संकट

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 

दिनांक 14.07.14 को एक टी.व्ही. के साक्षातकार में स्वरूपानंद ने कहा कि जब शिरडी के साई मंदिर में इतना धन है तो उन्हें और क्यों पैसा चढ़ाया जाये। इस तरह के व्यक्तव्य कोई पांचवी फैल आदमी के मंुह में उच्छे लगते है स्वरूपानंद के मंुह से अच्छे नहीं लगते है। उपराक्त उक्ति देश के अन्य मंदिरों पर भी लागू होती है। लेकिन वहां का संदर्भ स्वरूपानंद ने नहीं दिया जो प्राकृतिक न्याय के विपरीत है। क्यों केवल शिरडी के साइबाबा के मंदिर के विरूद्ध यह विष वमन कर रहें है। यह मन की राजसी प्रवृति को दर्शाता है और यदि वे लगातार मात्र शिरडी के साईबाब के विरूद्ध ही विष वमन करते है ? तो यह एक तामसी वृति है जो उन लोगो को शोभा नहीं देती जिनसे सात्विक वृति की अपेक्षा की जाती है। यह वक्तव्य वैसा ही है कि धनिको यथा अम्बानी टाटा विडलाज, अजीम प्रेमजी इत्यादि के पास अत्याधिक धन है तो वे आगे धनोपार्जन क्यों करते है ? क्यों वे राष्ट्र की प्रगति में सहयोग देते है ?
दान तो स्वरूपानंद के पास भी बहुत आता है, पर वे प्रसन्न चित से स्वीकार कर लेते है। स्वरूपानंद स्वयं को सनातन धर्म का रक्षक बतलाते है। इन्हीं सनातन धर्मियों ने “अल्लोपनिषद” नाम का भी एक उपनिषद लिखा है। यदि विश्वास न हो तो गीता प्रेस गोरखपुर के पुराने उपनिषदों विशेषांक को देख लो। स्वरूपानंद इतिहास में अनर्गल प्रलापों के लिये याद किये जायेंगे।
भोपाल में स्वरूपानंद एक संवाददाता सम्मेलन में भाषण दे रहे थे। अधिकतर पत्रकार उन्हें महामहिम, महामना, महादरणीय कहकर वहीं घिसी पिटी बातें कर रहे थे जो स्वरूपानंद के मतो को समर्थन करती है। एक जागरूक पत्रकार संजीव पत्रकार ने जब उनसे पूछा कि शंकराचार्य जी आप
शिरडी के साईबाबा का मुददा उठा कर अनर्थ नहीं कर रहे है। हिन्दुओं को विभाजन के लिये प्रेरित नहीं कर रहे है ? तब शंकराचार्य ने उस नौजवान पत्रकार से कहा “तू मूर्ख है। तू बैठ जा”। यह तो आदि गुरू शंकराचार्य की तर्क से जीतने की शैली के बिल्कुल विरूद्ध है। इस तरह कि भाषा यदि स्वरूपानंद बोलते है तो शंकराचार्य के पद के योग्य नहीं है। यह बौखलाहट यह दर्शाती है कि वे ही एक मूर्खतापूर्ण कदम उठा कर गलती कर चुके हैं। उनके इस उत्तर में कहां आदि गुरू शंकराचार्य जैसी तार्किक पहुँच धैर्य या विद्धता दिखती है ? ऐसा उत्तर तो कोई लठैत ही देता है।
पुनः दिनांक 24.07.14 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ कि स्वरूपानंद ने शिरडी प्रबंधक संस्थान को दिनांक 24/25 अगस्त को छत्तीसगढ़ में होने वाली धर्म सभा में वाद विवाद के लिये आमंत्रित किया हैं। इसकी आवश्यकता स्वरूपानंद को है शिरडी के साई बाबा ट्रस्ट को नहीं। जो व्यक्ति एक पत्रकार को मूर्ख कह सकता है उसका खैय्या आक्रामक ही होगा। इस धर्मसभा शिरडी संस्थान को जर्बदस्ती घसीटा जा रहा है। इस विषय में निम्न बिन्दु विचारधीन है
(1) ऐसे निरर्थक विषय की आवश्यकता ?
(2) इस निरर्थक नाटक की आवश्यकता किसे है ?
(3) जह वादी और जज एक तरफ हो वहां न्याय की क्या आवश्कता है।
(4) इस धर्मसभा में या स्वरूपानंद के द्वारा उनकी कंुठाओं में सनातन धर्म को क्यों घसीटा जा रहा है।
(5) अपनी कंुठाओं को सनातन धर्म पर थोप कर हिन्दु धर्म के विभाजन का षडयंत्र कौन रच रहा है।
(6) आदि शंकराचार्य ने धर्म परिवर्तित हिन्दुओं को हिन्दु धर्म में लाने के लिये वाद विवाद किया था। साईबाबा के हिन्दु भक्तों ने धर्म परिवर्तन नहीं किया है ?
उक्त धर्म संसद में साई ट्रस्ट को बुलाने की जिम्मेदारी दंडी स्वामी अविमुक्त स्वरूपानंद सरस्वती को दी दी गई है। सनातन धर्म की ओर से श्रंगेरी शंकराचार्य व पुरी शंकराचार्य के प्रतिनिधि, निवकाचार्य, महाराज, रामानंद, राम नरेशाचार्य महाराज मध्य संप्रदाचार्य से विश्वेशतीर्थ महाराज रामानुजाचार्य महाराज एवं 13 अखाड़ो के प्रमुख मौजूद रहेंगे।
उपराक्त बहस बड़ी असमान रहेगी। जहां स्वरूपानंद के साथ लगभग 6 हजार योद्धा रहेंगे वहीं दूसरी और साई ट्रस्ट के चार या पांच व्यक्ति रहेंगे। स्वरूपानंद के साथ 6 हजार सनातन धर्म के विद्धान रहेंगें। साई ट्रस्ट में कुछ प्रबंधक रहेंगे। उन प्रबंधको से सनातन धर्म को गहराईयों पर बहस करने के लिये कहा जायेगा। हां यदि सनातन धर्म के विद्धानों से प्रबंधन के बारे में बहस करने को कहा जाये जो बात दूसरी है। मेरा तो ख्याल है कि शिरडी के साई बाबा ट्रस्ट को स्वरूपानंद के द्वारा बनाये गये इस चक्रव्यूह में नहीं फंसना चाहिये।
आखिर इस बहस में साई ट्रस्ट को नीचा दिखा कर स्वरूपानंद क्या सिद्ध करना चाह रहे हैं इस तमाशे से शंकराचार्य स्वयं कन्नी काट ली हैं। वे स्वयं उपस्थित न होकर उनके प्रतिनिधियों को भेज रहे है। स्वरूपानंद का प्रभाव क्षेत्र भारत का मध्यक्षेत्र है अतः वहीं के अखाड़े के साधु लोग आ रहे है। यह एक धर्मयुद्ध न होकर मानसिक हिंसा का तमाशा भर हो कर रह जायेगा। हिन्दु लोग तो कई महापुरूषो को मानते है स्वयं ठनठन पाल गीता में लिखा है कि स्वरूपानंद ठन ठन पाल बाबा उनसे मिले थे। जबलपुर में ही कई हिन्दु महापुरूषो की शरण में जाते है। पर क्या स्वरूपानंद ने उन पर आपत्ति उठाई। हजारो हिन्दु लोग तो अजमेर शरीफ पर जियारत करने और हरमिन्दर साहब पर मत्था टेकने जाते है तो क्या स्वरूपानंद वहां की प्रबंधन समिति को सनातन धर्म पर बहस करने धर्म संसद में बुलायेंगे। दरअसल शिरडी साई मंदिर की बंधन समिति को सनातन धर्म पर बहस करने के लिये बुलाने का उनका विचार ही उत्तेजक (प्रोवोकेटिव) है।
स्वरूपानंद पिछले कुछ महिनों से लगातार साईबाबा पर विषवमन कर रहे है। अतः उनका धर्म संसद में वहां के प्रबंधन संस्थान को घसीटना एक सोची समझी साजिश है जिसका निर्णय धर्मसंसद के पहले ही लिखा जा चुका है। आदि गुरू ने सारे उपनिषद वेद गीता एवं कई ग्रंथो पर भाव्य लिखे है मुझे नहीं ज्ञात कि स्वरूपानंद ने किसी संस्कृत के ग्रंथ पर भाव्य लिखे है या आदि गुरू द्वारा लिखित सभी पुस्तको का अध्ययन किया है।

 

 

 

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