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पुस्तक संस्कृति बढाने में आज साहित्यकार की भूमिका

 

श्री सुनील कुमार परीट

 

 

" कल -आज -कल हो कुछ भी
पुस्तक महिमा न कभी कम हुई।
पुस्तक बन गये साहित्य सागर
बहती चली है न कभी थम गई॥ "

 


अरबी कहावत है कि, ’पुस्तक जेब में रखा हुआ बगीचा है।’ पुस्तक की महता बहुत बडी है, पुस्तकें कोई गुरु से कम नहीं होते। पुस्तकें ज्ञान का भंडार होते हैं। यह देखा जा रहा है प्राचीन से भी अधिक मात्रा में आज पुस्तके लिखी जा रही हैं। पुस्तके हर समय हमें एक ज्ञान देते हैं, हमसफर बने रहते हैं। पुस्तकें अनुभूति के आगर होते हैं, पुस्तकों को सच्चे साथी के रुप में स्वीकार करेंगे तो वे संकट विमोचन का मर्ग बन जाते हैं। इसलिए कहा जाता है- “A good book on your shelf is a friend that turns its back on you and remains a friend.”

 


परंतु वर्तमान समय में यह सोचनेवाली बात है- क्या आज भी एक पुस्तक बगीचे के समान है...? आधुनिक पुस्तकों की जो संस्कृति बन पडी है वह पूर्ण रुप से बदली है। जी हाँ मानना चाहिए कि प्राचीन काल की पुस्तके संस्कृति-धार्मिक धरोहर पर लिखी जाती थी। वर्तमान समय में पुस्तकों में मानवीय मूल्य, सांस्कृतिक-धार्मिक मूल्य कम दिखाई पड रहे हैं। आज मानव ने चाँद ग्रह से मंगल ग्रह पर पाँव रखा है, उसकी बुध्दिशक्ति बहुत बढ गयी है, पर एक शोचनीय बात है कि, वैचारिक शक्ति मात्र नहीं बढी। बढी है तो भी विनाश की ओर। ’कामायनी’ जैसी कालजयी पुस्तक संस्कृति इस वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नहीं रही। साहित्य जगत में पुस्तकों की संख्या मात्र सागर भाँति बढ रहे हैं। पाठक मात्र इस निरुपयुक्त सागर रुपी साहित्य जगत से दूर भागती दिखाई दे रहे हैं। तो जो साहित्य किसी काम का न हो तो ऐसे साहित्य से तात्पर्य भी न रह जायेगा। जैसे कबीर कहते हैं-

 


“ बडा भाया तो क्या भया , जैसे पेड खजूर।
पंथी को छाया नहीं , फल लागे अति दूर॥ "

 


कोई भी पूर्ण रुप से नहीं कह सकता कि सभी पुस्तके अच्छी होती हैं या बूरी होती है। कुछ पुस्तकों को वाद-विवादों में घेरकर उन्हें निकृष्ट के चौकट में भी नहीं डाल सकते। बेकन जी का कहना है कि, “ कुछ पुस्तकें चकने के लिए हैं, कुछ निगले जाने के लिए और कुछ थोडी-सी चबाने जाने और हज्म किये जाने के लिए।" तो क्या इस वर्तमान समय में पुस्तकों की संस्कृति ऐसी है...? यानि पुस्तके मनुष्य के हर कदम पर साथ देनी वाहिए। पुस्तके मनुष्य को हर समस्या-परिहार के लिए मार्गदर्शन करनी चाहिए। परंतु इस वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसा काम कम हो रहा है। आज लेखक-कवि, साहित्यकार कदम-कदम पर मिल रहे हैं, पर प्राचीन काल-सा श्रेष्ट साहित्य नहीं मिल रहा है। और इसका मूल कारण साहित्य भी वैज्ञानिक प्रभाव से घिरा हुआ है। वर्तमान युग को वैज्ञानिक युग कहा जाता है। तो साहित्य का ज्यादातर सृजन भी वैज्ञानिक स्तर पर हो रहा है। वैज्ञानिक प्रभाव से लिखी गयी पुस्तकें मानव मूल्यों को पीछे छोड आती है।

 


’सत्यं-शिवं-सुंदरं’ यह साहित्य का परम तत्व है, साहित्य में सत्यता, ईश्वरत्व, सौंदर्य भाव होनी ही चाहिए तभी वह साहित्य कहलायेगा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सहित्य की या पुस्तकों की ऐसी स्थिति बनती जा रही है कि इन्ह तीनों में से एक भी तत्व पाना मुश्किल हुआ है। और शायद यही एक कारण है इस वर्तमान समय में पाठक पुस्तकों के प्रति आकर्षित नहीं हो रहा है। इन्ह पुस्तको में वेद-पुराणों के मूल्य या तत्व नहीं रहे।

 


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पुस्तकों की संस्कृति ऐसी बनी है कि उसमें साहित्य के तत्व कम और वैयक्तिक तत्व ज्यादा होते हैं। लोकमंगल के लिए पुस्तकों का सृजन नहीं हो रहा है। इस वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सहित्यकार अपनी साहित्यिक पुस्तकों की संख्या बढाने के लिए लगातर पुस्तके लिखी जा रही हैं। परंतु किसी तत्व या मूल्य की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। इसलिए ऐसी संस्कृति को बदलनी चाहिए। साहित्य सृजन या पुस्तकों का सृजन साहित्यिक तत्वों के आधार पर, लोकमंगल तत्व के आधार पर होनी चाहिए। तभी पुस्तकों में एक अच्छी संस्कृति उभर आयेगी। तभी एक सच्चा साहित्यकार सामने उभर आ सकता है, तभी पाठक पुस्तकों के प्रति आकृष्ठ हो सकते हैं!

 

 

साहित्य का उद्देश्य प्रारंभ से लेकर ही स्वान्त सुखाय या राजा-महाराजा के लिए लिखना ही माना जाता है। पर इस आधुनिक दौर में साहित्य का उद्देश्य पूर्ण रुप से बदल गया है नहीं बदल दिया गया है, स्वार्थपरता के लिए साहित्य का सृजन हो रहा है।

 

परंतु प्रेमचंद जी के पीछे हिन्दी साहित्य ऐसे महान साहित्यकार की खोज में लगी है उसके हिसाब से कोई नहीं खरा उतरा। साहित्य का सृजन दिमाग से नहीं बल्कि मन से होनी चाहिए। साहित्य का सृजन चार दीवारों के बीच बैठकर नहीं होती बल्कि खुले आसमान की अनुभूति होती है।

 

 

साहित्य ऐसा हो जिसमें हमारी सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि झलकती हो। मानवीय मूल्यों को, नैतिक मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने सोद्देश्य साहित्य का हो। अंत में इस आशय के साथ-

 


" साहित्य ही है निज संपत्ति , जिससे भरा हो मन का भंडार घर।
जबान का आभूषण बना लो , जो संसार को रख देगी सुधार कर॥ "

 

 

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