बालकों का विकास शिक्षक का दायित्व

 

 

शशांक मिश्र भारती

 

bvikas


सरस्वती का पावन मन्दिर विद्यालयों को कहा जाता है, जो कि सत्य ही है। जैसा कि व्यक्ति मन्दिर में पूजा करने के लिए कुछ पाने के लिए जाता है। ठीक वैसे ही विद्यालयों में बालक कुछ सीखने के लिए प्रवेश करता है।बालक जब विद्यालय में पहली बार कदम रखता है।तब उसकी मनः स्थिति अजीब होती है अपने आपको वह बिल्कुल अकेला पाता है।एक दो दिन मचलता है।चीखता -चिल्लाता और रोता है।धीरे -धीरे विद्यालय से सामंजस्य हो जाता है और अध्यापक उसको अपने हितैषी, परिवारिक जनों जैसे लगने लगते हैं।एक समय ऐसा भी आता है कि बालक अपने गुरुजनों की बात को अपने माता -पिता के कथन से अधिक महत्व देता है।जैसे -जैसे वह बड़ा होता जाता है। प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चशिक्षा की ओर बढ़ता है।उसकी धारणा शक्ति अनेक स्वरूपों, परिकल्पनाओं को ग्रहण करती है। उसको अनेक पड़ावों से गुजरना पड़ता है।कभी सुख कभी दुःख से उसका साक्षात्कार होता है। कभी -कभी उसका मन अपने अध्यापक से भी खिन्न हो जाता है। उसकी जिज्ञासा अध्यापक के आचरण के अनुरूप धारण कर लेती है। अध्यापक का व्यवहार व आचरण का प्रस्तुतीकरण बालक के विकास का स्पर्श कराता है। बनावटीपन से युक्त, अधिक बातूनी, गुटका, मसाला खाने व गैर जिम्मेदाराना व्यवहार वाले शिक्षकों के बालक जहां उचित मानसिक, तार्किक विकास नहीं कर पाते हैं। वहीं ईमानदार कत्र्तव्यनिष्ठ, आदर्शवादी, आचरण की पवित्रता, दायित्व निर्वहन को प्राथमिकता देने वाले शिक्षकों के बालक सर्वांगीण विकास करते हैं।

बालक की की अनुकरण के द्वारा सीखने की प्रवृत्ति आचरण से देखने की आदत उसके जीवन की अधिकांश कलाये सिखला देती है।बचपन में वह अपने से बड़े माता -पिता, दादा -दादी, भाई -बहिन की ओर देखकर सीखता है।विद्यालय आने पर अपने शिक्षकों को देखकर सीखता है। चंूकि शिक्षक उसके लिए आदर्श है उसके व्यक्तित्व का निर्माता है उसके संसार में अस्तित्व को उपजाता है। इसलिए उसके व्यक्तित्व निर्माण पर सर्वाधिक प्रभाव शिक्षक के आचरण, रंग -ढंग, बोल -चाल, वेश -भूषा व्यवहार का ही पड़ता है। उसकी प्रतिक्षण की क्रियायें बालक की तीक्ष्ण दृष्टि से बच नहीं पाते हैं। बालक एक -एक घटना को बड़ी बारीकी से परखता है। उसके द्वारा अपनी समझ में चोरी -छिपे की गई कोई हरकत भी बालकों से छुप न पाती है। भले ही वह प्रकट न कर रहा हो।
वर्तमान समय में प्रचलित बालकों में गुटबाजी, व्यसनों की लत, अनुशासनहीनता, लापरवाही, नेतागीरी, कक्षा में अनुपस्थित रहने आदि की समस्या की जड़ में हमारे कुछ शिक्षक वर्ग के लोग ही है। जिनकों देखकर भयावह समस्याये भी उत्पन्न हो रही है। पहले जैसे आदर सम्मान मिलने की बात भी गुरुजनों के लिए गूलर के पुष्प सा हो गयी है। इने -गिने शिक्षक ही आज समाज में पर्याप्त गौरव -सम्मान प्राप्त कर पा रहे हैं। समाज से भी अब प्रश्न उठने लगे हैं कि क्यों न आज के शिक्षक वर्ग के दायित्वों के कत्र्तव्य निर्वहन का पुर्नमूल्र्यांकन किया जाये।
अस्तु शिक्षक जोकि देश का निर्माता व बालकों को श् िाक्षण -मार्गदर्शन देता है। अपने आचरण व्यवहार से ऐसा कुछ न करे जिससे बालकों के विकास पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो। उनमें श् िाक्षक वर्ग के पद, प्रतिष्ठा, गौरव -सम्मान के प्रति सन्देह उत्पन्न करता हो और जो समाज व देश की दृष्टि में भी उचित न हो। तब कोई आश्चर्य नहीं, कि पुनः प्राचीन भारतवर्ष की तरह शिक्षकों को आदर -सम्मान मिलने लगे। उनका पद ईश्वर से भी श्रेष्ठता के बिन्दु का स्पर्श कर ले और तीन लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय वाली कहावत चरितार्थ हो जाये।

 

 

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