वर्तमान में व्यक्ति कि सोच

 

 

आज के इस आधुनिक युग में व्यक्ति कि सोच कैसी हैघ् हम अगर सोचे तो व्यक्ति वर्तमान समय में अपनी सोच नकारात्मक रखने लगा है। आज के समय में व्यक्ति कोई भी कार्य करने से पहले ये नहीं सोचता है कि वह उस कार्य में सफल होगा बल्कि वह यही सोच रखता है कि में इस कार्य को नहीं कर पाउुगंा। बस इसी मोड़ पर व्यक्ति गलती कर देता है, कमजोर पड़ जाता है और नकारात्मक सोच रखकर अपनी क्षमता को नहीं पहचानता। आज के समय में व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण द्वारा बतायी गयी बात श्कर्म कर फल कि ईच्छा मत करश् को भूल चुका है और कर्म न कर फल पाने कि चिंता में लगा है। वर्तमान युग में आखिर क्या ऐसी सोच है जो व्यक्तियों को आगे बढ़ने से रोकती है कभी हमने सोचा हैघ् व्यक्ति जब गलत प्रकार का कोई कर्म करता है तो वह फल कि चिंता नहीं करता है। जैसे दुष्कर्म, धुम्रपान ( सिगरेट आदि नषीले पदार्थो का सेवन ) करके ये कर्म तो कर रहा है पर उसने कभी ये सोचा है कि इसका नतीजा क्या होगा। इसका फल उसे क्या मिलेगाघ् नहीं वह जब ऐसा गलत कार्य करेगा तो वह फल कि चिंता नहीं करेगा। तो आज का इन्सान क्यूं अच्छे कर्म नहीं करना चाहता। व्यक्ति किसी अच्छे कार्य को करना भी नहीं चाहता और फल कि इच्छा कर रहा है अगर हम किसी परीक्षा में अच्छे प्रतिषत से सफल होना चाहते है तो हम यही सोचेगेम कि हम कम पढ़े और अंक ज्यादा लाये। ऐसा क्यूॅंघ् ऐसा व्यक्ति जब गलत कार्य करता है तब क्यों नहीं सोचता। यानि वह गलत कर्म तो करना चाहता है पर फल के बारे में नहीं सोचता और अच्छा कर्म न कर उसका फल पाने कि इच्छा रखता है। आज युवा ये नहीं सोचते कि वो अपने माता-पिता के लिये कितने महत्वपूर्ण है। वह उनके बारे में नहीं सोचते बस अपने युवा स्तर का मजा प्राप्त करना चाहते है। बस इसका एक ही कारण हमारे सामने आयेगा और वो है व्यक्ति कि नकारात्मक सोच। अगर व्यक्ति कोई कार्य करने से पहले सोच ले कि में इस काम में सफल हो जाउुंगा तो वह उस कार्य में अवष्य सफल होगा। अगर व्यक्ति सकारात्मक सोच को अपना ले तो उसका कार्य सफल होना निष्चित है। आज का युग प्रतिस्पद्र्धाजनक युग है। हर व्यक्ति आगे आने चाहता है और आगे वही व्यक्ति आता है जो सकारात्मक सोच रखता है। व्यक्ति अगर सकारात्मक सोच रखकर अपने लक्ष्य के मार्ग पर चलेगा तो वह सफलता के रुप में अपनी मंजिल जरुर प्राप्त करेगा। व्यक्ति अपने जीवन में और अनेक मोड़ पर गलती कर रहा है ये कभी हमने सोचा हैघ् व्यक्ति अपने स्वयं के साथ अन्याय कर रहा है। वह स्वयं के साथ मनमानी कर रहा है। धुम्रपान, दुष्कर्म आदि नकारात्मक कार्य करके खुद को कष्ट दे रहा है जबकि इसका फायदा उसे कुछ नहीं मिल रहा है। फिर क्यूं वह ऐसा कर्म करना चाहता है। आत्मविष्वास हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अगं है। एक नन्ही चींटीं जब दाना लेकर दिवार पर चढ़ती है तो वह बार-बार फिसलती है और उसमें आत्मविष्वास इतना होता है कि अंत में वह दिवार पर चढ़ जाती है। उत्साह, उमंग और आत्मविष्वास के साथ सकारात्मक सोच रखकर व्यक्ति अपने लक्ष्य कि ओर चले तो सफलता स्वतः ही उसके नजदीक आने लगेगी। यदि हम तालाब में तैरना चाहते है और लहरो से भी ड़रते है तो क्या हम तैर पायेंगे कवि हरिवंश राय बच्चन जी ने क्या खूब कहा है-

 

 


श्हिम्मत करने वालो कि हार नहीं होती,
लहरो से ड़र कर नैया पार नहीं होती,
नन्ही चीटीं जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दिवारो पर सौ बार फिसलती है,
मन का विष्वास रगो में साहस भरता है,
चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है,
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
को्शिश करने वालो कि हार नहीं होती।

 

 

 


- योगेन्द्र जीनगर

 

 

 

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