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डॉ. सुरेन्द्र यादव

 

muskurana

 

* मुसकराना मुझे उनका
तब बुरा लगता है,
जब रहती है वह सपनों में साथ मेरे
हकीकत में बात करती है दूसरों से... !
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उनकी साँसों के कोमल संस्पर्श का अनुभास
उतना भाता नही है,
जितना भाता है मुझे
दूर-दूर रहते हुए...
उनकी प्रतीक्षा करते हुए ऊब जाना !
***
यूँ रूठने और मनवाने की आदत उनकी,
उतनी बुरी नहीं है
जितनी दिन-दिन-भर
मोबाइल पर मुझसे बतियाने की .... !
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सुनकर हमारी अंतर्कथा
आप सहसा यूँ हँस पड़े....
जैसे यह हमारा-अपना नहीं
किसी और का अंतस-रूदन हो !

 

 

 

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