रोज कुआं खोदते रोज पानी पीते दिहाड़ी मजदूर-- डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

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रोज कुआं खोदते रोज पानी पीते दिहाड़ी मजदूर-- डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

Post by admin » Fri Oct 27, 2017 10:01 am

रोज कुआं खोदते रोज पानी पीते दिहाड़ी मजदूर ।
प्रात : काल जब ग्राम वासी जाग कर अपनी दिनचर्या पूरी करते हैं , तब उनमें से कुछ ग्रामीण गाँव छोड़ कर शहर की तरफ पलायन करते दिखते हैं । बड़े –बड़े शहरों में मुख्य चौराहों पर या घंटाघरों पर ये ग्रामवासी झुंड –के झुंड रोजगार की तलाश में खड़े मिलते हैं । ग्रामीणों का ये संगम प्रात :08 बजे से 10 बजे तक होता है । शहर के लोग अपना अपना गृह निर्माण कार्य , मरम्मत का कार्य , रंगाई –पुताई हेतु इन ग्रामीण कामगारों को न्यूनतम मजदूरी दर पर किराए पर ले जाते हैं । इनमे रेज़ा , पुरुष मजदूर , मिस्त्री , प्लमबर आदि कारीगर होते हैं, जो दूर देहात से आते हैं , और चाल या झुग्गी झोपड़ियों में रात्रि निवास करते हैं, और अपना गुजर –बसर करते हैं । कुछ मजदूर टोली बना कर व्यवसाय के रूप मे कार्य करते हैं और ठेका ले कर कार्य करते हैं । कुछ खाना –बदोश लोग ग्राम मे जब कृषि कार्य नहीं होता है तब अपनी आमदनी बढ़ाने हेतु ये कार्य करते हैं। कुछ तो पीढ़ियों से ये कार्य करते आ रहे हैं ।इनका कार्य छट्ठी पर कुआं खोदना होता है । कभी –कभी इन लोगों का बुरे ,कडक ठेकेदारो या कंजूस सेठों से पाला पड़ता है जो रोब दिखा कर , डांट –डपट कर इनकी दिहाड़ी में कटौती करते हैं और इनकी ढेर सारी बुराइयाँ करते नहीं थकते हैं । इन्ही लोगों का उसूल चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए होता है । तब ये ग्रामीण बेबस –लाचार कामगार अपनी बनाई कृति को देख कर ही संतोष करते हैं और अपनी बेबसी का रोना रोते हैं ।
ग्राम वासियों की पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ खप जाती हैं परंतु इनकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहींहो रहा है । अत : ये विस्थापित ग्रामीण जुए , शराब के अड्डो पर नशा खोरी करते अक्सर देखे जाते हैं एवं गंभीर बीमारियों, दुर्घटनाओं से ग्रस्त होकर असमय ही अपनी जान गवाते हैं ।कुसंग बुराइयाँ , नशा इनका शौक होता है ।
अक्सर रात्रि के समय सुनसान इलाकों में ये गंभीर वारदातों जैसे लूट , हत्या डकैती इत्यादि में भागीदार होते हैं ।
भगवान झूठ ना बोलवाये, इन्ही लोगों मे से कुछ ग्रेजुएट पढे लिखे शिक्षित लोग भी होते हैं जो बेरोजगारी की मार सेक्षुब्ध होकर अपना शौक अंधकार के समय लूटमार कर पूरा कर लेते हैं ।दिन में रंगाई –पुताई या निर्माण कार्य करते हैं । इन्ही मे से कुछ दिहाड़ी मजदूरों से पुछताछ करने पर पता चला है कि ये मजदूर हाइ स्कूल या बीए तक शिक्षित होते हैं । ये पूछने पर कि शिक्षा प्राप्त करने लिए विध्यालय जाना क्या आवश्यक नहीं है । तो उन लोगों ने बताया कि शिक्षा के लिए केवल विध्यालय मे दाखिला कराना ही आवश्यक है । बाकी वजीफा से लेकर उत्तीर्ण होने का जिम्मा स्कूल प्रशासन का होता है । स्कूल का रिकार्ड खराब ना होइसलिए सुविधा शुल्क लेकर विध्यार्थियों को खुली छूट दी जाती है । इसतरह परीक्षा पास कर डिग्रिया लेकर देश के ये होनहार बेरोजगारी भत्ता पाते हैं एवं सुविधा शुल्क देकर नौकरियाँ प्राप्त करते हैं या दिहाड़ी मजदूर बन कर दिहाड़ी कमाते हैं या जुर्म की दुनिया मे प्रवेश करते हैं ।
जाति –भेद , वर्ग भेद , उंच नीचका भेदभाव , वैमनष्य ग्रामीण परिवेश मे हर परिवार की आर्थिक अवनति का कारण है । राजनीति मे इसकी जड़ें बहुत दूर तक स्थापित हो चुकी हैं । भारतीय संविधान हमें इसकी इजाजत नहीं देता है । संविधान मे सभी नागरिकों को समान अधिकार , एवं समान अवसर एवं समान शिक्षा का अधिकार दिया गया है । परंतु सामाजिक कुरीतियाँ हमारे संस्कारों , हमारे रीति रिवाजों मे समा चुकी है । संविधान के नियमों का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन हमारे सामाजिक परिवेश में कलंक के समान है । किन्तु यह स्टेटस सिंबल का प्रतीक बन चुका है । अपराधियों को सरंक्षणदेकर , राजनीतिक लाभ हेतु उनका इस्तेमाल, जाति भेद के अनुसार प्रचार –प्रसार मे उनका प्रयोग भारतीय समाज को आतंकित एवं कलंकित करता है । प्राचीन इतिहास के परिपेक्ष मे हम अपनी फूट ,भ्रस्ट आचरण एवं लोभ लालच से अपने शत्रुओ को प्रश्रय दे चुके हैं । यदि हम अतीत की घटनाओ से कुछ नहीं सीखे तो आने वाला भविष्य भारत वर्ष एवं भारतीय संविधान के लिए अहित कर साबित होगा ।
11 बजते –बजते दिहाड़ी मजदूर निराश होने लगते हैं और मायूष होकर जब घर लौटते हैं तो घरवाली पुछती है आज कोई खरीददार नहीं मिला । क्या खाओगे क्या खिलाओगे ?तब उनकी गरीबी देख कर कलेजा मुंह को आने लगता है । इंसान को इंसान खरीदता है । उसका भी मोलभाव तय होता है , तब उसके घर रोटी बनती है , बाल –बच्चो का पालन पोषण होता है , दिहाड़ी मजदूरो की यह अत्यंत कारुणिक कथा है । अंतर यह है कि दास प्रथा परतंत्र देश कि प्रथा थी यह आधुनिक आजाद देश कि प्रथा है जहां इंसान के लिए इंसान बिकता है । संविधान में समानता का अधिकार तब भी था आज भी है । ये अधिकार जानते सब हैं पर मानते कितने हैं ?

21 -09 -2017 डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव
सीतापुर
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