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क्षणिकायें ....  मोहिन्दर कुमार

 

 

खौलते पानी से हाथ जला लिया उसने
पानी से आग बुझती है
किसी से सुना होगा
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भागते भागते गिर कर मर गया कोई
जिन्दगी मौत से बदतर है
उसी से भाग रहा था
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टूटे नग कौन गहनों में बिठाता है
अब कोई ख्वाब नहीं
आंखें सूनी हैं
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रिश्तों के पुल आंसुओं से न बह जायें
यही सोच कर
अब वह रोता नहीं
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बात बनते बनते फ़िर से बिगड ही गई
लफ़्ज जुबां से न निकले
रिश्ता टूट गया
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उसने साथ जीने मरने की कसम खाई
मगर निभाई नहीं
शायद पचा ली
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उम्र भर संभाले कांच से रिश्ते
बस और किया क्या है
सुलझाते रहे वेतरतीब उलझने
जीने को जिया क्या है
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सोचो भला
क्या होगी
हमारे दर्द की दास्तां
दो घडी सुनके जिसे
हर अजनबी
जी भर कर रोया
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गुजरे हादसे अभी भी
जहन में ताजा हैं
इस दर्द की दवा बनी ही नहीं
हर बार आप भूल जाते हो
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गम और खुशी साथ निभ न पाती है
वाक्ये जिन्दगी के हमें यही बताते हैं
बकरे ईद कब मनाते हैं
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उम्र भर रहा इन्तजार
फ़ुर्स्त के चंद लम्हों का
अब लम्बी फ़ुर्सत है
पर भला
क्या कर लिया हमने

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चांदनी चांद की कहां
एक कर्ज है धरती का उस पर
जिसे वह स्वंय रात दिन
सूरज की तपिश में जल कर
किश्तों में रात को लौटाता है
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मन का मौसम अगर बदलता
खिलते फ़ूलों से
चारों तरह गुलाब मैं उगा लेता
उदास दिल अगर बहलता
तस्वीरों से
घर तस्वीरों से मैं सजा लेता
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शब्द वही हैं
अर्थ भिन्न हैं
जीते के लिये जो है "दुशाला"
मरे हुये को वही कफ़न है
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वो मर गया
कारण भूख और बेरोजगारी
भोज तेरहवीं क्या करे सिद्ध
मरे जानवर को भंभोडते गिद्ध
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होंठ गीले करता रहा
अपने ही पसीने से
जिस्म का पानी हुआ खत्म
थक गया जब जीने से
सो गया हमेशा के लिये
सपने लगा सीने से
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उलट पुलट कर देखता रहा
जब समझ न आया
फ़ेंक दिया फ़िर से
भूखा था, रोटी की तलाश थी
उस पत्थर से हीरे का
इस विराने में वो क्या करता
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मजहब

घर मेँ इबादत के लिये
घर से बाहर मज़लूमों की हिफ़ाजत के लिये
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इन्सानियत

हर मजहब से ऊपर
हर इन्सान का मजहब है
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दानिशमंदी

बीते हुये बुरे कल को
लाज़िम है भुला देना
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जिन्दादिली

चाहे दिल दर्द से रोता हो
होंठों पर हों मुस्काने
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चमन
एक पडाव
बहारें जहां ठहरेंगी
खिंज़ा के आने तक
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