उल्लू कहां गया ?

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

 


पेड़ो की शाखाओं की तरह वन विभाग में भी शाखायें निकाली जा रही हैं जैसे वृक्षारोपण, वन संरक्षण, चूहे से लेकर गेंडा एवं मगर, वन संरक्षण, बिगड़े वन सुधार योजना, सामाजिक वानिकी, मृदा संरक्षण इत्यादि। जैसे-जैसे वन विभाग फैलता जा रहा है वन सिकुड़ते जा रहें है। जंगल शहरों में घुलते जा रहें है। रात को या दिन में जानवर जंगल में सोता है और दिन या रात को अपने को शहर में पाता है।
इसी निर्जगली के कारण शहर और जंगल में भेद करने में असमर्थ होने के कारण एक चार फीट उंचा उल्लू शहर में घुस आया। जैसे कालेजो में नये विद्यार्थियों को देखकर रैगिंग गेंग पीछे पीदे पड़ जाती है उसी तरह नाके से शहर के कौव्वे उसके पीछे पड़ गये। उल्लू की जब मौत आती है तो वह नेता, सरकारी नौकर या तांत्रिक के चंगुल में फंस जाता है। उन कौव्वो ने किसी पागल के पीछे पड़े हुये आवारा कुत्तो की तरह उस उल्लू को खदेड़ कर देव वश पंडित ज्वाला प्रसाद तांत्रिक के घर पहंुचा दिया। मौत से बच कर वह उल्लू मौत के मुंह में गिर गया। ज्वाला प्रसाद तान्त्रिक उस दिन वन विभाग के अहसान से दब गये।
शुभ लक्षणों से युक्त उस उल्लू को अचानक घर में देख कर तांन्त्रिक जी उसी तरह अचकचा गये जिस तरह मात्र पांच हजार की लाटरी खुलने पर मैं अचकचा जाउंगा। उस उल्लू के लिये ही उनकी दाहिनी आंख पिछले पन्द्रह दिनों से फड़क रही थी। उस उल्लू में उन्हें एक साथ ही रम्भा, लक्ष्मी और कीर्ति दिखने लगी।
मगर जिस तरह खुली मिठाई पर मक्खियां एवं खुले स्लीपर कंपार्टमेंट में अप-डाउनर घुस जाते हैं उसी तरह उस उल्लू का पीछा करते हुये एक हुजूम उनके घर तक आ गया। उनमें से हरेक आदमी उस उल्लू को मार कर लक्ष्मी चाहता था, मेहनत और ईमानदारी से नहीं।
उनमें से एक ने हिम्मत कर के कहा “तान्त्रिक जी आपके घर में भ्रमवश मेरा उल्लू घुस गया है। आप उल्लू नहीं तो उसका पंख या नाखून ही दे दीजिये मेरी बीबी रो-रो कर उसकी याद में हलाकान हो रही है। मेरी बीबी को उल्लू बहुत प्यारे लगते हैं।”
“इसीलिये तुम्हारी उससे निभ रही है” फिर तेज स्वर में बोली “यह तुम्हारा उल्लू कैसे हो गया ? क्या तुमने उसे फसल की तरह बोया था जो काटना चाहते हो। क्या तुमने उसे आर्डर देकर बनवाया था। लक्ष्मी उसी की होती है जिसके घर छप्पर फाड़ कर गिरती है। बहुत हो गया, भागो यहां से नहीं तो किसी प्रेत को कुत्ते की तरह झुमा दूंगा।”
भीड़ को भगाकर तांत्रिक ने दारू पान किया। फिर उस डरे हुये देहाती पक्षी को भी दारू पिलाई। दारू पीकर वह भोला पक्षी तन गया और उसकी आंखे लाल हो गई। तान्त्रिक उसे प्यार से निहारने लगा। उसका भूरा रंग उन्हें गोमेद और मोती जैसा दिख रहा था। उसकी लाल-लाल आंखो में उन्हें मूंगा और माणिक दिख रहे थे उसके नाखूनों में उन्हें लाटरी के नम्बर दिख रहे थे। उनकी आनन्दमयी समाधि को घंटी ने कैंची की तरह काट दिया। जिस तरह से बेकाबू वाहन में मुश्किल से ब्रेक लगते हैं उसी तरह मुश्किल से गालियों के अजस्र प्रवाह को रोकते हुये वे बाहर आये।
बाहर नगर सेठ सह स्थानीय नेता उनकी मुस्कुराहट के साथ हाथ जोड़े खड़े थे। ज्वाला प्रसाद जी को उल्लू का महत्व बढ़ता हुआ प्रतीत हुआ। जिसकी अन्टी में जितने उल्लू होते है वह उतना ही लक्ष्मीवान होता है।
नेता गदगद स्वर में बधाई देते हुये हिनहिनाये “धन्य भाग जो लक्ष्मी वाहन हमारे नगर में पधारे। हमारा नगर गौरवायमान हो गया। तांत्रिकजी को अपनी सम्पत्ति सार्वजनिक होकर हाथ से फिसलती हुई मालूम पड़ने लगी। वह नगर सेठ मालूम नहीं कितने लोगो की व्यक्तिगत सम्पत्ति सार्वजनिक बना कर हड़प चुका था। “हें,हें मेरे घर में कोई उल्लू-वुल्लू नहीं है। आप ही पधारे है। उल्लू तो आपके मतदाताओं का नाम है। यहां आपका उल्लू सीधा नहीं होगा “तांन्त्रिकजी ने उसे सेठ के नहले पर अपना दहला फेंका।
नगर सेठ पहले तो हिनहिनाये फिर फुसफुसाये” तो जो रूद्रप्रताप है न विरोधी पार्टी का नेता, वह व्यक्तिगत आक्षेपों पर आ गया है। कहता फिर रहा है मैनें विधवाओं की संस्था बना कर नजूल की जमीन हड़प ली है। आपको तो मालूम है कि मेरी छोटी बहु को समाज सेवा का शौक है। नगर सेठ ने उनकी छोटी बहू को बिसात पर सरकाया”।
“अपने शास्त्रों में विधान है कि दुष्टों को मारने में कोई दोष नहीं है। आप बहू रानी को भिजवा दीजियेगा, उनके हाथ से रूद्र प्रताप का अनुष्ठान करवा दूंगा।” ज्वाला प्रसाद लार निगलते हुये बोले। उन्हें उल्लू सचमुच लक्ष्मी वाहन लगा। उधर नगर सेठ ने सोचा की किसी गणिका को भेज कर रूद्र प्रताप को बर्बाद किया जा सकता है। वे लोग हत्या की योजना भी व्यापारिक अनुबंध की तरह बनाने लगे।
सेठ जी बिल्ली की तरह थे। जब उन्हें खीर खाने नहीं मिली तो उन्होने बगराने का इरादा बना लिया। वे शहर की बन्दूक, थानेदार के खबरची बन गये। दूसरे दिन थानेदार साहब डण्डा ठोकते हुए तांत्रिक के घर पहुंच गये। बोले “इस घर में कोई जंगली जानवर है जो धारा एक से धारा तीनसौ तक दण्डनीय अपराध है”। तांत्रिक समझ गये कि अब उल्लू वश में रखना वश की बात नहीं है। इतने में उल्लू फड़फड़ता हुआ बाहर आ गया। थानेदार साहब पिंजरा लेकर ही आये थे उसे तांत्रिक जी से पकड़वा कर पिंजरे में कैद किया गया। थानेदार जी ने घूरा तो तांत्रिक जी ने उगला ”यह तो जानवर नहीं है, पक्षी है”।
“यह जो कुछ भी है तुम्हारी दीवाली “बुक” हो गई, अब दीवाली की रात को तुम मेरे बंगले में उल्लू अनुष्ठान करोगे।”

 

 

 

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