ये वादियाँ ,ये फिज़ाएँ, स्विट्जर्लैड है ये

 

 

ये वादियाँ ,ये फिज़ाएँ, स्विट्जर्लैड है ये ।
बहुत से जन्नत होंगे ,धरती के विभिन्न भागों में,मगर आल्प्स की हसीन वादियों में बसा स्विट्जरलैंड तो लाजबाव है ,बेमिसाल ,हुस्न की मल्लिका यूं अपना लट छितराए बांहे पसारे अलसाती हुई सी बैठी है ,कि नज़र भर देखते ही लोग उसके दीवाने हो जाते हैं ।
यहाँ सपना ही हकीकत बन कर इठला रही है । पहाड़ों पर बने सुंदर ,फूलों से सजे घरों के पीछे ऊपर कुछ दूर से नीचे उतरती तन्वंगी झीलें , नीचे कल कल कर बहती नदियां , हरे भरे पहाड़ ,सर्पाकार काली काली सड़कें ,बड़े बड़े चारागाहों में चरती हुई गायें ,और आबादी बेहद कम ।
यहाँ पनदरह सौ के करीब झीलें हैं , 48 पर्वतों की ऊंचाई समुद्र तल से तकरीबन 4000मीटर {13000फीट} है ।
यहाँ का सबसे प्रसिद्ध शहर जेनेवा एक तरह से यू एन ओ के वर्चस्व मे है ।यहाँ इसके अनेक इमारतें हैं जेनरल असेंबली की विशाल इमारत के परिसर में पंक्तिबद्ध, सदस्य राष्ट्रों के झंडे लहराते रहते हैं । मुख्य गेट के ठीक सामने ,और पीछे अनेकों कृत्रिम फोव्वारों के बीच एक काफी ऊंची {बारह मीटर की } लकड़ी की कुर्सी खड़ी है ,जिसका एक पाँव आधा{ लैंड माईन के शिकार लोगों की स्मृति} तोड़ दिया गया है ।[{गाईड ने बताया ,यहलेडी डायना की याद भी दिलाती है ,क्योंकि वह भी जब एक तरह के {पिपराजी} आतंकवाद का शिकार हो गई थी और लैंड माईंस के विरोध में काफी काम किया था ]यह मानव कल्याण कारी संस्था हैंडीकैप इन्टरनेशनल द्वारा लगाया गया है जिससे दुनिया भर के सभी राज्यों की दृष्टि इसपर पड़े ,और वे इसका याने लैंड माईन का जोरदार विरोध करें । वहाँ विशाल विशाल दरख्तों के बीच अधिकांश जमीन भी यू एन ओ का ही है ।
यूएन स्कवेर के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान बहुत सी सुंदर है । इसके एक किनारे रेल की पटरी बिछी हुई है ,जहां रेल या मेट्रो चलती है ।उसके सामने हैंडी कैप इन्टरनेशनल का बोर्ड लगा हुआ है ,जिसका विशाल इमारत निर्माणाधीन है ।
यह रेडक्रॉस की जन्मभूमि भी है और उसका मुख्यालय भी ।
॥ कामिनी कामायनी ॥
रेड क्रौस का झण्डा सफ़ेद पर लाल का क्रॉस है ,जबकि स्विट्जरलैंड का लाल रंग पर सफ़ेद का क्रॉस । सबसे बड़ा दान कर्ता रेड क्रॉस सोसाईटी के लिए सऊदी अरब है ,उसके अनुरोध पर विगत पनदरह वर्षों से रेड कृशेंट कर दिया गया है।
जेनेवा झीलयहाँ की बेहद ही आकर्षक झील है ,इस विशाल झील के किनारे से इसकी अप्रतिम सुंदरता को निहारते हुए मनुष्य जैसे प्रकृति के असीम अभेद रहस्य में डूब जाने को उत्सुक हो उठता है । दूर दूर तक पहाड़ियाँ ,अल्पाईन के सजीले दरख्त ,नीचे स्वच्छ जल में तैरते हंस ,जहाज ,नाव क्रूज जल में एक बहुत ऊंची फ़ौव्वारा ,इस हुस्नमयी झील के बड़े बड़े नाम चीन कद्रदान हुए हैं जिन्होंने इसके किनारे घर लेकर या बनवा कर इसके सुषमा को अपनी इनायत भरी नजरों से श्रद्धा सुमन अर्पित किया है ।कुछ नाम हैं ,लेनिन ,चार्ली चैपलिन ,फार्मूला न0 1 का माईकल शुमाकर आदि ।
वहीं पर चंद कदमों की दूरी पर नीचे जमीन पर फूलों से एक विशाल घड़ी बनाया गया है । जहां लोग फोटो खिंचवा रहे थे ।

स्विट्जरलैंड के पास विधाता ने अपूर्व प्राकृतिक सौन्दर्य दिया । इसका भान होते ही उन लोगों ने अपने पर्यटन क्षेत्र को दिलो जान से बढ़ावा दिया । पहाड़ काट काट कर बड़े बड़े टनेल बनाकर यातायात के मार्ग को सुगम बनाया ।
जुन्फ़्रौ रेलवे _यह यूरोप की सबसे ऊंची रेलवे स्टेशन है जिसे बनाने में सोलह वर्ष लगे थे और निर्माण पर अनुमानित राशि से दुगुना [16मिलीओन फ्रेंक ] 1912 में आया था । आज यह विश्व हेरिटेज में शुमार ,दुनिया भर के पर्यटकों के लिए बेहद आकर्षण का विषय है । यहाँ से सफ़ेद बर्फ की फैली चादरें देख कर मन कुदरत के अद्भुद कृति पर आविर्भूत हो उठता है ।
ग्लेशिएर 3000 - यह भी यहाँ का एक अनोखी,,मनोहारिणी अनुभूति है । यहाँ तक का सफर दो तरह के केबल {एक बड़ा ,एक छोटा } में तय होता है ।ऊपर का दृश्य एकदम स्वर्गिक है । दूर दूर तक बर्फ की नदियां जैसे जम गई हों । वहाँ ,बर्फ पर चलने वाली बस से थोड़ी दूर तक का परिक्रमा किया जाता है । तकरीबन 24 पहाड़ों की बर्फ़ आच्छादित चोटियाँ वहाँ से दिखाई पड़ती हैं । तनिक नीचे विशाल अल्पाईन कोस्टर राईडर का आनंद लिया जा सकता है ।वहाँ खाने पीने का हर सुख सुविधा मौजूद है । स्विट्जरलैंड ने अपने पहाड़ों को इतना आसान बना दिया है कि पाँच साल के बच्चे से लेकर सत्तर साल का बूढ़ा भी आसानी से ऊपर पहुँच जाता है ।
स्विट्जरलैंड अपने पर्वतों {दक्षिण में आल्प्स और उत्तर पश्चिम में जूरा}के लिए जाना जाता है ,मगर इसके बीच में जो पठार {प्लेटयू} है ,वहाँ से घूमती हुई पहाड़ें,समतल और बड़ी बड़ी झीलें इसे बेहद मनोरम बनाती है ।
इस खूबसूरत हीरे को कुदरत और इंसान दोनों ने मिलकर, तराश कर नायाब बनाया है ।संसार भर मेअपने बैंक के लिए प्रसिद्ध इस देश को देखने से पता चलता है कि उन अकूत दौलतों का कितना भव्य सदुपयोग यहाँ किया गया हैं । पहाड़ों पर परंपरागत ,लकड़ी के मकान ,जिनके बालकनी से खिले खिले फूलों के बास्केट लटकते रहते हैं । इनके बागीचों ,चौक चौराहों पर ,गाय ,बकरी ,मुर्गे ,घोड़े आदि जानवरों की मूर्तियाँ लगी रहती हैं ।इनका मानना है कि ये जानवर ही इनके जीवन यापन करने का जरिया है ,इसलिए इन्हें पर्याप्त सम्मान मिलना चाहिए ।ये लोग गदहे भी पालते हैं जिसके लिए यह तर्क है कि नई पीढ़ी यह याद रखे कि आज जो सुख सुविधा उन्हें मिली हुई है उसके पीछे इन्हीं गदहों की मेहनत और पूर्वजों की पसीना लगी हुई है ।
पहाड़ों की उचाईयों पर बसे निवासियों के पास सब आधुनिक सुविधा मौजूद है । चिकित्सा ,बाज़ार ,कोपरेटिव सोसाईटी ,आदि सब कुछ । सड़कें चौड़ी और काफी चिकनी सतह वाली ।
सभी घरों के सामने बेश कीमती दो तीन गाडियाँ लगी रहती हैं । कार कंपनी उनके निवास पर आकार उनकी गाडियाँ ठीक कर जाते हैं ॰ग्रामीण कहे जाने वाले इलाके मे तो बाहरी दुनिया के लोग किंकर्तव्य विमूढ़ से रह जाते हैं । बड़े बड़े कारों के शो रूम ब्रांडेड कपड़ों ,जूतों की दुकाने ,गहनों चश्में आदि से सजे दुकान । यहाँ पर लोगों की प्रति व्यक्ति आय विश्व मे सबसे ज्यादा आय वाले दस देशों में शुमार है ।बैंकिंग फार्मास्युटिकल्स और वाणिज्य यहाँ का मुख्य व्यवसाय है । यहाँ के किसान संसार के शायद सबसे धनी किसान होंगे जो उच्च कोटी के हर आधुनिक सुख सुविधा का लाभ उठाते हैं ।
यह देश चाकलेट और घड़ी के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है ।गायों के लिए बड़े बड़े हरे हरे चरागाह हैं ।जगह जगह उनके लिए बना हुआ घर जिसे वहाँ के मौसम के अनुकूल बनाया गया है । गर्मी के मौसम मे गायों को चरने के लिए ऊपर पहाड़ों पर ले जाते हैं ,वहाँ भी उनके लिए घर बनाया गया है ।नीचे चारागाहों के घास काटकर सफ़ेद ,हरे प्लास्टिक के बोरों मे लपेट कर सर्दी के मौसम के लिए रखा जाता है । गायें खूब स्वस्थ ,सुबह से शाम तक चारागाहों में चरती हुई दिखाई देती है । ये गायें तकरीबन सत्तर लीटर तक दूध देती हैं ।
वहाँ विभिन्न प्रान्तों के आदिवासी आकर बस गए थे ,इसलिए उनकी कोई एक भाषा नहीं है ।चार आधिकारिक भाषाएँ हैं ,फ्रेंच {देश के पश्चिमी हिस्से मे बोली जाती है ,}जर्मन {उत्तर ,मध्य और पूर्बी हिस्से में } रोमन {दक्षिण पूर्व } और स्विस । इसके अलावे भी कुछ और भाषाएँ हैं । [अङ्ग्रेज़ी भी स्कूलों में पढ़ाई होती है ,मगर इसका मुख्य तया प्रयोग वे विदेशों में करते हैं। सामान्यतया वे अँग्रेजी का बहिष्कार ही करते हैं ,बिलकुल उपेक्षा करते हैं ।] दादा साहब अंबेडकर ने महात्मा गांधी से स्विट्जरलैंड वाली भाषा नीति अपने देश में अपनाने की सिफ़ारिश की थी ,जो शून्य में अटक गई । वहाँ चारों देश का झण्डा भी साथ दिखाई देता है ।किसी तरह के विवाद से बचने के लिए जेनेवा और ज्यूरीख जैसे शहर को राजधानी नहीं बनाकर ,बर्न को बनाया गया था । ताकि किसी तरह के विवाद का जन्म न हो । वह एक शान्तिप्रिय देश है ।
सर्दियों में प्राय भीषण बर्फबारी से इसके मार्ग क्षतिग्रस्त हो जाते हैं जिसका मरम्मत गर्मी के मौसम में होता है । जगह जगह लकड़ियों के ढेर दिखाई पड़ते हैं ,जिनमें अधिकांश जलाने वाले हैं ।यदि एक दिन के लिए भी बिजली गुल हो जाए तो वहाँ भीषण जान माल की क्षति हो सकती है ,ठंढ से ,इसलिए अन्य चीजों के अलावा जलावन की भी पूरी व्यवस्था है ।
वहाँ सड़कों के साथ साथ यातायात के सारे साधनों की भरमार है । ट्रैफिक व्यवस्था अति उत्तम । लगता है जीवन जीने का लुफ़्त तो यहीं के लोग उठा रहे हैं ।
वास्तव में ,स्विट्जरलैंड में जादुई शक्ति है ,जो उसे एक बार देख ले ,नयनों के द्वार से प्रवेश कर सीधे हृदय में आसन जमा लेता है ।

 

 

 


॥ कामिनी कामायनी ॥

 

 

 

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