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डॉ. उमेश महादोषी

 

क्षणिकाएँ / डॉ. उमेश महादोषी

 


1.
रात को
स्वप्न में मुझे
माँ रोज दिखाई देती है
सुबह उठता हूँ तो जैसे
मेरी आँखों की रौशनी
गायब होती है।
2.
चिड़ियों के
नाम-रूप भूल गया
पर उनकी चहचहाहट
आँखों में मचलती है
जीवन के इस अन्टार्कटिका पर देखो
सांसों की एक चिड़िया
कैसे फुदकती है!
3.
रिश्तों की टार्च से
डालकर रौशनी
जहाँ भी देखा
आशाओं के मांस का
ढेर ही पाया है
‘कार्पोरेट’ का भेड़िया
अब घर में घुस आया है!
4.
नए साल के बारे में
क्या सोचूं?
पुरानी उम्मीदों और सपनों को
आगे लाने भर से
खाते का
पूरा पन्ना भर जाता है!
5.
एक मंहगाई बढ़ाता है
दूसरा आन्दोलन करवाता है
इन दोनों की मार झेलने वालों को
जिस तीसरे से उम्मीद है
वह/ हर बार
दुम समेटकर
बिल में छुप जाता है

 

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