सामा चकेबा

 

 

बहनों का प्यार अपने भाईयों के लिए अथाह समुद्र की भांति है , जिसे वह आदि काल से भूखे प्यासे रह कर समय समय पर प्रकट भी करती रही है । रक्षा बंधन ,भैया दूज के अलावा भी बहुत से पर्व हैं जो अपनी प्रांतीयता के दायरे में सिमट कर रह गए हैं ।इसी तरह का एक पर्व है सामा चकेबा,जो मिथिला में प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है ।इसके पीछे एक पौराणिक कथा है ।कहा गया है कि कृष्ण की पुत्री श्यामा{सामा} को पशु पक्षी ,पेड़ पौधों से खेलने का बहुत शौक था ,इसलिए वह अक्सर जंगल में चली जाती थी ।एक दुष्ट व्यक्ति उसे नित दिन वहाँ जाते हुए देखता था ।उसने उस पर मिथ्या चारित्रिक आरोप लगा कर राजा से शिकायत कर दिया । राजा कृष्ण आग बबूला हो उठे , उन्होने बिना छान बिन किए पुत्री को पक्षी बनने का शाप दे दिया । जब भाई को यह पता चला ,उसने काफी मशक्कत और त्याग से पिता से सच्चाई बताकर ,बहन को शाप मुक्त करवाया ।
शरद काल में जब हिमालय पर बर्फ जमने लगता है ,प्रवासी पक्षी वहाँ से पलायन कर समतल भूमि के समशीतोष्ण भाग में आते हैं ,तब यह पर्व मनाया जाता है ।
शारदीय छठ के परना दिन से ,अर्थात कार्तिक मास के सातवे दिन से ,नदी ,तालाब,या खेत कहीं से मिट्टी लाकर सामा और चकेबा की मूर्ति का निर्माण किया जाता है ।अन्य मूर्तियाँ भी मृन्मयी होती हैं ,उन्हें रंग बिरंगे रंगों से,कपड़ों से सजाया जाता है ।
वास्तव मे यह उस काल का प्रतिनिधित्व करता है ,जब जीवन बसर करने का एक मात्र आधार कृषि था । लोग संयुक्त परिवार में रहते थे । महिलाएं रात में घर का सब काम निबटा कर ,भोजन भात समाप्त कर बांस की बड़ी टोकरी या उथला च्ंगेरा में मिट्टी की सारी मूर्तियाँ सजा कर , मनोरंजन के लिए एक से बढ़ कर एक गीत गाती ,फिर उसे अपने सिर पर रख कर बहने ,जिनमें कुंवारी कन्याएँ ,और शादीशुदा महिलाएं ,बुजुर्ग भी होती हैं , जुते हुए खेत,खरिहान ,परती आदि में उन्हें चराने के लिए ले जाती हैं ।
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के सातवें दिन सामा अपने मायके आती है,पति साथ में उसे लिवाने के लिए आते हैं । पूरी कथा का पुनरावृति होता है । कार्तिक पूर्णिमा को सामा की विदाई होती है ,एक खेल जैसा आयोजन होता है , ।बेटी विदा हो रही है ,सखी सहेली भँवरा से कहती है “अरे भँवरा ,अरे भँवरा ,सामा जाईछे सासुर ,किछ कपड़ो दहि रे भँवरा” चूड़ा दही चीनी खिला कर बांस के पथिया में बैठा कर उसे खेत ,खलिहान में लाया जाता है । ,बृंदावन मे आग लगती है ,जिसे वीर ,बहादुर भाई बुझाता है ,उस आग में चुगली करने वाले चुगला ,का मुंह झरकाया जाता है ,उसके लिए बहुत से अप शगुन कहे जाते हैं । भाईयों को अनंत आशीष दी जाती है ,युग युग तक जीवित रहने की कामना की जाती है । पनदरह दिन तक भाव विभोर होकर खेला गया इस खेल को आखिर में भाई अपने ठेहुने से सभी मूर्तियाँ फोड़ देता है । एक मैना जिसे बाटो बहिन कहा जाता है ,उसे रास्ते पर छोड़ दिया जाता है जो अपने भाई का बाट जोहने लगती है ।
सामा पक्षी बहन का और चकेवा पक्षी पति का प्रतिनिधित्व करता है । इसमें बहुत सारे और भी पात्र होते हैं ,जैसे सतभइयाँ {भाई } झाँझी कुत्ता ,खचबचिया,चुगला ,ढोलिया ,बजनिया ,बन तीतिर ,पंडित ,बृंदाबन आदि आदि की मूर्तियाँ ,जिसे महिलाएं ,बच्चियाँ बड़े मनोयोग से बनाती ,सजाती रहती हैं । अब तो ये मूर्तियाँ बाज़ारों में भी बिकती नजर आने लगी हैं ।
इस कथा या पर्व का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्व है । पिता भी बेटी की मनोदशा को समझने में भूल कर सकता है ,लेकिन भाई नहीं ।वास्तव में वह बहन का सबसे बड़ा हितचिंतक होता है ।समान पीढ़ी का भाई अपनी बहन की मनोभावना को अच्छी तरह मससूस कर सकता है । साथ ही ,उस जमाने में बेटियों को संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था ।इस लिए भी भाईयों का यह नैतिक दायित्व था कि वह बहनों के सुख दुख में भागी बने ।उसकी परेशानियों को दूर करे ।उसकी छोटी छोटी अभिलाषा की पूर्ति करे । भाई ,बहनों के लिए एक महत्व पूर्ण आधार स्तम्भ के रूप में काम करता था । इनके सौहार्द पूर्ण रिश्तों के बीच कभी कोई कटुता आती तो उसका कारण भाभियाँ ही होती । इस सनातन सत्य को भी यहाँ लोकगीतों के माध्यम से बखूबी उभारा गया है ।बेटियाँ उपेक्षित नहीं ,वे अपने भाई ,पिता को कभी नहीं भूलती ,तो वे भी उसकी मदद मे सदा तत्पर रहते हैं । बहन अपने भाभी से कहती है “छूटी जैते माय बाप क राज छोड़ब तोहर आँगन हे”। लेकिन अपने खून पर अटूट विश्वास रखती है कि भाई तो उसकी एक बुलाहट पर दौड़ा चला आयेगा ।
यह पर्यावरण संरक्षण का भी प्रतीक है । बहनें गाती हैं “गाम के अधिकारी तोहें बड़का भैया हो ,पाँच दस पोखरा खुनाय,चम्पा फूल लगा दीह हो ” अर्थात पानी की किल्लत न हो ,पेड़ पौधों की कमी न हो,क्योंकि घर संसार चलाने के लिए दूर दराज से पानी भर भर उन्हें ही लाना होगा ,या फिर पानी के बिना खेती बारी कैसे होगी ,? यही तो ज़िदगी का सार तत्व है ।
वास्तव में यह एक अत्यंत ही भावुक करने वाला ,मार्मिक लोक पर्व है ।हालाकि बदलते समय के साथ इसका चलन धीमा पड़ता जा रहा है ,आधुनिक पीढ़ी इसे लगभग भूलती जा रही है , यह एक अफसोस जनक प्रसंग है ।फिर भी बहुत से जागरूक और समाज प्रेमी लोग इसे बचाए रखने का भरसक प्रयास भी कर रहे हैं । इसे नृत्य नाटिका में भी प्रस्तुत किया जाता है ।यह भी मिथिला का एक गौरव है ।

 

 


॥ डा0 कामिनी कामायनी ॥

 

 

 

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