संवेदना

 

 

संवेदना माने किसी परपीडा कि अनुभूति अपने हृदय मे करना, किसी दुसरे को कष्ट मे देखकर उसके दुख से अपने मन का स्वतः ही द्रवित हो जाना किसी की वेदना को देखकर,सुनकर, जानकर उसी प्रकार की वेदना का स्वअनुभव अर्थात सहानुभूति।किन्तु यहा ’’पर’’ या दुसरे का मतलब सिर्फ अपने लोगो या मनुष्य मात्र समझना सोच की संकीर्णता है। यहां इसका अर्थ धरती पर बसे सम्पूर्ण जीवो से है। दया से ही सहानुभूति का उदय होता है जिस ह्दय मे दया का भाव, प्रेम का भाव नही है वह संवेदना को कभी समझ नही सकता। इन सबका मिला जुला एक उदाहरण हम भगवान बुद्व के जीवन मे देख सकते है। देवदत्त के बाणेा के शिकार उस हंस के लिए उनके मन मे कितनी दया है कितनी सहानुभूति है। यु तो हमदर्दी का दिखावा करना बेहद आसान काम है और ज्यादातर लोग वही करते है पर तीर से आहत एक पंक्षी के लिए एक योद्वा राजकुमार की आंखो मे भरे अश्रु सच्ची सहानुभूति के प्रमाण है।इसी क्रम मे महान राजा शिवि का उदाहरण भी दृष्टव्य है,जो एक कबुतर कि रक्षा के लिए खुद बाज का भोजन बनना स्वीकार कर लेते है। वास्तव मे संवेदना जब भावना से ब्यवहार लोक मे उतरती है तब यह परोपकार का रूप धारण कर लेती है।

 

जब प्रश्न यह है कि संवेदना यह एक स्वस्थ समाज के लिए कितनी आवश्यक है? तो इसका उत्तर और प्रतिप्रश्न यही है कि किसी विशाल भवन के लिए निंव कितनी आवश्यक है! वस्तुतः यही वह वरदान है जिससे सृष्टि के तमाम दोपायो चौपायो और अनगीनत जीवो के बीच से मनुष्य का उदय हुआ उसका संवदनशील होना उसका विचारशील होना उसमे भावनाओ का विकसित होना ही मानवता,इन्सानियत कि उन्नति का कारक बना। यही वो कारक भी है जिसके चलते रिश्तो-नातो कुटुम्ब गांव समाज जैसी ब्यवस्थाओ का विकास हुआ और मनुष्य सृष्टिकर्ता की सबसे श्रेष्ठतम रचना माना गया किन्तु आधुनिक ब्यक्ति और समाज दिन-प्रतिदिन मानवीय मुल्येा को खो रहे है तकनीक कि 3जी 4जी रफतार के दौर मे किसी के पास किसी के लिए फुर्सत ही नही है । आलम यह है कि हर चीज महज औपचारिकता बनकर रह गई है। आज कि दुनिया दिखावे मे बहुत विश्वास रखती है, किन्तु दिखावटी संवेदनशीलता या स्वार्थ से प्रेरित संवेदना किसी के लिए सानत्वना का मरहम नही बन सकती न ही मानवता कि दृष्टि मे इसका कोई अर्थ होता है, लेकिन इस तरह की सवेंदना से फायदा उठाने का काम हमारे राजनितिक लोग बडी अच्छी तरह जानते है। आज सडक पर हुए किसी हादसे के हम सायद दर्शक हो सकते है पर मददगार नही, ठसाठस बस मे मिली सीट हम किसी अपाहिज या कांपते बुर्जुग के लिए नही छोड सकते। अपनी ही गली मे बाईक से पिल्ले को रौदकर निकल जाते है और गली मे भी किसी ब्यक्ति को भी कोई एतराज नही होता है। ऐ जानते हुए भी की पडोस मे कोई बीमार है पर हमने साउंड की आवाज भी करने के लिए तैयार नही होते है, हम इतने असंवेदनशील हो चुके है कि रास्ते मे मिले किसी अपाहिज या अन्धे की मदद करने के बजाय उसे भी ढकेलते हुए आगे बढ जाते है। असंवेदनशीलता का विभत्स रूप तो हमे अखबारो की उन खबरो मे देखने के लिए मिलता है जहा महज दहेज के चंद रूपयो के लिए किसी को जिंदा जला दिया जाता है जबकि जलानेवाले कोई पेशेवर मुज्रिम नही अपितु अपने लोग है, भ्रुण हत्याये और स्वार्थ कि पुर्ति के लिए हुए गुनाहो कि बहुलता, घरेलु हिसंाओ के किस्से हमे सोचने के लिए मजबुर करते है आखिर वे लोग ऐसा कर कैसे पाते है! यह असंवेदनशीलता ही तो है कि हम किसी कि गरीबी लाचारी को मजबुरी को नही समझ पाते है। उपरोक्त गुनाहेा के पहले अगर हम संवेदनशीलता से काम ले बहु को जलाने या सताने वाले यह अनुभव कर सके कि उन्होने भी अपनी बहन- बेटी को विदा किया है। रास्ते कि छेडखानी करते लोगो को सोचना चाहिए कि उनका भी कोई इसी रास्ते से गुजर सकता है। तेजाब फेकना विकृति दिमाग और संवेदनशून्यता कि अति नही तो क्या है।आज दादरी हादसे पे सारा देश आश्चर्यचकित सा दिख रहा है जबकि ऐसी घटनाए नई नही है। दादरी जैसी घटनाओ को अगर हम जाति धर्म और राजनिति से परे जाकर देख सके तेा हम समझ सकते है कि संवेदना आज हमारे समाज के लिए कितनी आवश्यक है? और इसकी आवश्यकता भावना से ब्यवहार लोक तक क्यो जरूरी है!

 

पिछले दिनो दिल्ली मे हुई बलात्कार की घटनाओ के बाद मैने देखा हर जगह लोग बैनर लगा रहे हे पर्चे बांट रहे है शाम को कैंडलमार्च कर रहे है पर इन सबका मतलब क्या है? जब हम खुद को बदलने के लिए तैयार नही है रास्ते मे बाजार मे गली मे किसी भी बुराई केा राकने लिए हम एकजुट खडे नही हो सकते और जब कोई शिकार हो गया तब इन तमाम हमदर्दीयो का किया जाय फिर तो यह एक दिखावा ही हुआ या के हमारी सवेदना सिर्फ मन मे है भवना मे है और वास्तविकता से उसका कोई लेना देना नही है। हमारी किसी भी भावना का हमारे ब्यवहार मे उतरना तभी संभव है जब हम वास्तव मे उससे प्रेरित हो और उसके लिए समर्पित भी हो अगर हम मन मे बडी अच्छी भवनाए रखते हो लेकिन जब उन्हे जीवन मे उतारने अमल मे लाने की बारी आये तो हम कमजोर पड जाय और उनसे मुंह फेर ले तो यह बिल्कुल उस कजुंस सेठ कि तरह हुआ कि तीजोरी मे पैसा भी है गददी पर बैठकर दान पुण्य कि बडी बडी बाते भी करता है पर रास्ते पर आते भीखारी को देखकर घर मे छुप जाता है। जब तक दिल मे कुछ है और जबान पर कुछ, कथनी कुछ और करनी कुछ भावना मे कुछ और ब्यवहार मे कुछ तब तक संवेदना, सहानुभूति, हमदर्दी, सिम्पैथी सिर्फ एक शब्द है और जरूरत पडनेपर जिसका हम वाक्य मे प्रयोग मात्र करते है । विना एहसास के हमदर्दी महज एक खानापुर्ति होकर रह जाती है।सच्ची अनुभ्ुाति के बिना सच्ची सहानुभूति का उदगम नही होता जब भुख से जलते किसी पेट की आग कि जलन आप खुद महसुस कर सकेगे तो रोटी लिए खुद ही उस तरफ दौड पंडेगे तब आप के मुख से गरीबी के बडे बडे भाषण कदापि नही फुटेगे आप शासन ब्यवस्था की दुहाई नही देगे आप साीधा वह कर गुजरेगे जो आवश्यक है और जो कुछ आपके सार्मथ्य मे है। तब आप जिस किसी भी जरूरतमन्द के कन्धे पर अपनी हमदर्दी का हांथ रखेगे तो वह दिखावा नही होगा आपकी संवेदना उसकी वेदना का मरहम बन जायेगी और आपको भी एक अद्वितिय सुकुन का अनुभव होगा जिसके लिए तमाम लोग बडी अध्यातमिकता का सहारा लेते है। इस अदभुत सक्रिय मरहम का एक उदाहरण हम रामचरितमानस मे देख सकते है दुखी सीता रावन के त्रास और राम के वियोग की पीडा मे जीवन ही त्याग देना चाहती है और वह रावन की कटार चंद्रहास से कहती है ’’चंद्रहास हरू मम परितापम।’’ वहा एक राक्षसी है जिसका नाम त्रिजटा है सीता उससे कहती है ’’आनि काठ रचु चिता बनाई।’’ पर वह राक्षसी होते हुए भी एक तुच्छ अनुचरी होते हुए भी इस भावना से परिपुर्ण है। सीता के परमदुख मे वह सहानुभूति का मरहम बनती है। यह उसकी संवेदना उसका दिया घीरज ही था जो सीता को आत्मदाह से बचा लेता है। उसका यह गुण उसे राक्षस से देवि बना देता है अैार सीता उन्हे माता का सम्बोधन देती है। आदमी का इन्सान बने रहने के लिए मानवता के उत्थान के लिए समाज को स्वस्थ रखने के लिए इस औषधि का उपयोग जरूरी नही नितांत आवश्यक है।जब सारा हिन्दुस्तान गुलामी झेल रहा था तब एक सूशिक्षित नौजवान जो अपनी जिन्दगी तमाम हिन्दुस्तानीयो से कही बेहतर जी सकता था किन्तु अपने देश अपने लोगो को त्रासदी मे देखकर उनके लिए उनके मन मे सहानुभूति ने जन्म लिया वह अपना सारा जीवन परोपकार मे खत्म कर देता है उसे सहानुभूति थी प्रत्येक उस ब्यक्ति से जो वक्त से पिछडा है जो कमजोर है जो कही किसी भी जुल्म का शिकार है, चाहे वह अंग्रेजो के कोडो का दर्द हो या छुआछुत के अपमान का, वह हर दर्द समझ सकता था। वह सबका हमदर्द राष्ट्रपिता कहा गया, जो इस भावना से शदा प्रेरित रहने के लिए तथा दुसरा को प्रेरित करने के लिए अपने आश्रम मे दैनिक प्रार्थना मे महान भक्त नरसी मेहता का यह भजन गाया करते थे। यह किसी कवि का कल्पना गीत नही वरन एक सन्त का व्यक्तिगत अनुभव है जिसकी दो पक्तियो मे ही मेरी बात का सारा सारांश समाया जाता है।

 


वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ परायी जाणे रे|
पर दुख्खे उपकार करे तोये मन अभिमान ना आणे रे||

 

 


गोपेश कुमार शुक्ला

 

 

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