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डॉ. सुनील कुमार परीट

 

 

* क्षणिकाएँ :-
१.
देश को जोडने का प्रयास करो
देश को मरोडने का काम मत करो।
मन के अंदर का काला मल हटाओ
देश को समृध्द करो दुष्ट को मिटाओ॥
२.
गरिबों की गरिबी देखकर शायद
’गरिबी हटाओ’ योजना बनायी गयी।
विडम्बना देखिए यारों गरिबों की नहीं
पर नेतओं की गरिबी हट गयी॥
३.
खुलकर हँसना चाहते हैं
आज जी भर जीना चाह्ते हैं।
लम्हा लम्हा बहुत मर चुकें
अब जी भर पीना चाहते हैं॥
४.
मैने तय कर लिया है
अब मरना नहीं जीना है।
मुश्किलों का सामना करना सीखा है
अब गम कोई भी सब पीना है॥
५.
पैरों में ताकत था
बाजूओं में दम था।
लढने को मन था
पर मन में बहुत गम था॥
६.
मैं इजहार करता हूँ
मैं माँ भारतमाता का सपूत हूँ।
माँ के लिए सदा तत्पर हूँ, परिन्दों के बीच
जीने से मरना बेहतर समझता हूँ॥
७.
आज हमारे देश में प्रजातंत्र नहीं
चारों ओर नेतातंत्र चल रहा है ।
वहाँ नेता रंग-रैलियों में डूबें हैं
यहाँ आम जनता का खून बह रहा है ॥

 

 

 

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