तक का भी धन नहीं है ।यदि मैं धनी होता तो मैं बड़ी से बड़ी रकम का जुर्माना विकल्प के रूप में आपके सामने रखता”।
“यदि आप थोड़े समय के लिए रुकते तो आपकी इच्छा प्रकृति के नियमों के अनुसार पूरी हो जाती ,क्योंकि मैं एक बूढ़ा आदमी हूँ ,काफी बूढ़ा हूँ और मृत्यु के समीप हूँ । मैंने करूण विलाप कर आपसे दया की भिक्षा नहीं मांगी । मृत्यु ने मेरा पीछा किया और मैं पकड़ा गया हूँ” ।उन्हें खूब पता था कि उनकी प्रसिद्धि से जलने वाले लोगों ने उन्हें अपने जाल में जकड़ लिया था । बहुत दुखी होकर उन्होने कहा था
“मैं यह भविष्यवाणी करता हूँ कि जिन लोगों ने मुझे मृत्यु दंड दिया है ,मुझे जो सजा मिली है ,उन्हें मेरे मरते ही इससे ज्यादा गंभीर सजा मिलेगी ,”।
“मैं अपने अभियोगकारियो पर या जिन लोगों ने मृत्यु दंड दिया है ,उन लोगों से बिलकुल खफ़ा
नहीं हूँ ।फिर भी सही यह है कि उन लोगों ने मुझ पर जो दोषारोपण किया है और मुझे जो सजा दी है ,वह इस ख्याल से नहीं हुआ कि मेरा कष्ट कम किया जाय बल्कि उन्होने यह सब मुझे हानि पहुँचने के लिए किया इसका मुझे दुख है’।
सुकरात का एक मित्र क्रिटो ने बहुत कोशिश की कि उन्हें जेल से भगा कर कहीं और ले जाया जाय ,वह जुर्माने का पैसा भी देने को तैयार था ,और उनकी जगह सजा भुगतने को भी ।उसे उनके बच्चों के बारे में भी बहुत फिक्र थी ।मगर सुकरात ने यह कह कर कि मैं एथेंस वासियों की राय के बिना जेल से कैसे भाग सकता हूँ’ भागने से माना कर दिया था ।“ सत्तर साल की उम्र में जब परलोक जाएंगे तो वहाँ के शासकों के सामने क्या सफाई देंगे ?’उनको इस बात की भी बहुत परवाह थी । उनका मानना था कि न तो हमें बुरा काम करना चाहिए और न बुरे काम का जवाब बुरे से देना चाहिए ।
देश भक्त सुकरात का मानना था कि जिस राष्ट्र के कानून में बल नहीं है ,जिस राष्ट्र के नागरिक उसे नहीं मानते ,वह राष्ट्र टिक नहीं सकता ।
जिस सुबह उन्हें विष दिया जाने वाला था ,क्रिटो उनसे मिलने जेल पहुंचा तो यह देखकर दंग रह गया किउनके लिए सोच सोच कर तो वह रात भर वह बेचैन रहा, सो न सका ,मगर ये यहाँ सभी चिंता फिक्र से दूर चैन की नींद सो रहे हैं ।
उन्हें देख कर जेल में जल्लाद लोग भी हैरान थे। वे पास आकर बड़ी नम्रता से कहने लगे कि अबतक जितने भी लोग यहाँ आए हैं ,हमने उन सबसे आपको बहुत भव्य ,श्रेष्ठ और शिष्ट पाया है । जल्लादों का भी हृदय द्रवित हो गया था उन लोगों ने रो रो कर अपने कार्य की मजबूरी बताई थी ।
अपने लिए निर्धारित तख्त पर बैठ कर ,खुली खिड़की से अपने देश की मिट्टी और वनस्पति निहारते हुए ,,विस्तृत नील गगन मे सूरज की गवाही में ,विष का प्याला पीने के आखिरी क्षण तक वे बिलकुल शांत बने रहे ,और धीरे धीरे एक अत्यंत महान दार्शनिक शांति के साथ इतिहास के पन्नो मे खो गया था ।
उनका सोचना सही था कि यदि वे भाग जाते तो उनकी ओर या उनके विचारों की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता ।मृत्यु के कारण उनके विचारों को अमरता प्राप्त हो गई ।
आज ढाई सौ साल बाद भी इस कहानी मे कितनी सत्यता नजर आती है । नैतिकता का कितना ह्रास हो चुका है । अपराधी या आरोपी अपने आप को बचाने के लिए रोने धोने या गिड़गिड़ाकर जान की रक्षा के लिए वकीलों का सहारा लेते हैं । राजनीति में तो नैतिकता और धर्म का सर्वथा विलोप हो चुका है ।

 

 


कामिनी कामायनी ।

 

 

 

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