प्रतिस्पद्र्धा से बनती दूरी

 

 

 

समाज पारिवारीक इकाईयों से मिलकर बना वह समुह है जिसमें व्यक्ति अपने दुःख-सुख बांटता है। एक व्यवहार कि डा़ेर से बन्धा होता है जिसमें मित्रता, अपनापन एक-दुसरे के प्रति विष्वास आदि भावना होती है। समाज में रहकर हम रीति-रिवाज अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते है जिससे हमारे मन में प्रतिस्पद्र्धा का भाव उत्पन्न होता है। इन गतिविधियों में भाग लेने से मानसिक के साथ ही सर्वांगींण विकास भी होता है। आज का युग प्रतिस्पद्र्धाजनक युग है। कई बार हम देखते है कि व्यक्ति अपनी प्रतिभा नहीं निकालता जबकी उसमें कोई कला छीपी है। वह गतिविधियों में भाग नहीं लेता और पीछे रह जाता है अपनी कला को अन्दर ही अन्दर खत्म कर देता है। अगर व्यक्ति कोषिष करे और अपनी प्रतिभा को बाहर निकाले गतिविधियों में भाग ले तो वह आसमान छु सकता है अर्थात् लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। अगर सचिन तेन्दुलकर अपनी प्रतिभा नहीं निकालते और अन्दर ही अन्दर उसे खत्म कर देते तो क्या हमें क्रिकेट का भगवान मिलता? यदि लता मंगेषकर अपनी आवाज कि प्रतिभा न निकालती तो क्या हमें इतनी अच्छी आवाज सुनने को मिलती? नहीं! अगर ये अपनी प्रतिभायें नहीं निकालते तो हमें ऐसे दिग्गज नहीं मिलते। हमारे समाज में कई प्रकार कि सांस्कृतिक गतिविधियां होती है हमें उनमें भाग लेकर जीतने का प्रयास करना चाहिये। हम जब भी किसी प्रतियोगिता में भाग लेते है तो हमें ये बात ध्यान में रखनी चाहिये कि हमारे मन में ईष्र्या भाव उत्पन्न न हो बल्कि प्रतिस्पद्र्धा का भाव ही रहे। कई बार हम देखते है कि कुछ लोग सामने वाले प्रतियोगी को क्षति पहुंचाकर जीत हासिल कर लेते है ऐसी जीत, जीत ही नहीं हार होगी। ईमानदारी और मेहनत से जीत प्राप्त करने पर जो सुकुन मिलता है वो बेईमानी से जीतने पर महसुस नहीं होगा। अपने लक्ष्य को ईमानदारी से प्राप्त करने का प्रयास करे। अपनी प्रतिभा को शरम से छिपाये नहीं उसे निकालकर आगे बढ़ने का प्रयास करे ताकि समाज में सम्मान मिल सके। सम्मान पाना बहुत ही गर्व पाना है। समाज से हर पल जुड़े रहे।

 

 

 

-योगेन्द्र जीनगर

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...