स्वरूपानन्द जी द्वारा भगवान हनुमान जी का कार्टून निकालने के निहितार्थ

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 

यह तो सबको विदित है कि स्वरूपानंद कोई साई बाबा की निन्दा करते रहते थे। फिर साई भक्तो ने यह प्रकरण मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में दाखिल किया था जिस पर न्यायालय में स्वरूपानन्द ने उच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल किया था कि वे भविष्य में साई बाबा की निन्दा नहीं करेंगे।
मगर दिनांक 30.10.15 को ए.बी.पी. न्यूज ने शंकराचार्य स्वरूपानन्द की ओर से निकाला एक कार्टून दिखाया जिसमें भगवान हनुमान जी एक उन्मूलित वृक्ष लिये शिरडी के साई बाबा के पीछे दौड़ रहे है और साई बाबा डर कर भाग रहें है। उसी दिन आई.एस.बी.एन सेवन न्यूज चैनल में इस प्रकरण पर बहस दिखालाई गई जिसमें स्वरूपानंद के कोई शिष्य दावा कर रहे थे कि शिरडी के साई बाबा मालेगांव के थे और उनका नाम चांद मियां था।
शिरडी के साई बाबा का निश्चित जन्म स्थान का कोई साक्ष्य नहीं मिलता है और उनका नाम भी विदित नहीं है। उनका नाम चांद मियां नहीं था, बल्कि वे चांद पाटिल की बारात के साथ शिरडी आये थे और फिर कहीं बस गये। हनुमान जी का कार्टून निकाल कर हनुमान जी का अपमान किया गया है और वह किसी हिन्दु से तो बिल्कुल अपेक्षित नहीं है। भगवान हनुमान जी का किसी भक्त को दर्शन देने का अंतिम वर्णन श्री तुलसीदास जी के समय का है जब उन्होने तुलसीदास जी को भगवान राम और लक्ष्मण जी की ओर इंगित कर यह दोहा पढ़ा था
चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीड़।
तुलसीदास चन्दन घिसें तिलक देत रघुवीर।।
उक्त कार्टून के द्वारा हनुमान जी को एक सामान्य व्यक्ति का गुलाम बतलाया गया है जो उसके कहने पर किसी भी संत के पीछे वृक्ष उखाड़ कर मारने दौड़ जाते है। इस हद तक नफरत तो कम देखने को मिलती है। कार्टून से शायद बजरंग दल को साई बाबा के विरूद्ध भड़काने का प्रयत्न किया गया है। बजरंग बली का कार्टून देख कर बजरंग दल वाले कार्टून बनाने वाले से ही नफरत न करने लगे। वैसे भी विदेशी लोग भारतीय देवी देवताओं के चित्र जूतों में लगा कर या भगवान शंकर का टेटू टांगो में लगा कर कम बदनाम नहीं हैं।
इस कार्टून में हनुमान जी को शंकराचार्य का गुलाम न बतला कर स्वयं स्वरूपानंद को आक्रामक मुद्रा में साईबाबा के पीछे दौड़ता हुआ बतलाने का संकेत था। यह बात अलग है कि साईबाबा अभी जीवित होते तो उनसे डरते या नहीं। शंकराचार्य के द्वारा उक्त कार्टून निकालना उच्च न्यायालय की अवमानना है। इसके लिये स्वयं संज्ञान लेकर स्वरूपानंद को “समन” निकालना चाहिये। वैसे भी शंकराचार्य सन्यासी होते है। श्रीमद्भागवत् गीता के अध्याय पांचवे के श्लोक 3 में कहा गया है
ज्ञेयः स नित्य सन्यासी यो न देष्टि न कांक्षसि।
निद्र्वन्दो हि महावाहो सुखं वन्धात्प्रमुच्यते।।
अर्थात् है अर्जुन, जो न द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है वह सन्यासी समझाने योग्य है। द्वान्दादि दोषो से रहित पुरूष संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। श्लोक 10 में कहा गया है
विद्या विनय सम्पन्नों ब्राह्नने गवि हस्तिनि।
शुनि चैव खपाके च पण्डिताः सम दर्शिता।।
अध्याय 20 में कहा गया है:
न प्रहवयेत्प्रियं प्राप्य नो द्विजेत्प्राप्य चा प्रियम।
स्थिर बुद्धिरसम्मूढ़ो ब्रहनविद ब्रहननि स्थितः।।
श्लोक 18 का अर्थ है कि पण्डित, विद्या विनय युक्त ब्राह्नहण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में समदर्शी होते है।
अध्याय बीस का अर्थ है ब्रह्नन को जानने वाला ब्रह्नन में स्थित न तो प्रिय को प्राप्त कर हर्षित होता है एवं अप्रिय को प्राप्त कर द्वेष नहीं करता। वह बुद्धिमान स्थिर बुद्धि रहता है अध्याय छः के श्लोक 9 में कहा गया है:
सुह्नन्मित्रार्युदासीन मध्यस्थद्वेवश्वन्धुषु।
साधुजपी च पापेषु समबुर्विशिष्यते।।
अर्थात सुह्नद मित्र, दुश्मन, उदासीन, मध्यस्थ द्वेषय, बन्धुओ, साधुओं और पापियों में समबुद्धि रखने वाला श्रेष्ठ होता है। ऐसे अनेक गुण पण्डितो, विद्वानों, सन्यासियों के बतलाये गये है जो किसी से नफरत नहीं करते। स्वरूपानंद जी को स्वयं ही किसी से नफरत नहीं करना चाहिये और न ही शिष्यों को नफरत करना सिखाना चाहिये। अन्यथा वे दुःख के समुद इस संसार में डूबते और उतराते ही रहेंगे।
उक्त कार्टून से स्वरूपानंद जी ने
(1) न्यायालय की अवमानना की है
(2) हिन्दु भगवानों का मजाक किया है एवं अपमान किया है
(3) निरर्थक ही बजरंग दल को उकसाने का प्रयत्न कर समाज में वैमनस्यता उत्पन्न करने की कोशिश की है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आदरणीय भाई जोशी जी ने ए.बी.पी. न्यूज के 24 घंटे 24 रिपोर्टर (दिनांक 2.11.15) के साक्षातकार में कहा है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कई कार्यकर्ता साईबाबा के भक्त है। अतः साईबाबा की निंदा कर शंकराचार्य करोड़ो हिन्दुओं और लाखों स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं का दिल दुखा रहे हैं।
यह किसी से छुपा नहीं है कि स्वरूपानंद जी कांग्रेस के प्रति नरम दिल एवं रूझान रखते हैं। मोदी सरकार के पूर्व उन्होनें कभी भी साई बाबा की निन्दा नहीं की है। अब उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ कि साई मुसलमान था। (वह साई बाबा को ऐसे ही सम्बोधित करते हैं) ? हिन्दुओं को उनकी मजार पर नहीं जाना चाहिये। (चाहे अजमेर शरीफ जाते रहें) साई बाबा ट्रस्ट ने केदार जी की बाढ़ में सहायता क्यों नहीं पहुंचाई। जैसे तमाम शंकराचार्य वहां कार सेवा में लगे थे। (ऐसा उनके शिष्य कहते हैं।)
कहीं ऐसा तो नहीं कि वह नरेन्द्र मोदी की आज निंदा कर रहे हो। फिलहाल बुजुर्ग स्वरूपानंद जी को देश के इन निरर्थक भगजाल में उलझना बंद कर देना चाहिये एवं पाकिस्तानियों के हमलों, आतंकवादियों द्वारा निर्दोष भारतीयों के बध, बढ़ती मंहगाई के कारण आम आदमी की जिंदगी दूभर हो जाने का विरोध करना चाहिये। आदरणीय भाई जोशी का यह कथन सार्थक है कि हिन्दुओं को ही तय करने दो कि वे किसको भगवान मानते हैं।

 

 

 

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