संवेदना

 

 

“क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी ?
क्या करूँ ?

 

मैं दुःखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा
रीति दोनों ने निभाई,
किंतु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी ?
क्या करूँ ?’’


ये पंक्तियाँ श्री हरिवंश राय बच्चन जी की कितनी सहज हैं, कितनी स्वाभाविक भावना उमढ पडी है। सामान्य जीवन के इस जंझाट में मनुष्य न जाने किस – किस पर अवलंबित रहता है, किसी न किसी तरह हमेशा दूसरों की सहायता से आगे बढते हैं, पर कृतज्ञता का भाव भी भूल जाते हैं, जब कभी उसकी संवेदना मन में कसक उठती है, एक वेदना से मन में दुःख भर उठता है। तब जरूर हमें श्री हरिवंश राय बच्चन की ये ’संवेदना’ वाली पंक्तियाँ याद आती हैं।


’संवेदना’ यह सुंदर मानवीय जीवन के लिए जितना आवश्यक है उससे भी ज्यादा एक स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक है क्योंकि संवेदनाहीन मानव मानव नहीं कहलाता तो संवेदनाहीन समाज कैसे स्वस्थ रह सकता है? संवेदना भावनात्मक लोक से जुडा हुआ है, संवेदना के बिना भाव उमढ ही नहीं सकते। इसलिए संवेदना मानव जीवन एवं समाज में एक महत्वपूर्ण पात्र निभाता रहता है।


बुध्दिहीन मानव में संवेदना की कमतरता होती है, वैसे ही प्राणी – पक्षिओं में संवेदना नहीं होती है ऐसा कहना भी विपर्यास ही होगा। क्योंकि प्राणियों की तुलना में मनुष्य ज्यादा बुध्दिमान होता है यह बात तो सिध्द है। प्राणियों की तुलना में मनुष्य ज्यादा संवेदनशील होता है और होना भी चाहिए। परंतु इस आधुनिक वैज्ञानिक युग में संवेदना कम होती जा रही है यह बात भी स्पष्ट है और इसका मुख्य कारण गिरते नैतिक मूल्य। क्योकि मानवीय संवेदनाये जीवन के हर क्षेत्र के हर पहलू को प्रामाणिक रूप से प्रभावित करती हैं। हम यह मानते हूँ कि मानवीय संवेदनाओं का सीधा संबंध नैतिक मूल्यों से है। वेदना जो हमारे मन में है संवेदना जो दूसरों के दुःख देखकर हमे दुःख होता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो मान लेना चाहिए कि वह संवेदनहीन मानव है। मानव वह कहलाता है जिसमें मानवता हो, और मानवता वह है जिसमें संवेदना है।

 

 संवेदनाहीन के कारण भी अनेक हैं जैसे भूमण्डलीकरण, स्वार्थपरता, संबंध विघटन, वैज्ञानिक दुष्परिणाम आदि। यह जो समय है वह भूमण्डलीकरण का समय है, जिसमें हम संवेदनाहीन की ओर बढ रहे हैं। हमारी संवेदना और सोच भूमण्डलीकृत समय के मुताबिक अनुकूलित हो रही हैं, जिसे सामाजिक आदतों और सार्वजनिक व्यवहारों में आसानी से लक्षित किया जा सकता है। हमे किसी का दुःख देखकर दुःख होता है, हृदय पिघल जाता है, यही तो संवेदना है। पर इतने से काम नहीं चलता, दूसरों के दुःखों को बाँट लेना चाहिए, उसे सुख देना चाहिए, नहीं तो ऐसी संवेदना किस काम की? इसलिए मोनिका जैन जी कहती हैं कि –


“नहीं चाहिए तुम्हारी संवेदना
नहीं चाहिए कोई हमदर्दी
क्या ले सकता है कोई किसी का दुःख
और दे सकता है बदले में सुख॥”


आखिर हम इतने संवेदनहीन क्यों हो गये हैं? इस अंत हीन दुख भरे प्रश्न् का उत्तर समझने के लिए हमें चारो तरफ नजर दौडानी होगी, वास्तव में हमारी संवेदनायें अंतरमुखी होकर इतनी कमजोर पड़ गई हैं कि हम संवेदना को ही भूल जाते है। संवेदना के बिना आज मानव रास्ते से भटक गया है, इसीलिए रिश्ते-नातों की कदर नहीं रहती, जज्बात नहीं समझ पाता। सो श्री दीपक 'भारतदीप' जी कहते हैं –


मर गयी संवेदना
दूसरे की मौत पर ही
लोग अपने जिंदा होने का
अहसास कर पाते हैं।

 

वास्तव में संवेदना शिशु के जन्म से शुरु होती है, भूख की संवेदना से बच्चा रोने लगता है, संवेदना की ममता से माँ उसे तृप्त करती है। हमारे जन्म से जन्मी यह संवेदना बीच में या आखिर में क्यों कम होती जाती है? हर बच्चा संवेदनशील होता है। पर धीरे -धीरे वो अपनी संवेदना का क़त्ल कर देता है। वो कहता है कि इस रास्ते पर तो बड़ी चोट लगती है, कोई भी घायल करके चला जाता है। किसी ने कहा है कि ‘धीरे धीरे देखो यारो कैसे मैं पत्थर हुआ, फूल पत्थर बाग पत्थर बागबां पत्थर हुआ’। सब पत्थर हो जाता है। हर बच्चा नाजुक पैदा होता है। समाज उसे मृत पत्थर बना देता है। इतनी चोटें देता है कि पत्थर बनने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं रहता। पत्थर मत हो जाना। संवेदना हमारे जीवन पर हर पल, हर क्षण असर डालता रहता है। संवेदना के बतौर हमारे कदम बढते हैं, संवेदना ही हमारी दशा और दिशा तय करती है। संवेदना को बड़े ही सरल शब्दों में बताते हुए मॉं प्रभा किरण कहती हैं कि ’सूरदास ने बिना आंखों के कृष्ण के बाल-स्वरूप का जो चित्रण किया है वह शायद ही आंख वाला कर सके।’

 

हमने ऊपर ही कहा है कि संवेदनशील मनुष्य जीवन में कुछ भी हासिल कर सकता है, कोई भी रिश्ता निभा सकता है। बस हमें धीरज के साथ संव्र्दना को बरकरार रखनी होगी। चालाकी, कुटिलता से ना कभी जीती है और ना कभी जीत सकती है। जीत सदा सरलता की होती है, जीत सदा संवेदना की होती है। इसलिए संवेदनशील होने का अर्थ होता है एक प्रकार की इनोसेंस। एक सरलता, एक भोलापन, एक खुलापन। इसको खो मत देना। स्वस्थ मानव जीवन एवं सुंदर समाज के लिए संवेदना को बचाए रखना बहुत जरुरी है, नहीं तो मनुष्य और क्रूर प्राणियों में क्या अंतर रह जाएगा? मनुष्य बुध्दिमान है तो संवेदनशील भी है, यानि बुध्दिहीन मनुष्य ही संवेदनहीन मनुष्य होता है, इनसे ही सामाजिक व्यवस्था भी बिगड जाती है।
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डॉ. सुनील कुमार परीट

 

 

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