www.swargvibha.in






 

 

व्यक्तित्व एवं कृतित्व के आईने में- श्री आर॰ पी॰ शर्मा

 

r p sharma


एक दस्तावेज़ी हैसियत का परिचय: श्री आर॰ पी॰ शर्मा ‘महरिष’ ग़ज़ल संसार के जाने माने छंद-शस्त्र के हस्ताक्षर हैं। उनका रुझान लंबे अरसे से ग़ज़ल लेखन की ओर हुआ और वे इस दिशा में निरंतर गति की ओर अग्रसर है। उनकी रचनधर्मिता पग-पग मुखर है और वही उनकी शख्सियत को एक अनूठी बुलंदी पर पहुँचाती है। चार दशक से महरिष जी इस ग़ज़ल साधना में जुटे हुए है। वे एक ऐसे सिपाही है जिनका जीवन काल ग़ज़लकारों के मार्गदर्शन देने के लिए व्यतीत हुआ है, छंद पर उनके विमर्श, प्रस्तावनाएँ, समीक्षाएं अनेक पत्रिकाओं में देखने और पढ़ने को मिलतीं हैं ।


गुफ्तगू (जनवरी-मार्च २००५)में अदबी खबरों के अंतरगत उनके सुपुत्र डा॰ रमाकांत शर्मा द्वारा पेश की गई उपाधि की सूचना काव्य शोध संस्थान द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में यूं थी- “मुंबई के प्रख़्यात ग़ज़ल-शिल्पकार और ग़ज़लकार श्री आर॰ पी॰ शर्मा ‘महरिष’ को माननीय श्री विष्णु प्रभाकर और श्री कमलेश्वर के हाथों "पिंगलाचार्य" की उपाधि से विभूषित किया गया। इस अवसर पर उन्हें काव्य शोध संस्थान ने शाल और मनमोहन गोसाई जी की पावन स्मृति में ११००० हजा़र रुपये देकर पुरस्कृत किया गया। समारोह में डा॰ सादिका नवाब, डा॰ कमाल सिद्दिकी, शिव कुमार मिश्र तथा मख़मूर सईदी सहित हिंदी और ऊर्दू साहित्य के जाने माने साहित्यकार उपस्थित थे।“


ग़ज़ल लेखन का मार्ग सुगम और प्रशस्त करने के लिए ग़ज़ल, बहर, छंद-शास्त्र पर उन्होने कई उपयोगी पुस्तकें लिखीं हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकें इस प्रकार हैं १. हिंदी गज़ल संरचना-एक परिचय (सन् १९८४ में उनके द्वारा इल्मे- अरूज़ (उर्दू छंद-शास्त्र) का सर्वप्रथम हिन्दी में रूपांतर, २. गज़ल-निर्देशिका, ३.गज़ल-विधा, ४. गज़ल-लेखन कला, ५. व्यहवारिक छंद-शास्त्र (पिंगल और इल्मे- अरूज़ के तुलनात्मक विश्लेषण सहित), ६. नागफ़नियों ने सजाईं महफिलें (ग़ज़ल-संग्रह), ७. गज़ल और गज़ल की तकनीक. 8॰ उनकी नवनीतम "मेरी नज़र में" (2009), जिसमें उनके द्वारा लिखी गईँ 31 कृतियाँ शामिल हैं, जो अपने आप में दस्तावेज़ी हैसियत एवं ऐतिहासिक महत्व रखती हैं, जैसे: प्रमिला भारती का (गीत-संग्रह) “नदी संवेदनाओं की”। जाने माने कवि श्रेष्ठ श्री किशोर कर्वे के संघर्षपूर्ण काल में अर्जित खटे-मीठे अनुभवों के आधार पर लिखित कृति “अमृत बरसे”, श्री अनिल गुप्ता ‘अनिल’ की “उज्जयनी” जिसके बारे में महरिष जी लिखते हैं “इसमें ऐतिहासिल एवं संस्कृतिक नगर उज्जयनी के प्राचीन इतिहास तथा सिंहस्थ महात्म्य के अतिरिक्त उसकी तमाम भूगौलिक स्थितियाँ और कीर्ति पुरुषों, धार्मिक महत्वताओं का आत्म विवेदन स्वरूप पुस्तक की संपूर्णता बना रहा है।“ स्वामी श्री श्यामनन्द जी सरस्वती पर आलेखों की कृति “ आज का कबीर” पर महरिष जी उन्हें दोहाकार, ग़ज़लकार, व रुबाईकार के आचार्या के अलंकारों से विभूषित करते हुए निर्णयात्मक रूप से लिखते हैं-इसीलिए स्वामी जी को “आधुनिक कबीर” कहा गया है


अपने नज़रिये से स्थिति को पहचानना, परखना और उस पर टिपणी करना तब ही सार्थक होता है जब उसमें रचनाकार के लिखने के समय की स्थिति को भी ध्यान में रखा जाता है, कभी कभी तो रचनाकर की मनोस्थिति के साथ हमकदम होकर सोचना पड़ता है। डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद मोदी की प्रस्तुति “हक़ीक़त-अंदाजे-बयान” पर कलम चलाते हुए महरिष जी ने अपने ग़ज़ल विधा के तजुरबात को समेटते हुए लिखा है- “डॉ॰ मोदी की ग़ज़लें चिंतन और चिंता की विशुद्ध उपज है, जिन्हें उन्होने सरल, सरस, तथा सुबोध शब्द दिये हैं, जिनमें निमित भावार्थ हृदय को छूते हैं, कचोटते हैं, और गुदगुदाते हैं। उनकी ग़ज़लें स्तरीय, उद्देश्यपूर्ण एवं समय की मांग के अनूरूप हैं ”। महरिष जी के हृदय की सरलता और सदभावना भरी भाषा ही उनका असली पारिचय है जो उनके व्यक्तित्व के साथ जुड़ा हुआ है।


यह संग्रह “मेरी नज़र में” एक अनुभूति बनकर सामने आया है, जिसे पढ़ने वालों को एक सुअवसर मिलेगा कि कैसे महरिष जी सरलता और सादगी से अपनी पारखी नज़र से मूल्यांकन करते हुए अमूल्य राय के साथ-साथ सुझाव भी देते है. उनका व्यक्तित्व एक व्यक्ति का नहीं, वे अपने आप में एक संस्था हैं, एक सजीव अभियान जो ग़ज़ल को दशा और दिशा देते आ रहे हैं।


यह मेरा सौभाग्य रहा है कि मेरे ग़ज़ल लेखन के प्रयास का पहला पड़ाव “चराग़े‍-दिल” श्री 'महरिष' गुंजार समिति' के आंगन में लोकार्पण उन्ही के मुबारक हाथों से हुआ. मेरे इस संग्रह में उनकी लिखी प्रस्तावना के रूप में अगाज़ी हस्ताक्षर शब्द ग़ज़ल को परिभाषित करते हुए - "ग़ज़ल उर्दू साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसका जादू आजकल सबको सम्मोहित किए हुए है. ग़ज़ल ने करोड़ों दिलों की धड़कनों को स्वर दिया है. इस विध्या में सचमुच ऐसा कुछ है जो आज यह अनगिनत होंठों की थरथराहट और लेखनी की चाहत बन गई है. ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है, ताकि हम शब्दों को तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियाँ या मिसरों में अपने भावों, उद्गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को 'मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूंद में सागर के समान समेट कर भर सकें."


“ग़ज़ल-सृजन” महरिष जी की प्रकाशन श्रंखला में नवनीतम पेशकश 2012 में मंजरे-आम पर अपने स्रजनशील अनुभूतियों के साथ आई हैं। इसमें ग़ज़ल के बाहरी और आंतरिक स्वरूप, काफ़िया या रदीफ़, कथ्य एवं शिल्प तथा ग़ज़ल की अन्य बारीकियों की विस्तार से चर्चा की गई है, तथा पर्याप्त संख्या में प्रचलित बहरों के अंतर्गत तख़्ती के उदाहरण दिये गए हैं। इसकी अतिरिक्त इस पुस्तक में अन्य काव्य विधाओ, रुबाई, हाइकु रुबाई, महिया, महिया ग़ज़ल, तज़ामीन, दोहा, जनक छंद तथा ग़ज़लों के लिए उपयुक्त छंदों और ग़ज़ल से संबन्धित अन्य सुरुचिपूर्ण सामाग्री का भी समावेश है। ग़ज़लकारों के लिए यह कृति एक वरदान स्वरूप है, जो पग-पग उनका मार्गदर्शक करेगी।


ग़ज़ल विधा की बुनियाद, छंद-शास्त्र (इलमे-अरूज़) की अनगिनत बारीकियों पर बना एक भव्य भवन है जिसमें कवि अपने मनोभाव, उद्गार, विचार, दुख-दर्द, अनुभव तथा अपनी अनुभूतियां सजाता है। एक अनुशासन का दायरा होता है जिस पर उसका विस्तार अनंत की ओर खुलता है । उनके प्रकाशित संग्रह “ग़ज़ल लेखन कला” संग्रह में ग़ज़ल के बारे में श्री ज्ञान प्रकाश विवेक जी का कथन शामिल है जो कहता है- "ग़ज़ल की बुनियादी शर्त उसका शिल्प है एक अनगढ़ ग़ज़ल पत्थर की तरह होती है. संगतराश जिस प्रकार छेनी और हथोड़ी से पत्थर में जीवंतता ला देता है और तराशे गये पत्थर में उसका एहसास, उसकी अनुभूतियाँ और उसकी अभिव्यक्ति छुपी होती है, वो सब सजीव सी लगती हैं। इसी प्रकार ‌तराशी हुई ग़ज़ल का तराशा हुआ शेर, सिर्फ दो मिसरों का मिलाप नहीं होता, न उक्ति होती है, न सुक्ति, अपितू वह एक आकाश होता है- अनुभूतियों का आकाश ! ग़ज़ल का एक एक शेर कहानी होता है."


नयी ग़ज़ल, गुफ्तगू और अनेक मय्यारी पत्रिकाओं में उनके छंद को लेकर सिलसिलेवार लेख छपते रहते हैं। अपने ज्ञान को वे आम जन तक पहुँचने का कार्य कुछ ऐसे कर रहे हैं, जैसे एक मौन साधक अपने इष्ट को साधना समर्पित कर रहा हो। उनकी सरल लेखनी उनकी पहचान बनकर आम आदमी के दिल में अपना स्थान बना रही है। जयहिंद

 

 


देवी नागरानी

 


पता; ९-डी॰ कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/ ३३ रोड, बांद्रा , मुंबई ४०००५० फ़ोन: 9987938358

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...