नवचेतना

 

 

भारतीय समाज एवं राजनीति वर्तमान में कुछ नही बल्कि पूर्ण रूप से दिग्भ्रमित होती चली जा रही है और हम पुरातन काल की घिसी-पिटी राजनीति तथा परम्परागत सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भो में मान्यताओं को लेकर जी रहे है तथा पुरातन मान्यताओं एवं प्रथाओं का बोझ अपने शीर्ष पर लादे चल रहे है जिसे देखकर ऐसा लगता है कि आज के समाज में चली आ रही पुरानी परिपाटियों से कुछ अलग हट कर सोचने और कुछ करने की क्षमता एवं विचार शक्ति कुंठित अवस्था में आ गई है जिससे समाज में एक ठहराव सा आ गया है कुछ प्रगतिशील समाज में नवचेतना की ज्योति प्रज्जवलित करने की उत्कंठा लिए नवसमाज रचना एवं स्वच्छ राजनैतिक परम्परा कायम करने की दिशा में कुछ कर गुजरने का संकल्प उमंग लिये लीक के हटकर रचनात्मक कार्य एवं समाज में नवचेतना का सूत्रपात करने की दिशा में कार्य की सोच रखने वाले कुछ उँगलियों पर गिनने लायक थोड़े से परिवर्तनशील विचार धारा के लोगों की बुद्धि, विचार वर्तमान वातावरण को देखकर कुंठा एवं हताशा के द्वंद में विलीन सी होती प्रतीत हो रही है जिन्हें सहयोग समर्थन व प्रोत्साहन की कमी हर क्षण हर कदम पर बनी है क्योंकि वर्तमान युग में जो प्रगतिशील विचारक लेखक, कवि या साहित्यकार वर्तमान सन्दर्भ में झूठे आश्वासन और बहुरूपिया जीवन जीने वाले राजनेताओं द्वारा फैलाये गये मायाजाल तथा कथित अध्यात्म एवं ब्रम्हज्ञान से शून्य स्वार्थी ढोंगी पंडितों, तांत्रिकों द्वारा फैलाई गई भ्रान्तियों को सँही मानकर उनका आश्रय लेकर रातोंरात करोड़पति या बहुत बड़े राजनेता बन जाने के लिये अंधी दौड़ लगा रहे है, लोगों की चालें एवं गतिविधियों को देखकर हताश हुए मन व मस्तिष्क में एक ही विचार कौंधता है कि नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनेगा ? परन्तु हमारा यह विश्वास भी अडिग है कि कुछ गिने चुने लोग ही भटके हुए समाज व दूषित राजनीति को सही उचित दिशा देकर उसके पथ प्रदर्शक बन सकते है, किसी कवि ने सच ही कहा है कि “एक बार करवट तो बदलो सारा जग जय-जय कार करेगा पूर्व में ऐसे युग प्रवर्तक कर्मठ प्रगतिशील पथ प्रदर्शक हो चुके है जिन्हें आज सारा विश्व स्वामी विवेकानन्द, गौतम बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस आदि के नाम से स्मरण करता है जिन्होंने भारतीय संस्कृति, वैदिक ज्ञान अध्यात्मिक चिंतन का सही सन्दर्भ और सत्यनिष्ठा के परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज के साथ समस्त विश्व को संदेश भरी सही दिशा दी और यही वह मुख्य कारण है कि वर्षो बाद आज भी ये महापुरूष भारतीय समाज की आस्था का केन्द्र व प्रेरणा स्त्रोत बन कर विश्व के स्मृति पटल पर उभरे हुए है।

 

 

समय आ गया है कि भारतीय समाज एवं राजनीति वर्तमान समय में जो दिशाहीन होकर भटकाव की ओर अग्रसर है उसे इस भीड़ से अलग हटकर मौलिक रूप से खोजपूर्ण, शोधपूर्ण चिंतन कर अपनी लेखनी के सहारे सही दिशा प्रदान करनी होगी तथा एक ऐसी युगांतकारी सँही-सँही जीवन मूल्यों एवं सत्य पर आधारित नवचेतना, नवीन जागृति समाज को अवश्य रूप से देनी ही होगी जिससे एक नवीन समाज रचना का निर्माण होकर विशुद्ध राजनैतिक परम्परा कायम हो, अधिकांशतः देखा जा रहा है कि लोग असीमित महत्वकांक्षा के शिकार वे इसी उधेड़बुन में संलग्न रहते है कि कैसे जल्दी से जल्दी बिना परिश्रम के सहज रूप से अभिष्ठ फल प्राप्त कर लें इसके लिये वे तमाम् ऐसे घृणित कार्य करते है जिससे अधिक से अधिक लोगों को छल कर गुमराह कर कृत्यों पर सफलता प्राप्त करते हैं भले ही यह लोग राजनीतिक, सामाजिक, शासकीय पदों पर सुशोभित होते हुए वास्तविकता व सत्यनिष्ठा से कोसो दूर हो। वे इसी चिंतन में लीन रहते है कि किस प्रकार अपना स्वार्थ सिद्ध किया जा सके, जबकि सच यह भी है कि धन पाने की लोलुपता सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति कहलाने की चाहत को पूरा करने के लिये वे समाज सेवी व धर्मनिष्ठा मानवता प्रेमी सज्जन व्यक्ति होने की छवि उभारकार सफेदपोश दिनरात अथक प्रयास करते रहते है, नाना प्रकार के दंभ लोलुपता, छल, कपट, दर्प ईष्र्या आदि दुर्गुणों को अपने अंतःकरण में बड़ी चतुराई से सहेजे, संजोये हुए व्यक्ति अपने इच्छित लोभी गुरू, लालची चेला, ना तो गुरू ब्रम्हज्ञान अध्यात्म या तंत्र शास्त्र का ज्ञाता होता है और ना चेला सुयोग्य पात्र होता है दोनो अपने शिकार की टोह में बाँट जोहते रहते है, स्वार्थी महत्वाकांक्षी व्यक्ति दैवीय चमत्कार के सहारे उच्च शिखर पर पहुँच जाना चाहता है जबकि कथित तांत्रिक धर्मगुरू, तंत्रशक्ति और आध्यात्म से शून्य होते हुए भी अपने आप को श्रेष्ठ ही नहीं बल्कि सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक दर्शाकर कल्पित आधार एवं आधारहीन अनुष्ठानों, तंत्र-मंत्र का नाटक दिखाकर चेलों को मुग्ध करता है और जब चेलों के ऊपर किसी प्रकार की छोटी से छोटी भी विपत्ति या समस्या हमला करने का प्रयास करती है तो चेला अपनी डोलती नैया को सम्भालने अपने तथाकथित गुरू की चरण छाँया में पहुँच कर सिद्धि व चमत्कार के सहारे उसका दमन करने का प्रयत्न करता है और इसी के साथ वरदान देने, अभिष्ठ प्राप्त सिद्धि व चमत्कार दिखाने का गोरखधंधा आरम्भ हो जाता है जो पूर्व में चला था, चलता है और शायद नवजागृति आने तक चलता ही रहेगा इतिहास गवाह है अनेक राजनेताओं के पूज्य गुरूश्री सर्वपरिचित धीरेन्द्र ब्रम्हचारी, चन्द्रास्वामी, जगतगुरू कहलाने वाले शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती, आशाराम बापू आदि वांछित परिणाम प्राप्त करने की लिप्सा से जनमानस को प्रभावित करने और अपने पक्ष में वातावरण बनाने, धर्मसत्य का लिबास ओढ़े छल कपट और झूठ का सहारा लेकर जनता के मध्य खूब लच्छेदार भाषण, प्रवचन देते नारे लगाते अपने आप को जनता का सच्चा सेवक, त्यागी, तपस्वी, समाजसेवी, सर्वश्रेष्ठ बताने से पीछे नहीं हटते, जीवन के दोहरे मापदण्ड में जीने वाले इन तथाकथित महापुरूषों का वास्तविक रूप वैसे ही होता है जैसे- “हाँथी के दांँत खाने के और, दिखाने के और।”

 

 

वर्तमान समय में हर कोई श्रेष्ठ शासक, प्रशासक, राजनेता, मंत्री जनता का कर्णधार बनना चाहता है लेकिन,वह इसके लिये समाज सेवा, ज्ञानार्जन विद्या प्राप्त कर सुयोग्य बनने का प्रयत्न नहीं करता बल्कि, वह ठीक इसके विपरीत समाज में शिगूफां फेंक कर कुटिल, कुत्सित चालें चल कर दीन हीन गरीबों के मसीहा कहलाने के लिये वे दोहरे मापदण्डों का इस्तेमाल कर अपनी नैया पार लगाने वाले किसी तारणहार चमत्कारी गुरू की तलाश में भटकते हुए आखिरकार ! ऐसे तथाकथित धर्म गुरूओं के समक्ष उनकी शरण में पहुँच ही जाते है। यह बात छिपी नहीं शिवागन फैक्ट्री के मालिक होते हुए सुन्दर कमसिन नवयुवतियों को अपनी कार में सैर कराते थे यह पूछने पर की आप तो ब्रम्हचारी है, फिर सुन्दर युवतियों को इस तरह अपने साथ में लेकर क्यों चलते है ? तो उत्तर भी यही मिला कि “दुनिया की प्रत्येक सुन्दर वस्तु अत्यंत पसंद है”, चन्द्रास्वामी अपने तांत्रिक प्रभाव से अपने चमत्कार दिखाते हुए गणेश जी को दूध पिलाते है आदि अनेक ऐसे तांत्रिक धर्मगुरू इस देश में इस तर्ज पर अय्याशी कर रहे है कि मूर्खो के रहते बुद्धिमान कभी समाप्त नहीं हो सकते। वर्तमान प्रजातंत्र भीड तंत्र की ओर अग्रसर है सामंती विचारधारा संजोये हुए कथित समाजसेवी नेता जनता पर अपनी हुकूमत चलाने समाज को मूर्ख बनाने और धोखा देकर यह साबित करने में जुटे है कि वास्तव में प्रजातंत्र मूर्खो का शासन है और विभिन्न आयामों सहित इन विषयों पर पुस्तक लिखना समीचिन होगा।

 

 

आज आवश्यकता महसूस की जा रही है कि जनमानस भ्रम की नींद से जागे, सत्य की दिशा में सोचे समय की गति व समाज, देश की परिस्थितियों को पहचाने और देश में शराफत, सज्जनता धर्मसत्य का लिबास ओढे़ अधर्मीयों की पोल खोले, जिसके लिए उन्हें तीक्ष्ण खोज परख बुद्धि व लेखनी का उपयोग करना होगा जिस दिन भी उन ढोंगी भेड़ियों के चेहरों से यह दिखावटी नकाब उतारकर असली चेहरा उजागर करने का उपक्रम आरम्भ हो जाएगा तभी से आस्था की असली खोज प्रारम्भ होगी। आज आवश्यक्ता है सत्यता की, सच, सदैव कड़वे नीम की भाँति होता है जिसे स्वीकारने में कुछ तकलीफ होती है, परन्तु यह भी सच है कि चन्द युगान्तरवादी, क्रियाशील, क्रांतिकारी विचारों के धनी बुद्धिमान सत्य पारखी यदि जनकल्याण समाज सेवा भरी दिशा में अपनी निष्पक्ष निर्भीक कलम चलायें तो निश्चित ही सम्पूर्ण राष्ट्र में एक क्रांतिकारी कदम, क्रांतिकारी परिवर्तन, क्रांतिकारी युग स्थापित हो सके्रगा क्योंकि समाज बदलेगा, राष्ट्रीय विचारधारा बदलेगी और सत्य की झलक का साक्षात्कार होगा। नई सदी के शुभारम्भ में नवचेतना, नवजागरण का शंखनाद होना ही चाहिए, क्योंकि किसी कवि ने सच ही कहा है-

 

 

“कली बेच देंगे, सुमन बेच देंगे

ये सारा का सारा चमन बेच देंगे

कलम के सिपाही अगर सो गये

तो वतन के ये गद्दार ये वतन बेच देंगे”

 

 

इसीलिए आईये! हम सब मिलकर संकल्प लें कि, हम नवजागृति, नवजागरण, क्रांति एवं सत्य के प्रकाश में आस्था की असली खोज करें और देश, राष्ट्र समाज में सच्चे धर्म एवं राष्ट्रप्रेम की भावना भरें।

 

 

विशाल शुक्ल ऊँ

 

 

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