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हिन्दी उपन्यास परंपरा में प्रेमचन्द का स्थान

 

 

 

 

हिन्दी में गद्य साहित्य का विकास आधुनिक काल में हुआ था I गद्य में उपन्यास को सर्वप्रथम स्थान होता है I हिन्दी में इस साहित्य धारा का विकास पाश्चात्य साहित्य के प्रभाव से हुआ है I यह पश्चिम आकर्षणीयता ने हमारे उपन्यास विधा को ' कादम्बरी ' और   'दशकुमारचरित' जैसे ग्रन्दों की छत्रछाया से बिछूडकर आज के रूप में सशक्त बना दिया है I

विकास-पथ

हिन्दी उपन्यास यात्रा की अध्ययन की आसानी केलिए निम्न रूप में काल-विभाजन करना  उचित समझता है : -

* 1850 से 1900 तक प्रथम अवस्था I

* 1900 से 1915 तक द्वितीय अवस्था I

* 1915 से 1936 तक त्रितीय अवस्था I

* 1936 से 1947 तक आधुनिक काल-पूर्वाद्ध I

* 1947 से  आज तक आधूनिक काल-उत्तरार्द्ध I

 

प्रथम अवस्था

      हिन्दी उपन्यास के आदि काल में लल्लू लाल, मुंशी सदासुखलाल, सदल मिस्त्र और इंशा अल्लाखाँ के नाम आदर के साथ लिया जाता है I कुछ विद्वानों के मत में  इंशा अल्लाखाँ का ' रानी केतकी की कहानी ' हिन्दी का पहला उपन्यास है I किन्तू आधुनिक उपन्यास के लक्षण लाला श्रीनिवास के ' परीक्षा गुरु ' में पाये जाते है I ' हम्मीरमठ ' का रचिता बाबु भारतेन्दु हरिश्चंद्र , ' सौ अजान एक सुजान' का रचिता पं.बालकृष्ण भट्ट, 'निस्सहाय हिन्दु' का रचिता बाबु रायकृष्ण, 'गजाधर सिंह, राधाकृष्ण दास, राधाचरण गोस्वामी और प्रतापनारायण मिश्र आदि इस समय के श्रेणी पर आते है I बंगला और अंग्रेज़ी उपन्यासों का सफल अनुवाद भी इस समय में हुआ है I

द्वितीय अवस्था

     इस समय के आरंभ में अनेक बंगला उपन्यासों का अनुवाद हिन्दी में किया गया I राधाकृष्ण वर्मा ने अक्बर, माला और चित्तौड चातकी, गोपाल राम गहमरी का भानुमती और चतुर चंचलता, कार्तिक प्रसाद का इला एवं प्रमीला, रामचंद्र वर्मा के छत्रसाल, राधाचरण गोस्वामी के तारा, उदितनारायण के दीपनिर्माण जैसे अनेक अनूदित उपन्यास इस समय हिन्दी में आये I यह उपन्यास का अनुवाद का काल है I

§   मौलिक उपन्यास

     इस काल में चन्द्रकाँत और चन्द्रकाँत संतति जैसे रचना द्वारा देवकीनन्दन खत्री सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार का स्थान पाया है I उनके रचना पढकर अनेक लेखक हिन्दी साहित्य क्षेत्र पर आये, जिनमें गोपालराम गहमरी, हरिकृष्ण जौहर और किशोरीलाल गोस्वामी आदि प्रमुख है I आधुनिक हिन्दी का पहला-( प्रियवास )- महकाव्यकार अयोध्यसिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने ठेठ हिन्दी का ठाठ और अधखिला फूल आदि रचकर मार्ग प्रशस्त किया है I

 तृतीय अवस्था

      यह सामाजिक उपन्यासों का रचना-काल है I विश्वविख्यात उपन्यासकार प्रेमचंद इस समय का नायक है I उनका एक निष्ठा है-आदर्श और थथार्थ रूप में चित्रीकण करना I उन्होंने घटना एवं चरित्र चित्रण को भी अच्छा बल दिया है I उनके कलम से गरीब और मध्यम वर्ग को आवाज़ और धैर्य मिला है I साहित्य में किसान एवं मज़दूर और पददलितों को पहले पहल उन्होंने उनका अर्हता प्रदान कर दिया, उनके नीति-नियमों केलिए समाज-रूपी अदालत में वकालत पेश किया I उन्होंने सेवासदन, रंगभूमि, निर्मला और गोदान जैसे रचना द्वारा उपन्यास का लक्षण और अपना कर्तव्य-बोध को सार्थक साबित किया I जयशंकर प्रसाद ने कंकाल, तितली और अधूरा इरावाती, विश्वभंरनथ शर्मा ' कौशिक ' के भिखारी और माँ, ' उग्र ' के दिल्ली का दलाल, चतुर्सेन शास्त्री के ह्रदय की प्यास आदि अनेक श्रेष्ठ उपन्यास भी इस काल की उपलब्धी है I चित्रलेखा (भगवतीचरण वर्मा), गढकुंडार, संगम और लगन (वृन्दावनलाल वर्मा), टूटा तारा और सरदार (राधिका रमण प्रसाद) आदि भी  इस  समय का गणमान्य लेखक है I

आधुनिक काल

     इस काल का प्रारंभ प्रेमचन्द के आकस्मत् मृत्यु के कारण दु:ख व निराशा से आरंभ होता है I जैनेन्द्रकुमार ने त्यागपत्र, परख, सुनीता, तपोभूमि और कल्याणी आदि उपन्यासें रचकर इस साहित्य रूप को ऊर्जा एवं प्रवाह दिया I प्रेत और छाया, घृणामयी और पर्दे की रानी द्वारा इलाचन्द जोशी ने अपना स्थान व्याप्त कर दिया है I भगवतीशरण वर्मा के चित्रलेखा, आखिरी दाव, तीन वर्ष जैसे रचना मनोवैञानिक है I मनोवैञानिक उपन्यासकार स.ही.वा.अञेय ने नदि के द्वीप, शेखर एक जीवनी, अपने अपने अजनबी, जहाज़ का पंछी आदि प्रस्तुत कर दिया है I यशपाल के देशद्रोही, दादा कामरेड, पार्टी कामरेड, दिव्या, अमिता एवं मनुष्य के रूप मार्क्सवाद पर अधिष्ठित रचनाएँ है I राँघेय राघव के विषाद मठ, सीधे साधे रास्ते, कब तक पुकारुँ के समान, मैला आँचल (फाणिश्वरनाथ रेणु), बाबा बटेरसरनाथ , रतिनाथ की चाची और वरुण के बेटे (नागार्जुन), बूँद और समुद्र (अमृतलाल नागर), सागर लहरें और मनुष्य (उदयशंकर भटट्) , ब्रह्मपुत्र (देवेन्द्र सत्यार्थी), गंगा मैया( भैरव प्रसाद गुप्त), बया का घोंसला (लक्ष्मीनारायण लाल), जल टूटता हुआ, सूखता हुआ तालाब (रामदरश मिस्र), अप्सरा,अलका (निराला) आदि उपन्यास और उपन्यासकार इस काल में मुख्य रूप में आते है I गोविन्दवल्लभ पंत-(वनमाला और मदारी), भवानीप्रसाद वाजपेयी, अनूपलाल मंडल, उपेंद्रनाथ अश्क और मोहनलाल महोता आदि का नाम भी विचाणीय है I

आधुनिक- उत्तरार्द्ध

      इम समय के उपन्यासकारों में अमृतराय (बीज और नागफनी), राजेन्द्र यादव (उखडे हुए लोग), डा.धर्मवीर भारती (गुनाहों का देवता), सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (सोया हुआ जाल), लक्ष्मीकान्त वर्मा- (खाली कुर्सी की आत्मकथा), रघुवीरशरण मिश्र (आग और पानी), अमरकांत, उषाप्रियंवदा, कमलेश्वर (कितने पाकिसतान), रमेशबक्षी, गिरिराजकिशोर, यादवेन्द्रशर्मा चन्द्र, सूर्यबाला, मालती जोशी, शिवानी, कृष्ण सोवती, प्रभा सक्सेना और निरुपमा सेवती, मन्नू भंडारी ( आपका बंटी) आदि उललेखनीय है I रामशरण मिश्र, तमस' का रचिता भीष्म साहनी, रागदरबारी' का रचिता श्रीलाल शुक्ल आदि के नाम भी विशेष उल्लेखनीय है I इस काल में और अनेक उपन्यासकार है, वे इस साहित्य विधा को अग्रसर करने  में अपना योगदान समर्पित  किया है I

हिन्दी उपन्यास धारा आज भी अजस्र चल रही है I खुशी की विषय है कि यह धारा अबाद गति पर आगे जाती है I

प्रेमचन्द

    भारत का सुपुत्र, विश्व साहित्य का ध्रुवतारा, अपने महान् रचना द्वारा जन्म भूमि का नाम संसार के इतिहास में जुडाया गया उपन्यास सम्राट स्वर्गीय प्रेमचन्द सन् 1936 में मिट्टी पर मिल जाने पर भी हमारे जैसे लाखों-करोडों के मन में आज भी ज़िंदा है I उनके समान जीवन की तराई से हिमालय गिरी की सबसे ऊँचाई पर पहूँचकर साहित्य-चक्रवर्ती के अनुपम मुकुट धरण किया गया दूसरा व्यक्ति नहीं है I

प्रेमचन्द- जीवन रूपरेखा

·        जन्म: 8 अक्तूबर 1880

·        मृत्यु: 8 अक्तूबर 1936 में वाराणसी में I

·        जन्म स्थान: लमही, वाराणसी, उत्तर प्रदेश I

·        वास्तविक नाम: धनपतराय श्रीवास्तव I

·        उर्दु में नाम: नवाब राय I

·        हिन्दी में नाम: प्रेमचन्द

·        पिता का नाम: अजाब राय , नौकरी: डाकखाने में मुंशी I

·        माता का नाम: आनन्दी देवी - गृहस्थी I

·        शिक्षा का आरंभ: गाँव की पाठशाला में, उर्दु और फारसी में I

·        मेट्रिक परीक्षा: 1898 में पास किया I

·        नौकरी: 1898 में स्थानीय पाठशाला में अध्यापक का नौकरी I

·        इंटर: 1890 में पास किया I

·        जीवन का मोड: शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद से I

·        माताजी के मृत्यु: प्रेमचन्द के 7 वर्ष के उम्र में I

·        पिताजी के मत्यु: प्रेमचन्द के 14 वर्ष के उम्र में I

·        जीवन संघर्ष का शुरुआत: विमाता के आगमन और पिताजी के मृत्यु के कारुण

·        पहला विवाह: प्रेमचन्द के 15 वर्ष की अवस्था मे, परंपरागत रीति में संपन्न् हआ यह विवाह बडी दिन तक नहीं रही I

·        प्रभाव: स्वामी दयनंद के आर्य समाज की ओर आकृष्ट हुए I विधवा विवाह का समर्थक I

·        दूसरा विवाह: 1906 में शिवरानी देवी से I

·        सन्तान: दो बेटे और एक बेटी :--

                .श्रीपतराय

                .अमृतराय

                .कमलादेवी श्रीवास्तव

·        पहली प्रकाशित रचना: 1907 में, उर्दु भाषा में- 'सोजेवतन' (कहानी       संग्रह),जिनका अर्थ है- देश का दर्द I इस पुस्तक को सन् 1910 में हम्मीरपुर जिला कलक्टर ने ' जनता को भडकाने ' का आरोप लगाकर सारी प्रतियाँ जब्त कर दिया I

·        लिखने का प्रेरणा: उर्दु के ज़माना पत्र का संपादक और प्रेमचन्द का मित्र मुंशी               दयानारायण निगम के उपदेश I

·        आरंभकालीन रचना का प्रकाशन: ज़माना (उर्दु) पत्रिका में I

·   जीवन में अपूर्णता: बीमारी के कारण " मंगलसूत्र " नामक उपन्यास अधूरा छोड   दिया I (बाद में प्रेमचन्द के प्रिय पुत्र श्री. अमृताय ने इस  उपन्यास को पूरा कर किया था I)

·        विशेषण: उपन्यास सम्राट, हिन्दी कहानी के पितामह, दु:खियों-पीडितों और पद दलितों को पहले पहल हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित किया गया साधारण लोगों के वकील I

·        पहली हिन्दी कहानी: 1915 में 'सरस्वती' में प्रकाशित- 'सौत' I

·        अंतिम कहानी: 1936 में प्रकाशित- कफन I

·        कहानी संहग्र: करीब 300 से अधिक कहानियाँ, मानसरोवर आठ भाग में संग्रहित (इस संग्रह का प्रकाशन उनके मृत्यु के बाद हुआ था) I

·        उपन्यास: 15 उपन्यास के रचिता- कर्मभूमि, रंगभूमि, गोदान आदि मुख्य उपन्यास । गोदान भारतीय जन जीवन का परिश्च्छेद, कृषक इतिहास, महाकाव्योचित गद्य रचना माना जाता है I

·        प्रकाशन और संपादन: जागरण एवं मर्यादा के प्रकाशक और संपादक I

·        संघाटन: 1936 में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखकों के सम्मेलन लखनऊ पर बुलाये गये और इसमें अध्यक्ष पद पर बैठकर उन्हें नयी पथ खोलकर दिया I

·        सिनेमा से संबंध: 1934 में ' मज़दूर ' नामक सिनेमा केलिए कहानी लिखा I फिर सिनेमा जगत् का संबंध तोड डाला I

·        अनुवाद: प्रेमचन्द कृतियों के अनुवाद संसार के हर प्रमुख भाषाओं में किया गया है I जिसमें रूसी, अंग्रेज़ी और जर्मन आदि मुख्य है I

·        सभी रचनाओं के संख्या: पंद्रह उपन्यास, तीन सौ से अधिक कहानियाँ, तीन नाटक, दस अनुवाद ग्रन्द, सात बाल साहित्य कृतियाँ, संपादकीय, लेख, भाषण, भूमिका आदि I

v  प्रधान उपन्यास और रचना वर्ष:

 

·                 प्रतिञा-1906 में प्रकाशित, इसमें विधवा की मामला अंकित किया हैI

·              सेवासदन-1918 में ,इस उपन्यास के द्वारा प्रेमचन्द ने हिन्दी उपन्यास जगत में पदार्पण किया I

·              प्रेमाश्रम -1922 में प्रकाशित, किसान जीवन पर आधारित उपन्यास है I

·              वरदान- पारिवारिक जीवन और प्रेम की असफलताएँ चित्रित करनेवाला उपन्यास I

·              रंगभूमि-1925 में प्रकाशित इस उपन्यास में अन्धा भिखारी सूरदास का   कहानी चित्रित है I

·              कायाकल्प-1926 में प्रकाशित उपन्यास I

·              निर्मला- 1927 में प्रकाशित उपन्यास I

·                 गबन- 1931 में प्रकाशित उपन्यास I

·                 कर्मभूमि- 1932 में प्रकाशित उपन्यास I

·              गोदान-1936 में प्रकाशित आलोचनात्मक, यथार्थवादी उपन्यासI जिसमें सामन्तवाद तथा पुँजिवाद के जाल पर पडे हुए होरी  नामक

दरिद्र-निस्सहाय किसान का संकटपूर्ण जीवन का चित्रीकरण                                      अत्यन्त भव्य रूप में महाकाव्योचित ढंग पर किया गया है

v    कहानी:

·        मानसरोवर आठ भाग

v    नाटक:

·        संग्राम-1923 में प्रकाशित नाटक I

·        कर्बल-1924 में प्रकाशित नाटक I

·           प्रेम की वेदी-1933 में प्रकाशित नाटक I                   

 

गोदान उपन्यास प्रस्तुत करनेवाली

मुख्य समस्याएँ और समाधानों में कुछ

 

·        निम्न् जाति के लोगों के जीवन के आगे उठने वाले संकटपूर्ण समस्याओं एवं विडम्बनाओं की वास्तविक और दर्दनाक अनावरणI

·        काल और राष्ट्र का यथास्थिति चित्रीकरण I

·        अन्धविश्वास के सहारे धनिक, दरिद्र के ऊपर करने वाले अत्याचार

        तथा जातीय असमत्व का भयानक वर्णन I

·        ज़मीन्दारों की ओर से किसान सहने वाले क्रूरताएँ I

·        स्त्रियों के ऊपर पुरुष वर्ग का याँत्रिक व्यवहार और उसकी जीवन की दुर्बलताएँ

·        पारिवारिक और वैवाहिक जीवन की तरह तरह की समस्याएँ I

·        औद्धयोगिकरण के कारण समाज और जीवन के सामने उठनेवाले असंख्य संकीर्णताएँ  

·        धर्म, जाति और ईश्वर के नाम पर करने वाले अन्धविश्वासों का दुष्परिणाम I

·        दुराचारों के भयानकता का आविष्कार I

·        ग्रामीण और नगरवासियों के बीच का अन्तराल I जिनमें गाँववालों का नरकमय और नगरवासियों के सुखमयता का आविष्कार I

·        शिक्षा के अभाव के कारण उठने वाले समस्याएँ I

·        ग्रामीण किसान सामना करने वाला ऋण और उससे मुक्ति पाने का उनका निरन्तर संघर्ष एवं पराजितों का असफल या  मोहभंग जीवन का वर्णन I

·        धनिक- ज़मीन्दार, दरिद्र को मनुष्य के रूप में न देखकर जानवर के रूप में देखने का क्रूर मनोभाव और उससे उपजनेवाली तरह तरह की समस्याएँ I

·        कॉलमार्क्स का वर्ग संघर्ष-साम्यवाद सिद्धाँत के प्रति उपन्यासकार का अनुकूल मनोभावों के प्रयोग I

·        कहीं कहीं युग सृष्टा परमाराध्य राष्ट्रपिता गाँधीजी के अहिंसावाद का मुख्य आदर्श- सहन शक्ति रीति का वर्णन I

·        धनिक-सबलों के करतूतों के कारण दुर्बल बन गये निम्न जाति के लोगों की सभी प्रकार की शिथिलताएँ मार्क्सवादी-मनोवैञानिकता के साथ का चित्रीकरण I

 

LEMBODHARAN PILLAI.B

RESEARCH SCHOLAR,

UNDER THE GUIDELINES OF

PROF. (Dr.) K.P.PADMAVATHI AMMA,

TAMIL NADU, SOUTH INDIA

 

 

 

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