सम्यक सरति इति संसार

 

 

विश्व द्रुतगति से अपने प्राचीन कलेवर का परित्याग कर नवीनता का,नूतनता वरण कर रही है ।सभ्यता ,संस्कृति ,रीति रिवाज ; इस चरम वैज्ञानिक युग में ,विज्ञान की आड़ मे ,अपने नवीन स्वर में ,मानवता का श्रिंगार करने मे जुट गई है । हिंदुस्तान मे यह विषय हमारे चिंतकों ,मनीषिओ और बुद्धिजीविओं के लिए अत्यंत मानसिक कष्ट का कारण बन गई है ,जिसके जड़ मे ,हमारा वह उन्नत ,गौरवशाली ,अतीत है ,जिसकी चारों तरफ तूती बोलती थी । आज उस पर इस वैश्वीकरण के युग मे पाश्चात्य सभ्यता का धारदार कुठार अपना भीषण प्रहार करता जा रहा है । चारो तरफ एक प्रलयंकारी हाहाकार मची है “हाय हमारी सभ्यता ,हाय हमारी संस्कृति”।
क्या अचानक हमारी सभ्यता और संस्कृति पर विपत्ति के बादल मंडराने लगे हैं ? आइए ,इस संदर्भ में जरा इतिहास में झाँके ।
निसंदेह हमारी वैदिक कालीन सभ्यता और संस्कृति किसी समय उन्नति के चरमोत्कर्ष पर थी । महान आर्य अद्भुत विद्वान ,मंत्र द्रष्टा ,वैज्ञानिक और तपोनिष्ठ थे ।महान आर्य जातिओं से वैदिक सभ्यता शुरू होती है ,ऐसा कहा गया है । अपनी पुस्तक वैदिक संपत्ति मे पंडित रघुनंदन शर्मा ने कहा है कि “वैदिक ज्ञान की बदौलत आदिम कालीन आर्य ऋषियों ने यज्ञों की उन्नति के लिए बड़े बड़े आविष्कार किए थे किन्तु जब से उनमें मिश्रित विचारों का समावेश हुआ ,तब से परस्पर भयंकर अनैक्यता का साम्राज्य हो गया और उनका हर प्रकार से पाटन होने लगा’’।
इससे साबित होता है कि महान वैदिक युग ,जो विश्वगुरु के रूप में विख्यात था ,और अपने उत्कर्ष के चरम शिखर पर था ,आर्य और अनार्य के झगड़ों की वजह से प्राचीन कल में ही प्रदूषित होने लगा था ।
वेद कालीन भारतीय समाज के आदर्श अत्यंत ऊंचे थे ,समाज मे ब्राह्मणों की प्रतिष्टठा थी ।इस बात को देखते हुए ,पृथ्वी के भिन्न भिन्न भागों से आए अनेक जातिओ मे कुछ ने अपने आप को ब्राह्मण घोषित कर दिया था ,जिन में मिश्र से आए चितपावन ब्राह्मण और चीन से आए कन्हाडे प्रमुख थे ।चितपावन ईस्वी पूर्व 18-17 शताब्दी में और कन्हाडे ई0 पू 0 बारहवीं सदी में भारत आए थे ।इन लोगों ने संस्कृत पढ्ना शुरू कर दिया था ।
इसी प्रकार यवन ,शक ,हूण ,मुसलमान आदि का भी
भारत में आगमन हुआ था । ये लोग धर्म और संस्कृति की गंगोत्री वैदिक साहित्य में अपने रसमोरिवाज के साथ सेंध लगा कर उसे अपवित्र करना शुरू कर दिया था । मुसलमानो ने तो अल्लोपनिषद की रचना तक कर डाली थी।
माननीय प0 शर्मा जी का कहना है कि “जब तुलसी कृत रामचरित मानस में ,इतने कम अवधि में ,इतना क्षेपक घुस गया है कि असली ग्रंथ पहले से दूना हो गया है तो हजारों वर्षों पुरानी संस्कृत की पुस्तकें ,जिनका संबंध ,धर्म ,इतिहास और स्वास्थ्य आदि से है ,और जो आर्य जाति का जीवन है वह कितनी दूषित हो गई होगी’।
प्राचीन काल से ही विद्वान जन इस बात को लेकर भयग्रस्त थे कि अपनी मौलिक सभ्यता और संस्कृति को कैसे अक्षुण्ण रखा जाए ।
विभिन्न आरण्यकों,ब्राह्मणों ,स्मृतियों आदि के माध्यम से यह कार्य निर्धारित किया गया । ‘संस्कार’ ‘शील’ ‘समय’ ‘आचार’ ‘या ‘सदाचार’ ‘शिष्टाचार’ ‘को परिभाषित किया गया । ‘संस्कार’ शब्द का सामान्य अर्थ है परिष्कृत ,शुद्ध ,या शोभित बनाने वाला कर्म । भारतीय दृष्टि में ,मनुष्य जीवन को संस्कारों से सुसंस्कृत बनाने वाले कर्म में गर्भाधान से लेकर मृत्युपर्यंत के सोलह संस्कार शास्त्रीय पद्धति एवं लोक रीति से सम्पन्न किए जाते हैं ।
‘आपस्तंभ’ के अनुसार ‘समय’ का संभावित अर्थ है ‘समझौता’या परंपरा या प्रयोग और आचार का अर्थ है व्यवहार या रीति ।
परंपरा मे { कस्टम] प्राचीनता की झलक है ,किन्तु प्रयोग या रीति में ऐसी बात नहीं हो सकती । ये दोनों वर्तमान में या अतीत में कुछ दिनों पूर्व से प्रचलित हो सकती है ,पर वह कुछ लोगों के समझौतों के रूप में हो सकती है ।
इसी प्रकार यह भी विचारणीय है कि धर्म के मूल रूप में ‘आचार या शिष्टाचार या सदाचार का क्या अभिप्राय है । जिस प्रकार वेद एवं स्मृतियां धर्म के विषय में प्रामाणिकता उत्पन्न करती है ,उसी प्रकार जीवन की परिवर्तित परिस्थितियों में वास्तविक धर्म की खोज में ,शिष्टों के व्यवहार हमें आवश्यक कसौटी प्रदान करते हैं –अर्थात शिष्टों के आचार से यह प्रकट हो जाता है कि हमारा कार्य शास्त्र विहित है या नहीं ।
यह भी कहा गया है कि शिष्टों के वे कार्य जो लाभ और आनंद के लिए प्राप्त होते हैं ,धर्म के लिए प्रमाण नहीं हैं ।
तंत्रवार्तिक का कथन है कि ‘ ऐसा कभी भी नहीं कहा जा सकता कि अमुक कृत्य अमुक देश के लिए विहित है ,किसी देश में जन्म लेने ,रहने ,वहाँ से जाने या आने के कारण ही व्यक्तियों को उस देश के गुण प्राप्त होते हैं’।
इसी संदर्भ में महाभारत में कहा गया है कि ‘ऐसा कोई आचार अथवा व्यवहार या रीति नहीं है जो सबके लिए समान रूप से कल्याणकारी हो {न हि सर्वहित; कशचिदाचार; संप्रवरते ।शांति पर्व }
इसी रस्साकशी में एक जगह यह भी पाया गया है {वृहत पराशर ने कहा है कि प्रचलित युग के विषय में या फिर विभिन्न युगों के विषय में } धर्मों की गति विभिन्न रही है ।
महाभारत ने स्पष्ट रूप से सामर्थ्यवानों का पक्ष लेते हुए कहा है कि ‘सर्व बलवानता पथ्यम’अर्थात बलवान या सामर्थ्यवान के लिए सभी ठीक या आज्ञापित है’।
प्राचीन कल से ही समाज का पतन प्रारम्भ होने लगा था । कुमारिल ने अपने काल के कुछ प्रचलित आचरणों का उल्लेख करते हुए अंत मे उसे वर्जित एवं अप्रामाणिक बताया है । “आजकल अहिच्छ एवं मथुरा की नारियां आसव पीती हैं ,उत्तर {भारत} के ब्राह्मण लोग घोड़ों ,अयालों ,खच्चरों ,गदहों ,ऊंटों एवं दो पंक्ति वाले पशुओं का क्रय एवं बिक्रय करते हैं ,दक्षिण के ब्राह्मण मातुल कन्या {मौसेरी बहन} से विवाह करते हैं ,,धोबी द्वारा धोये और गदहों के पीठ पर लड़े गए वस्त्र धारण करते हैं’ वगैरह वगैरह ।
इसी प्रकार भट्टोजि दीक्षित के शिष्य वरदराजन ने अपने ग्रंथ में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण एवं विजय नगर संन्यासी के वार्ता में कहलवाया है कि प्रत्येक देश में कुछ दुराचार पाए जाते हैं ।महाराष्ट्र में ज्येष्ठ पुत्र के पहले कनिष्ठ पुत्र का विवाह और पहाड़ी प्रदेश में नियोग प्रथा ।
प्राचीन काल से ही समाज में अंतरजातीय विवाह होते रहे हैं । प्राय; विभिन्न अभिलेखों में अनुलोम ,प्रतिलोम विवाह का उल्लेख मिलता है ।अति प्राचीन धर्मसूत्रों में बहुत कम वर्ण शंकर जाति का उल्लेख हुआ है ।,मगर सभी स्मृतिकारों की तालिका से लगभग सौ जातियों के नाम प्रगट हो जाते हैं ।
कालांतर में इसका प्रचलन अत्यंत न्यून हो गया और बाद में अन्तरजतीय विवाह अवैध माने जाने लगे थे ।
वर्ण शंकरता रोकने के लिए स्मृतिकारों ने शासकों को उद् बोधित किया है किवे उन लोगों को ,जो वर्णों के लिए बने हुए निश्तिच नियमों का उल्लंघन करते हैं ,उन्हें दंडित करें ।
इसके अलावा नास्तिकों और नास्तिकता ने भी ,जिसकी चर्चा वेदों में भी है ,भारतीय संस्कृति पर भीषण आघात किया । रामायण काल मे भी नास्तिक थे ।
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कामिनी कामायनी

 

 

 

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