संवेदना

 

 

(यह एक स्वस्थ समाज केलिए कितना आव्यशयक है और इसकी अव्यशयकता भावना से व्यवभार लोक तक क्यों जरूरी है।)

संवेदना का आशय मन में उतपन्न होने बाले एहसास से है।ये बुरा भी हो सकता है और अच्छा भी क्योंकि ये तो मनुष्य की सोच पर निर्भर करता है।एहसास कैसा भी हो सकता है जैसे प्रेम का, कर्तव्य का ,गलती का आदि।

संवेदना का एक अलग ही महत्व है और ये स्वस्थ समाज की स्थापना में भी बहुत सहायक होता है।हम सब जानते है की जहाँ अच्छी सोच हमे,समाज को और देश को नाम कमा के देती है।वहीं दूसरी ओर ओछी सोच सिर्फ दर्द और बदनामी देती है।

संवेदना ही वो शस्त्र है जो अस्वस्थ समाज को स्वस्थ और स्वस्थ समाज को अस्वस्थ बनाता है।कहीं न कहीं इसके लिए वातावरण ही जिम्मेदार होता है क्योंकि संगत का रंग मनुष्य पर चढ़ता ही है।हाँ वस ये है कि किसी पे ज्यादा चड़ता है तो किसी पे कम।

अगर मनुष्य सम्वेदनशील नही होगा तो भी समाज में परेशानियां खड़ी हो जाएंगी क्योंकि ऐसे में मनुष्य न अच्छा करेगा और न ही गलत और समाज, समाज कैसा अगर उसमे कुछ हो न।अतः हम कह सकते है कि संवेदना बहुत अव्यशयक है परन्तु एक स्वस्थ समाज केलिए अच्छी संवेदना का होना अव्यशयक है।

संवेदना जिस मन में जैसी होती है उसका व्यवहार भी वैसा होता है।हम सब जानते है अच्छा व्यवहार ही समाज मे इज्जत दिलाता है और वस इतना ही नहीं घंटो का काम मिंटो मे करा देता है अच्छे व्यवहार ही के कारण मनुष्य को प्रसिद्धि मिलती है।वहीं हमारा बुरा व्यवहार बना-बनाया काम बिगड़वा देता है।इन सब का कारण सिर्फ एक ही है भावना।ये जिस मन में जैसी होगी उसका व्यवहार वैसा ही होगा।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संवेदना का अत्यंत महत्व है और स्वस्थ समाज केलिए आव्यशयक है और इतना ही नही भावना से व्यवहार लोक तक जरूरी है

 

 


पीयूष गुप्ता
आयु 13

 

 

HTML Comment Box is loading comments...